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24 साल के कैप्टन आशुतोष ने घुसपैठियों को दिया घातक जवाब, जान देकर की सीमा की हिफाजत

स्वतंत्रता दिवस से एक दिन पहले यानी 14 अगस्त को इस साल के वीरता पुरस्कारों यानी गैलेंट्री अवॉर्ड्स का ऐलान किया गया. कुल 6 जवानों को शौर्य चक्र दिया गया. शांतिकाल के वीरता पुरस्‍कारों में अशोक चक्र, कीर्ति चक्र और शौर्य चक्र आते हैं. शांति के समय अशोक चक्र देश का सर्वोच्‍च वीरता पुरस्‍कार है. अशोक चक्र, कीर्ति चक्र के बाद शौर्य चक्र सबसे बड़ा पुरस्कार है. हम एक-एक कर शौर्य चक्र विजेताओं की बहादुरी के किस्से बता रहे हैं. इस कड़ी में बात कैप्टन आशुतोष कुमार की.

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घुसपैठ करने वाले आतंकियों को किया ढेर

बिहार के मधेपुरा जिले का घैलाढ़ प्रखंड में है परमानंदपुर जागीर गांव. ये गुमनाम सा गांव तब खबरों में आया, जब आतंकियों का मुकाबला करते हुए यहां के आर्मी ऑफिसर कैप्टन आशुतोष कुमार ने देश पर अपनी जान कुर्बान कर दी. महज 24 साल की उम्र कैप्टन आशुतोष कुमार ने ये कारनामा कर दिखाया. वह जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा जिले में आतंकियों से लड़ते हुए शहीद हुए. कैप्टन आशुतोष कुमार को मरणोपरांत शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया है.

सेना की 18 मद्रास रेजिमेंट के कैप्टन आशुतोष ने अपने साथी सैनिकों की जान बचाने और आतंकियों को मौत के घाट उतारने में अदम्य वीरता और शौर्य का परिचय दिया. इस दौरान गोली लगने से वह शहीद हो गये. 8 नवंबर 2020 को एलओसी से लगभग 3.5 किमी की दूरी पर घुसपैठ की कोशिश की सूचना दी गयी थी. आशुतोष कुमार ने आतंकवादियों को जवाब देने के लिए अपनी यूनिट की पलटन ‘घातक’ का नेतृत्व करते हुए मोर्चा संभाला. भीषण गोलीबारी में तीन आतंकवादियों को ढेर कर दिया. लेकिन फायरिंग के दौरान कैप्टन आशुतोष कुमार और उनके 4 साथियों को गोलियां लगीं. इस कार्रवाई में कैप्टन आशुतोष शहीद हो गए.

शौर्य चक्र किसे दिया जाता है?

शौर्य चक्र असाधारण वीरता या बलिदान के लिए दिया जाता है. ‘शौर्य चक्र’ शांति काल में दिया जाने वाला तीसरा सबसे बड़ा सैन्य पराक्रम मेडल है. ये ऐसा सम्मान है जो सेना, सिविलियन पुलिस और आम नागरिकों को भी दिया जा सकता है. सेना में किसी भी रैंक के ऑफिसर (महिला/पुरुष), नेवी, एयरफोर्स, किसी भी रिजर्व फोर्स, प्रादेशिक सेना, नागरिक सेना और कानूनी रूप से गठित अन्य सैनिक इसके पात्र हो सकते हैं. सशस्त्र बलों की नर्सिंग सेवाओं के मेंबर को कार्यक्षेत्र में बेहतरीन योगदान के लिए भी ये सम्मान मिल सकता है. कोई भी आम नागरिक चाहे वो किसी भी जेंडर का हो, इस सम्मान का हकदार हो सकता है. सिविल पुलिस फोर्स, सेंट्रल पैरा-मिलिट्री फोर्सेस, रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स के सदस्य को भी ये सम्मान दिया जा सकता है.

Shaurya Chakra

इस पदक की शुरुआत 4 जनवरी 1952 को हुई थी. पहले इसका नाम अशोक चक्र क्लास-2 था. फिर 26 जनवरी 1967 को नाम बदलकर शौर्य चक्र किया गया. इस पदक का फीता हरे रंग का होता है, जिस पर तीन सीधी रेखाएं बनी होती हैं. इस फीते से बंधा होता है पदक, जो कि कांसे का होता है और इसके बीच में अशोक चक्र बना होता है. पदक के पिछले हिस्से पर हिंदी और अंग्रेजी में शौर्य चक्र लिखा होता है. भारतीय वायुसेना की वेबसाइट के मुताबिक, पदक विजेता को हर महीने 1500 रुपये की राशि दी जाती है.


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