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केक काटने का साइंटिफिक तरीका जान लीजिए, दुआएं देंगे (और केक भी)

हम लोग समय बहुत काटते हैं. और समय से भी ज़्यादा काटते हैं पेड़. लेकिन एक चीज़ ऐसी है जो शायद हम पेड़ से भी ज़्यादा काटते हैं. और वो चीज़ है केक.

अपने जन्मदिन पर केक कटता है. रिश्तेदारों और दोस्तों के जन्मदिन पर. सगाई पर. शादियों पर. सालगिरहों पर. स्थापना दिवसों पर. और न्यू-ईयर पर तो सरे आम चौक-चौराहों पे केक काटा जाता है. खूब हो-हल्ला आतिशबाजी के साथ. केक कटते देख किसी को कुछ गलत नहीं लगता. किसी के मुंह से उफ्फ तक नहीं निकलती. कुछ लोगों को ये बस कहते सुना है – ‘केक काटना गलत है. हमारी संस्कृति के खिलाफ है.’

जब मैं बच्चा था तो इन लोगों से कतई असहमत था. अब जब मैं इन लोगों से आधा सहमत हूं. आधा ऐसे कि केक काटना गलत नहीं है, केक काटने का हमारा तरीका गलत है. और ये तरीका संसकृति के खिलाफ नहीं, साइंस के खिलाफ है.

हाल कैसा है कटाव का?

केक काटने के दो तरीके चलन में हैं –

एक तो लोफरों वाला तरीका है. उदघाटन हुआ नहीं कि हाथ-पैर लेके टूट पड़ते हैं केक पे. जितना मुंह में आया, ठूस मारा. बचे-खुचे से एक दूसरे का चेहरा छपा मारते हैं. इनको तो यार क्या ही सही-गलत बताएं. ये सही-गलत के उस पार की दुनिया के लोग हैं.

पहले टाइप के लोग.
पहले टाइप के लोग.

दूसरा बकायदा सभ्य तरीका है. धीरे-धीरे सीधी रेखाओं में चाकू चलता है. सोफेेस्टिकेटेड आवाज़ में ‘हैप्पी बड्डे टू यू’ का गान किया जाता है. एक-एक करके केक के टुकड़े निकाले जाते हैं. खिलाए जाते हैं.

केक खिलाने का एक फिक्स पैटर्न होता है. पहले ज़्यादा इम्पॉर्टेंट लोगों को केक खिलाया जाता है. फिर थोड़ें कम इम्पॉर्टेंट लोगों को. जिनकी बहुत ही कम इज़्ज़त होती है, उनका नंबर सबसे आखिरी में आता है. और उनको केक प्लेट में रखकर देते हैं.

दूसरे टाइप के लोग.
दूसरे टाइप के लोग.

सब कुछ बढ़िया है. लेकिन बस एक दिक्कत है. और वो है केक काटने का हमारा तरीका.

इस सज्जन को क्या तकलीफ है भाई?

होता क्या है कि केक कटता है, तो खतम तो हो नहीं जाता एक बार में. बहुत बार ऐसा होता है कि हमलोग केक का कुछ हिस्सा खा-पचाकर बाकी का केक फ्रिज में रख देते हैं. पेट में जगह नहीं होती न इतनी.

जब तक पेट में दोबारा जगह बनती है, तब तक केक में हवा अपनी जगह बना लेती है, मुलायम ब्रेड की सतह पर. ब्रेड मुलायम से सख्त हो जाती है. और केक के उस हिस्से का स्वाद एकदम भूसा हो जाता है.

इत्ता खराब भी नहीं लगता. बस एग्ज़ेजरेट किया है.
इत्ता खराब भी नहीं लगता. बस एग्ज़ैजरेट किया है.

आप कहेंगे – ‘क्या करें? ब्रेड सख्त हो ही जाती है. कोई और तरीका भी तो नहीं है न?’ तरीका है गुरू. और बहुत ही सिंपल सा तरीका है. वो हम आपको देंगे, लेकिन पहले वार्निंग दे देते हैं.

वैधानिक चेतावनी – केक काटने का ये तरीका बड़ी पार्टियों के लिए नहीं है. वहां तो सब तुरंत खाकर सब साफ कर देते हैं. इसे घर पर ही दोहराने की कोशिश करें. जहां लोग कम हों.

कायदे का केक काटना

टोटल चार ही स्टेप हैं. चौथे से पांचवा नहीं है. तो पेश है केक काटने का साइंटिफिक तरीका.

1. नाली बनाना.
जैसा फोटो में दिखाया गया है, चाकू से वैसी दो समानांतर रेखाएं खींचें. जैसे नाली बना रहे हों. कटा हुआ हिस्सा खींच के निकाल लें. आपस में मिल-बांट के खा लें.

सीधी सीधी चलाना चाकू.
सीधी सीधी चलाना चाकू.

2. नाली पाटना.
केक के दोनों हिस्सों को आपस में चिपका दीजिए. नाली के बीच की दूरी पाटनी है. ऐसा करने केक हवा में एक्सपोज़्ड नहीं रहेगा. यहां आपने अपना केक सुरक्षित कर लिया है(नगर पालिका को बुलाने की कोई ज़रूरत नहीं). चाहें तो और खा सकते हैं, चाहें तो संभाल कर रख दें.

बिलकुल सटा के रखना
बिलकुल सटा के रखना.

3. नाली की खुदाई पार्ट 2.
कहानी यहीं खत्म नहीं हुई. आगे और भी तो खाना है. फिर से केक खाने के लिए फिर से नाली बनानी है. लेकिन जहां पहले बनाई थी उसके परपेंडीकुलर. केक को 90 डिग्री घुमा कर.

परपेंडीकुलल गैंग्स ऑफ वासेपुर के चर्चित किरदार का भी नाम है
परपेंडीकुलर गैंग्स ऑफ वासेपुर के चर्चित किरदार का भी नाम है.

4. लूप में खाएं
अब ये वाला पीस खाने के बाद केक के चार टुकड़े हो चुके होंगे. पेट भर गया हो तो इनको चिपका के फ्रिज में रख दीजिए. दोबारा भूख लगेगी तो फिर से नाली की खुदाई शुरू. जैसे सबसे पहले स्टेप में की थी.

लगभग पहले जैसा आकार. बस साइज़ छोटा हो गया.
लगभग पहले जैसा आकार. बस साइज़ छोटा हो गया.

अब यहां से बस चारों स्टेप रिपीट करने हैं. और केक खाते जाना है.

रुकिए-रुकिए. तीन स्टेप और हैं –

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