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डूबते पैसों के इस बेहद डरावने दौर में, शेयर मार्केट के हव्वा को हवा में ऐसे उड़ाइए

बाज़ार. इसका मतलब सबके लिए अलग-अलग है. इसलिए पहले ही क्लियर करना ज़रूरी है कि बाज़ार का मतलब हमारी स्टोरी में ‘शेयर बाज़ार’ है.

# ये क्या होता है?

सिंपल भाषा में समझिए कि कोई कंपनी सिर्फ अपने दम पर एक हद तक ही बड़ी हो सकती है. उसके बाद उसे ढेर सारे पैसों की ज़रूरत होती है. और वो पैसे मांगने के लिए उसे आम जनता के पास जाना पड़ता है. आम जनता उसे पैसे क्यूं दे? तो कंपनी को कहना पड़ता है कि हमारी हिस्सेदारी खरीदो, फायदा हुआ तो तुम भी नाचना. तो लोग हिस्सेदारी खरीद लेते हैं. लेकिन इसके लिए प्रोसेस होती है.

# IPO-

सबसे पहले कंपनी आईपीओ, यानी ‘इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग’ निकालती है. आईपीओ मतलब, कंपनी ऑफिशियली कह रही है कि आप लोग हमारी कंपनी में हिस्सेदारी खरीद सकते हैं. यूं, कंपनी को अगर अपनी 10% हिस्सेदारी आम लोगों को बेचनी है तो कंपनी 10% शेयर के आईपीओ निकालेगी. इस दस प्रतिशत को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटेगी. माना दस करोड़ टुकड़ों में. फिर हर टुकड़े की एक फेस वैल्यू रखेगी. माना दस रुपए. इसका मतलब ये हुआ कि कंपनी अपनी 10% हिस्सेदारी 100 करोड़ रुपए में बेच रही है.

अब आप आईपीओ खरीदने के लिए अप्लाई करते हो, किस्मत अच्छी हुई तो आईपीओ मिल जाते हैं, और ज़्यादा किस्मत अच्छी हुई तो उसपर ‘लिस्टिंग गेन’ भी मिल जाते हैं. लिस्टिंग गेन क्या होता है वो भी बताते हैं. पहले कहानी आगे बढ़ाते हैं.

ये है रेल नीर. आईआरसीटीसी का प्रोडक्ट. आईआरसीटीसी का Ipo जब लिस्टेड हुआ था (14 अक्टूबर, 2019 को) तब इसने 100% का लिस्टिंग गेन छू लिया था.
ये है रेल नीर. आईआरसीटीसी का प्रोडक्ट. आईआरसीटीसी का IPO जब लिस्टेड हुआ था (14 अक्टूबर, 2019 को) तब इसने 100% का लिस्टिंग गेन छू लिया था.

तो आपको आईपीओ मिल गया. इसका क्या करें? और अगर आईपीओ नहीं मिला, और लेना था तो क्या करें? अब आप कंपनी से डायरेक्ट तो शेयर/आईपीओ खरीद नहीं सकते.

[क्यूंकि कंपनी से डायरेक्ट शेयर केवल आईपीओ के माध्यम से ही खरीदे जा सकते हैं. और कंपनी का आईपीओ रोज़-रोज़ नहीं आता. हो सकता है कि अगली बार कंपनी का आईपीओ 5 साल बाद आए, और अपनी 10 प्रतिशत हिस्सेदारी आम लोगों में और बेच दे. लेकिन तब तक?]

# शेयर या इक्विटी-

अब, आप कंपनी से तो नहीं लेकिन उस बंदे से शेयर ज़रूर खरीद सकते हैं जिसके पास पहले से शेयर हैं. और बाद में उस बंदे को बेच भी सकते हो जो खरीदना चाहे. ऐसा आप कितनी ही बार कर सकते हो. और इस खरीद फरोख्त के लिए बना हुआ है ‘बाज़ार’. और इस बाज़ार को कहते हैं शेयर बाज़ार. यहां कंपनी से खरीदे हुए आपके आईपीओ अब शेयर या इक्विटी या स्टॉक कहलाए जाने लगते हैं.

तो जब कोई आईपीओ शेयर में बदल जाता है और शेयर मार्केट में खुल्ला छोड़ दिया जाता है, तो कहते हैं कि वो शेयर या कंपनी लिस्टेड हो गई. और कंपनी दो जगह लिस्टेड हो सकती है. बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज में.

और जिस दिन कोई कंपनी मार्केट में लिस्टेड हो जाती है उस दिन फिर कंपनी नहीं, बाज़ार डिसाइड करता है कि एक शेयर की क्या वैल्यू है और होनी चाहिए?

जिस दिन कंपनी लिस्टेड होती है उस दिन उसके शेयर अगर उसकी आईपीओ वैल्यू से ज़्यादा हुए तो उसे कहते हैं लिस्टिंग गेन. जैसे हमारे उदाहरण में कंपनी ने आईपीओ के लिए हर शेयर की वैल्यू 10 रुपए रखी थी और माना जिस दिन कंपनी शेयर मार्केट में लिस्टेड हुई उस दिन उसकी वैल्यू मार्केट खुलते ही 12 रुपए हो गई तो आपको 2 रुपए प्रति शेयर का लिस्टिंग गेन मिल गया. यानी अब आप मार्केट में 12 रुपए प्रति शेयर के हिसाब से अपने शेयर बेच सकते हो.

भारत की इकोनॉमिक्स का दिल, बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज.
भारत की इकोनॉमिक्स का दिल, बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज.

# सेबी-

अच्छा ये आईपीओ, लिस्टिंग, शेयरों की खरीद फ़रोख्त… और शेयरों से जुड़ा बाकी सारा तामझाम आपकी या कंपनी की अकेले की मर्ज़ी से नहीं होता. जैसे शांति व्यवस्था के लिए पुलिस है, बैंकों के लिए आरबीआई होती है वैसे ही शेयर मार्केट के लिए सेबी (SEBI) है, जिसका फुल फॉर्म है, भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (Securities and Exchange Board of India) तो सेबी की मर्ज़ी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता. लेकिन सिर्फ लीगल चीज़ों का. जहां तक किसी कंपनी के शेयर प्राइज़ की बात है वो डिसाइड करता है मार्केट. शेयर मार्केट.

# ये सेंसेक्स और निफ्टी क्या है-

अगर किसी कंपनी के शेयर की डिमांड ज़्यादा हुई, यानी खरीददार ज़्यादा हुए तो शेयर का प्राइस बढ़ता जाएगा. और अगर शेयर की सप्लाई ज़्यादा हुई, यानी विक्रेता ज़्यादा हुए तो शेयर का प्राइज घटता जाएगा.

अब किसी एक शेयर के बदले अगर आपको पूरे मार्केट का हाल देखना है तो कुछ स्पेसिफिक ‘ग्रुप ऑफ़ स्टॉक्स’ हैं. जैसे ‘सेंसेक्स’. जिसमें भारत की टॉप 30 कंपनियों के शेयर होते हैं. ‘निफ्टी फिफ्टी’ में भारत की टॉप 50 कंपनियों की शेयर वैल्यू का औसत होता है.

वैसे ही, जब कहीं पढ़ो कि ऑटो सेक्टर के शेयर गिर रहे हैं, तो उसका मतलब है कि एक ग्रुप है, जिसमें एमआरएफ, मारुती, टाटा मोटर्स जैसी गाड़ी और गाड़ी के पार्ट्स बनाने वाली कंपनीज़ के शेयर्स लिस्टेड हैं. और वो शेयर नीचे गिर रहे हैं. अगर कहीं पढ़ो कि आईटी सेक्टर्स के शेयर बढ़ रहे हैं तो उसका मतलब ये है कि इनफ़ोसिस, विप्रो, एचसीएल जैसी कंपनीज़ के शेयर्स बढ़ रहे हैं. ऐसे ही बैंकिग. एफएमसीजी और फार्मा वगैरह के ग्रुप बने हैं.

ऑटो सेक्टर की पिछले साल से जो वाट लगना शुरू हुई तो आग की तरह बाकी सेक्टर्स में फ़ैलती चली गई.
ऑटो सेक्टर की पिछले साल से जो वाट लगना शुरू हुई तो आग की तरह बाकी सेक्टर्स में फ़ैलती चली गई.

ऐसे सेक्टर वाइज़ ग्रुपिंग करने से पता चल जाता है कि कौनसा सेक्टर अच्छा परफॉर्म कर रहा है और क्यूं? एक और बात है कि अगर कोई सेक्टर नीचे गिर रहा है तो इसका मतलब ये नहीं कि उस सेक्टर के सारे ही शेयर गिर रहे हैं. इसका मतलब दरअसल ये है कि, या तो गिरने वाले शेयरों की संख्या, चढ़ने वाले शेयरों की संख्या से ज़्यादा है या फिर गिरने वाले, गिरने की ऐसी-ऐसी ऊंचाइयों को छू रहे हैं कि चढ़ने वालों की सारी पॉजिटिविटी धरी की धरी रह जा रही है.

हां आगे बढ़ने से पहले एक बात और. शेयर मार्केट सैटरडे संडे को बंद रहता है. दीवाली होली या अन्य बड़े त्योहारों में बंद रहता है. हालांकि जिस दिन दीवाली होती है उस दिन शाम को कुछ समय के लिए खुला रहता है. ‘लक्ष्मी’ के साथ धन और शेयर के रिलेशन के चलते, लोग इस दिन मुहूर्त खरीददारी करते हैं. साथ ही जिस दिन बजट आता है उस दिन अगर सेटरडे संडे या छुट्टी का दिन हुआ तो भी मार्केट खुला रहता है. जैसे अबकी बार खुला था. सेटरडे होने के बावज़ूद.

# आज क्यूं बात कर रहे हैं?

आज खबर आई है कि सेंसेक्स 1,941.67 और निफ्टी 538.00 अंक गिर गया.

बीएसई, जो गिरते हुए न्यूटन का ऐपल हुआ जा रहा है.
बीएसई, जो गिरते हुए न्यूटन का ऐपल हुआ जा रहा है. एनएसई का भी यही हाल है. (साभार: गूगल)

देखिए, अभी तक हमने जो ऊपर समझा उसके हिसाब से हमें ये बताने के लिए किसी भी और जानकारी की ज़रूरत नहीं कि ‘सेंसेक्स 1,941.67 और निफ्टी 538.00 अंक गिर गया’ का मतलब, भारत की 30 बड़ी कंपनियों और 50 बड़ी कंपनियों में से या तो ज़्यादातर कंपनियों के शेयर गिरे हैं या जिन कंपनियों के शेयर गिरे हैं वो गिरने की ऐसी-ऐसी ऊंचाइयों को छू रहे हैं हैं चढ़ने वालों की सारी पॉजिटिविटी धरी की धरी रह जा रही है.

अब ये तो रही लॉजिक्स की बात. हमारी समझ के लिए. लेकिन चलिए अब आंकड़ों यानी फिगर्स की बात कर लेते हैं, ताकि समझ में आए आज ये खबर क्यूं बनी.

# ये खबर क्यूं है?

इसलिए क्यूंकि ये गिरावट बहुत बहुत बड़ी है. कितनी बड़ी-

# निफ़्टी 50, पिछले कारोबारी दिन 10,989 पॉइंट्स पर बंद हुआ. यानी आज 538 पॉइंट्स की गिरावट हुई.  लगभग 5 प्रतिशत की गिरावट.

# बीएसई (बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज) सेंसेक्स, पिछले कारोबारी दिन 37576 पॉइंट्स पर बंद हुआ. यानी आज −1,941.67 पॉइंट्स या 5.17 फीसदी की गिरावट.

# ये दोनों की सूचकांकों के इतिहास की कुछ सबसे बड़ी गिरावटों में से एक है. कहने का मतलब ये है कि इन्वेस्टर्स के लाखों करोड़ रुपए एक दिन में स्वाहा हो गए.

# हमने बताया था न कि अगर कोई सेक्टर या सूचकांक नीचे गिरता है तो भी कुछ शेयर होते हैं जो ऊपर जाते हैं. लेकिन आज सेंसेक्स में लिस्टेड सारे 30 शेयर नीचे गए हैं.

# पिछली कुछ टॉप गिरावटें ये रहीं-

24 अक्टूबर, 2008 को 10.96 प्रतिशत

21 जनवरी, 2008 को 7.41 प्रतिशत

17 मार्च, 2008 को 6.03 प्रतिशत

24 अगस्त, 2015 को 5.94 प्रतिशत

06 जुलाई, 2009 को 5.83 प्रतिशत

09 मार्च, 2020 को 5.17 प्रतिशत (यानी, ये वाली आज तक की सातवीं सबसे बड़ी गिरावट थी.)

# इसका मतलब-

देखिए, पहले तो ये गिरावट सिर्फ 09 मार्च तक ही सीमित नहीं है. ठीक से दो महीने भी नहीं हुए होंगे, जब 16 जनवरी, 2020 को सेंसेक्स 42000 पॉइंट्स पर था. तब से आज तक ये मार्केट इन्वेस्टर्स के 18% के लगभग रुपए स्वाहा कर चुकी है. ये इतना बड़ा अमाउंट नहीं लगता तो इसका मतलब हम इस बात से ग़ाफिल हैं कि शेयर मार्केट गिरने के लिए नहीं चढ़ने के लिए जाना जाता है. जबसे बना है तबसे औसतन हर 5 से 7 साल में इन्वेस्टर्स के रुपए दुगने करते आया है. 1978 में, जबसे खुला है, तबसे लगातार बढ़ता रहा है. उस दिन से लेकर आज तक 350 गुना बढ़ चुका है.

गिरावट को और बारीकी से ऐसे समझिए कि 16 जनवरी, 2020 को अगर आपने गोल्ड में इंवेस्ट किया होता तो आपके एक लाख रुपए आज एक लाख नौ हज़ार रूपए हो गए होते. लेकिन शेयर मार्केट में वही एक लाख रुपए घटकर, बयासी हज़ार हो गए होते.

और उदास होने का मन है तो जान लीजिए कि यदि 16 जनवरी, 2020 को आपने अपना एक लाख मूल्य का गोल्ड बेचकर उसके सारे पैसे शेयर पर लगाए हैं तो आप खुद को सताईस हज़ार रुपए का घाटा करवा चुके हैं. मतलब 27% का. वो भी दो महीने से कम समय में.

# क्यूं गिर रहा है मार्केट-

एक कारण हो तो बताएं. शेयर मार्केट में आ रही परेशानियां अबकी टिड्डियों की तरह आई हैं.

#कोरोनावायरस. इसने पूरी दुनिया के शेयर मार्केट्स की वाट लगा रखी है. क्यूं लगा रखी है? अरे बड़ी-बड़ी बिज़नेस डील्स रद्द हो रही हैं. प्रोडक्शन इस कदर कम हो गया है कि चाइना की आबोहवा साफ हो गई है, कार्बन इमिशन में कमी के चलते. बड़े-बड़े प्रोग्राम्स, जैसे आईपीएल, ओलंपिक्स पर रद्दोबदल की तलवार लटक रही है. लोग मूवी देखने नहीं जा रहे. विदेश नहीं जा रहा, विदेश से नहीं आ रहे. अकेला कोरोना ही शेयर मार्केट को पर्याप्त बर्बाद करने की क्षमता रखता है. लेकिन दिक्कत ये है कि बात यहीं पर खत्म नहीं हो रही, हर साख पे उल्लू बैठा है…

# क्रूड ऑयल. यानी कच्चा तेल. सोमवार 9 मार्च, 2020 को क्रूड ऑयल के दाम में बहुत बड़ी गिरावट आई. शुरुआती कारोबार में करीब 30 प्रतिशत की गिरावट आई. इसे 30 साल की सबसे बड़ी गिरावट बताया जा रहा है. इसे 17 जनवरी, 1991 को गल्फ वॉर शुरू होने के बाद की सबसे बड़ी गिरावट कहा जा रहा है. कारण ओपेक (OPEC- Organization of the Petroleum Exporting Countries) और रूस के बीच समझौता नहीं हो पाया. होता तो एक फिक्स रेट हो जाता, लेकिन नहीं हो पाया तो रूस को सबक सिखाने के लिए सऊदी अरब ने तेल की कीमतें घटा दीं. इसलिए ही तो ऑयल सेक्टर आज 8.72 प्रतिशत गिर गया. पेट्रोल से जुड़ा, रिलायंस 13 प्रतिशत से ज़्यादा गिरा. ओएनजीसी 15.54 प्रतिशत से ज़्यादा गिरा. (देखा न आपने कि क्यूं शेयर मार्केट को सेक्टर्स में डिवाइड किया जाता है, ताकि पता चल सके कि स्पेसिफिकली कहां दिक्कत है.)

कई कारणों में से क्रूड की कीमतों में ऐतिहासिक कमी भी एक कारण है, सेंसेक्स के गिरने की.
कई कारणों में से क्रूड की कीमतों में ऐतिहासिक कमी भी एक कारण है, सेंसेक्स के गिरने की.

# यस बैंक. विडंबना देखिए कि आज सबसे ज़्यादा बढ़ने वाला शेयर यस बैंक का रहा, लेकिन इसने बाकी मार्केट की डाल सुखा दी. अब आप पूछेंगे कि खुद बढ़ के औरों की डाल कैसे सुखाई? तो उत्तर ये है कि यस बैंक खुद तो पिछले दिनों में इतना गिर चुका था कि वहां से थोड़ी बहुत सांत्वना मिलने पर उसके पास उठने के अलावा कोई और विकल्प न था. और सांत्वना दी थी एसबीआई से लेकर सरकार तक ने. ‘ये डूब रहा है, डूबा तो नहीं है.’

लेकिन बाकी बैंक्स के शेयरों को लेकर ग्राहक डरे हुए थे. इनको कोई मोरल सपोर्ट भी नहीं था और न इनकी स्थिति, यस बैंक सरीखी इतनी बुरी कि अब गिर ही नहीं सकते. अस्तु, बैंकिंग सेक्टर गिरा 4.86%.

# डॉलर. मज़बूत होता जा रहा है. तो? अरे ‘की तुलना में’ मज़बूत होता जा रहा है. किसकी तुलना में? हमारे रुपए की. लगातार. और इसका असर भी एडवर्स ही पड़ता है शेयर मार्केट में. तो पड़ रहा है.

# डोमिनो इफ़ेक्ट. कुचक्र. वन थिंग लीड टू एनदर. जब कोई पैसे निकालता है तो सब जगह पैसे निकालने की बाढ़ आ जाती है. तो मार्केट गिरा तो डोमिनोज़ इफ़ेक्ट पैदा हुआ.

देखिए, तभी तो सूचकांक को ‘संवेदी सूचकांक’ भी कहते हैं. क्यूंकि ये बहुत इमोशनल होता है. किसी कंपनी के सीईओ को छींक आती है तो उसका शेयर घट जाता है, किसी डील के होने की खबर भर आती है तो रॉकेट हो जाता है.

# मुझे क्या करना चाहिए-

दो मूल मंत्र जो मैं अपने इन्वेस्टमेंट में हमेशा ध्यान रखता हूं, वो है ‘दही’ और ‘कई’.

# दही- देखिए दही एक दिन में नहीं जमती. आपने देखा न कि शेयर अगर एक साल में नेगेटिव रिटर्न दे रहा है, तो भी पिछले चार पांच साल में रिटर्न का रंग हरा ही है. जब से शुरू हुआ है तब से इन्वेस्टर्स को 350 गुना अमीर कर चुका है. हालांकि शॉर्ट टर्म में आपको शेयर में नुकसान और सोने में फायदा दिख रहा है साथ ही दुआ है कि लॉन्ग टर्म में भी सोने में फायदा ही हो, लेकिन शेयर मार्केट में भी नुकसान नहीं होगा अगर थोड़ी दिनों पेशेंस बनाए रखेंगे. लेकिन ये पेशेसं, ये दही वाली बात अकेले किसी काम की नहीं.

# कई- देखिए अब अगर आप किसी एक शेयर में पैसा लगा रहे हैं तो हो सकता है सालों रुकने के बावज़ूद भी आपको चिंदी फायदा हो, या उल्टा नुकसान ही हो जाए. जुआ खेलने के हिसाब से तो इसमें कोई बुराई नहीं, लेकिन इंवेस्टमेन के हिसाब से, ये अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारना है.

तो आपको एक नहीं कई शेयर्स में पैसे लगाने होंगे. अब दो सवाल-

# अगर आपकी सेविंग्स ही बहुत कम है तो आप कैसे इतने शेयर्स खरीदेंगे?

# साथ ही आप कैसे जानेंगे कि कौनसे शेयर्स, किस सेक्टर के शेयर अच्छा परफोर्म कर सकते हैं.

कई सालों तक मुझे नहीं पता था डोमिनो प्लास्टिक के छोटे छोटे ब्लॉक होते हैं, एक को गिराओ आगे वाले गिरते चले जाते हैं. इसे ही डोमिनो इफ़ेक्ट कहते हैं.
कई सालों तक मुझे नहीं पता था डोमिनो प्लास्टिक के छोटे छोटे ब्लॉक होते हैं, एक को गिराओ आगे वाले गिरते चले जाते हैं. इसे ही डोमिनो इफ़ेक्ट कहते हैं.

इसके लिए सबसे अच्छा विकल्प है म्यूचल फंड. जो कई शेयर्स से मिलकर बना होता है. आप एक मुश्त लाख दो लाख रुपए का कोई अच्छा म्यूचल फंड खरीद सकते हैं या हर महीने 500-1000 रुपए किसी या किन्हीं म्यूचल फंड में इंवेस्ट कर सकते हैं. इसे कहते हैं डाईवर्सीफिकेशन. वो भी तीन लेवल पर.

# अव्वल तो आपने एक शेयर नहीं, म्यूचल फंड खरीदा. जिसमें कई शेयर्स होते हैं. और हर म्यूचल फंड आपकी अलग-अलग ज़रूरतों के हिसाब से बनाए जाते हैं. जैसे कुछ म्यूचल फंड किसी स्पेसिफिक सेक्टर (ऑटो, आईटी) के शेयर्स में पैसे लगाते हैं. कुछ म्यूचल फंड आपकी टैक्स सेविंग्स करते हैं. कुछ सिर्फ मार्केट में ही नहीं अन्य जगहों पर (सोना, सरकारी बॉन्ड्स) पर भी पैसा लगाते हैं. कुछ इंडिया ही नहीं यूएस और अन्य बढ़िया मार्केट्स पर भी पैसा लगाते हैं. और सब कुछ ट्रांसपेरेंट तरीके से. याद है न सेबी? उसी के चलते.

# दूसरा डायवर्सिफिकेशन तब हो जाएगा, जब आप एक नहीं दो तीन या ज़्यादा म्यूचल फंड्स में पैसे लगाएं.

# तीसरा डायवर्सिफिकेशन तब होगा, जब आप एकमुश्त नहीं हर महीने कुछ-कुछ पैसे लगाएं. इससे अगर मार्केट गिरता भी जाए तो भी चूंकि आपने गिरते हुए समय में भी पैसे लगाए होते हैं तो काफी हद तक नुकसान ज़ीरो आउट हो जाता है.

साथ ही इन म्यूचल फंड्स को हेंडल करने वाले भी अनुभवी और विशेषज्ञ होते हैं तो आपका पैसा डूबने की संभावना और भी कम हो जाती है.

लेकिन ओवर डायवर्सिफिकेशन से बचें. क्यूंकि इससे रिस्क तो कम होता चला जाएगा, मगर रिटर्न्स भी घटते चले जाएंगे. तो कम चुनिए मगर अच्छे चुनिए. मार्केट एक्सपर्ट्स से पूछिए. पिछले रिटर्न्स देखिए. अपनी ज़रूरतें देखिए. और एक अच्छे इन्वेस्टर की तरह बने रहिए…


# वीडियो देखें:

अर्थात: कोरोना वायरस से दुनिया को कितने पैसों का नुकसान होगा?-

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