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मनुष्य की चुंबकीय शक्ति का राज़ क्या है?

पिछले दिनों नासिक के एक चचा का वीडियो भयंकर वायरल हुआ. वीडियो में धातु की बनी चीज़ें इनके अर्धनग्न शरीर से चिपकती नज़र आ रही हैं. सिक्के, चम्मच, पलटा आदि. वीडियो में नज़र आ रहे आदमी का नाम है अरविंद सोनार. अरविंद का दावा है कि वैक्सीन लगवाने के बाद इनके अंदर ये चुंबकीय शक्ति पैदा हो गईं. इस दावे के साथ टहल रहे हैं इनके वीडियो. सोशल मीडिया से लेकर न्यूज़ चैनलों तक.

एक नज़र में ये वीडियो देखने पर इनकी बात सच मान लेने का मन करता है. लेकिन दोस्तों, ‘तारे ज़मीन पर’ में ईशान नंदकिशोर अवस्थी कह गए हैं –

‘जो दिखता है, हमको लगता है, है. और जो नहीं दिखता, हमको लगता है, नहीं है. लेकिन कभी-कभी जो दिखता है, वो नहीं होता. और जो नहीं दिखता है, वो होता है’

इससे पहले कि आप मुझे गरियाने लगें, सीधे पॉइंट पर आते हैं

कोरोना की वैक्सीन से दशकों पहले भी कुछ लोगों के शरीर में चीज़ें चिपकाने का ये गुण देखा गया है. शुरुआत में इसे ‘बायो मैग्नेटिज्म’ यानी ‘जैव चुंबकत्व’ का नाम दिया गया. लेकिन इसमें एक बहुत बड़ा कैच है.

चुंबकीय शक्ति को लेकर जो हमारी वैज्ञानिक समझ है, उससे बायो मैग्नेटिज्म को नहीं समझाया जा सकता. फिर ये चीज़ें इन लोगों के शरीर से क्यों चिपक रही हैं? क्या ये दिमाग और कॉन्सनट्रेशन का कोई खेल है? या कोई ‘चमत्कार’ है? क्या विज्ञान की मदद से इसे समझा जा सकता है? और इस कथित चुंबकीय शक्ति की काट क्या है? ये सब जानने की कोशिश करेंगे.

ये साइंसकारी की एक्स्ट्रा क्लास है, जिसमें हम खबरों के बीच गड़े विज्ञान को खोद निकालते हैं. एक्स्ट्रा-क्लास में आज बात बायो मैग्नेटिज्म यानी जैव चुंबकत्व की. इस एपिसोड में सुनाएंगे हैरान करने वाली कुछ सच्ची-झूठी कहानियां. टटोलेंगे कथित चुंबकीय शक्तियों का विज्ञान? और परदा उठाएंगे दशकों पुराने रहस्य से.

कॉमिक्स से झरते किरदार

साल 1963. मार्वल कॉमिक्स की X-Man सिरिज़ में एक नया कैरेक्टर दिखाई दिया. नाम था मैग्नीटो. कहानी के मुताबिक मैग्नीटो असाधारण शक्तियों के साथ पैदा हुआ. वो आपने आसपास के चुंबकीय क्षेत्र को कंट्रोल कर सकता है. कोई भी धातु से बनी चीज़ मैग्नीटो के इशारों पर नाचती है.

आगे चलकर मार्वल ने एक्स-मैन सिरीज़ पर फिल्में बनाईं. ये फिल्में बंपर हिट हुईं. और मैग्नीटो आम लोगों के बीच खासा पॉपुलर हो गया.

इंडिया में इससे मिलता-जुलता एक किरदार राज कॉमिक्स में देखा गया. राज कॉमिक्स की सिरीज़ – सुपर कमांडो ध्रुव. इस सिरीज़ का एक अंक है – चुंबा का चक्रव्यूह. इसमें चुंबा मैग्नेटिक पावर वाले एक विलेन का नाम है.

लेकिन ये सब तो फिक्शन की बातें हैं. कोरी कल्पनाएं हैं. चलिए आपको रिएलिटी की तरफ लिए चलते हैं.

चुंबक प्रसंग

साल 1987. रूसके एक साधारण मज़दूर का घर. ये चर्नोबिल हादसे के बाद वाला साल था. और इसी साल इस परिवार के लोग धातु से बनी चीज़ें अपने शरीर पर चिपकाने लगे. सबसे बुज़ुर्ग सदस्य अपने शरीर से 23 किलोग्राम भारी वस्तु भी चिपकाने में सक्षम था. सब लोग हैरान थे. किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था.

ये इस किस्म का पहला केस था. इसके बाद तो जैसे मैग्नेट मानवों की झरी लग गई. 2011 में सर्बिया के कुछ बच्चे यही कारनामा दिखा रहे थे.

इसी साल क्रोएशिया में भी बच्चों में यही अजीब हरकत देखी गई.

2012 में मलेशिया का एक मैग्नेट-मैन.

201ृ4 में रशिया में एक और मैग्नीटो-बॉय पाया गया.

रोमानिया, जॉर्जिया न जाने कहां-कहां से ऐसे केस निकलकर आ रहे थे. और ये तो वो हैं जो न्यूज़ में छाए रहे. इसके अलावा भी कई होंगे.

भारत में भी चुंबकीय शक्तियां दिखाते लोग खबरों में छाए रहे. 2016 में मध्य प्रदेश के सागर से अरुण रैकवार का मामला सामने आया. इनके शरीर से चम्मच वगैरह चिपकते देखे गए.

इन खबरों में ये लोग किसी तरह की गोंद या कोई छुपी हुई ट्रिक इस्तेमाल नहीं कर रहे. इनके ये दावे जेनुइन हैं. लेकिन इसके पीछे की साइंस क्या है? क्या ये लोग सच में चुंबक बन गए हैं?

संक्षेप में पहले चुंबक के बारे में कुछ बातें समझ लीजिए

इलाका कुत्तों का होता है, चुंबकों का होता है ‘चुंबकीय क्षेत्र’.

हर चुंबक अपने आसपास एक चुंबकीय क्षेत्र बनाती है. और इस चुंबकीय क्षेत्र को पहचानना ज़्यादा मुश्किल काम नहीं है. हमें ज़रूरत है सिर्फ एक कंपास की.

पृथ्वी खुद एक बहुत बड़ी चुंबक है. इसलिए कंपास की सुई हमेशा उत्तर दिशा की ओर इशारा करती है. लेकिन किसी दूसरी चुंबक को कंपास के पास ले जाने पर सुई डगमगा जाती है. क्योंकि इस दूसरी चुंबक का चुंबकीय क्षेत्र पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र पर हावी हो जाता है.

अहम चुंबकस्मि, तत त्वम असि

क्या मानव शरीर एक चुंबकीय क्षेत्र बना सकता है?

जवाब है, हां. बिलकुल बना सकता है. हर किसी का शरीर हल्का-फुल्का चुंबकीय क्षेत्र बनाता ही है. इसके पीछे है हमारे शरीर में दौड़ने वाला करंट. लेकिन बिजली का चुंबक से क्या लेना-देना?

विद्युत करंट से चुंबकीय क्षेत्र बनने की खोज करने वाले वैज्ञानिक का नाम है हैन्स क्रिस्चियन ऑर्स्टेड. साल 1820 में ऑर्स्टेड ने देखा कि एक बिजली के तार के पास ले जाने पर कंपास की सुई हिलने लगती है. ये विद्युत धारा से चुंबकीय क्षेत्र बनने का पहला ठोस प्रमाण था.

1831 में माइकल फैरेडे ने इसके विपरीत प्रभाव की पुष्टि की. फैरेडे ने बताया कि मैग्नेटिक फील्ड बदलने से विद्युत करंट पैदा किया जा सकता है. पंखा और मोटर ऑर्स्डेट के दिए सिद्धांत से घूमता है. जनरेटर से बिजली उत्पादन फैरेडे के सिद्धांत पर होता है.

इसी सिद्धांत की बदौलत जनरेटर काम करता है. इसी की दम पर पावर प्लांटों में बिजली बनाई जाती है. और इसी के रहमो-करम से आपके ऊपर लगा पंखा घूम रहा है.

पंखे में बिजली पहुंचते ही उसके अंदर की कॉइल एक चुंबकीय क्षेत्र बनाती है. पंखे के अंदर लगी ये चुंबकें एक दूसरे को धकेलने लगती हैं. इसलिए जब आप स्विच ऑन करते हैं, तो पंखा घूमने लगता है.

तो काम की बात इत्ती सी है कि विद्युत करेंट एक चुंबकीय क्षेत्र की रचना करता है. लेकिन हमारे शरीर में कौनसी बिजली दौड़ रही है? बिजली बहुत तेज़ी से दौड़ रही है गुरू. हमारा दिमाग शरीर के अलग-अलग हिस्सों से इलेक्ट्रिकल सिग्नल्स से ज़रिए बातचीत करता है. पूरे शरीर में दौड़ने वाले ये इलेक्ट्रकल करंट हमारे इर्द-गिर्द एक चुंबकीय क्षेत्र बनाते हैं.

ये चुंबकीय क्षेत्र बहुत कमज़ोर होता है. इतना कमज़ोर, कि इसके आसपास कंपास ले जाने पर उसकी सुई नहीं हिलती. रत्ती भर भी नहीं. लेकिन स्पेशल उपकरणों की मदद से ये चुंबकीय क्षेत्र पहचाना जा सकता है.

मैग्नेटिक प्राणियों का कंपास टेस्ट

ये तो है आम ज़िंदगी. अब चलते हैं मेंटॉस ज़िंदगी की तरफ. उन लोगों के चुंबकीय क्षेत्र का क्या, जो मैग्नेट-मानव कहे जाते हैं. वो, जो अपने शरीर से सिक्के, चम्मच और अन्य बर्तन चिपकाने का दावा कर रहे हैं?

अगर सच में ये मैग्नेटिक प्राणी असामान्य चुंबकीय ऊर्जा पैदा कर रहे हैं, तो कायदे से इनका चुंबकीय क्षेत्र बहुत पावरफुल होना चाहिए. लेकिन ऐसा नहीं होता.

इन दावेदारों के पास कंपास ले जाने पर उसकी सुई ज़रा भी नहीं हिलती. मतलब इनकी चुंबकीय शक्ति पृथ्वी की चुंबकीय शक्ति से भी बहुत कमज़ोर है. और वो सिक्के या बर्तन उठाने के काबिल नहीं है.

तो फिर घूम फिर के सवाल वहीं अटकता है कि इनके शरीर से चीज़े क्यों चिपक जा रही हैं?

अगर मैग्नेटिज़्म का विज्ञान इसे नहीं समझा सकता, तो क्या ये जादू है? जवाब है, नहीं. चलिए इन मैग्नेट मानव वाले दावों का पोस्टमॉर्टम करते हैं.

आपके साथ एक छोटा सा प्रैंक हुआ है.

इन सभी दावों में कुछ नोटिसेबल समानताएं हैं.

ज़्यादातर तथाकथित मैग्नेट मानवों से धातु के अलावा ग्लास, प्लास्टिक और लकड़ी की चीज़ें भी चिपक जाती हैं. अगर ये मैग्नेटिज़्म होता, तो ये सब चीज़ें बिलकुल नहीं चिपकनी चाहिए थीं. आपने किसी चुंबक से ग्लास को खिंचते देखा है?

कंपास या दूसरे उपकरणों से टेस्ट किए जाने पर इनमें से किसी ने भी कोई खास चुंबकीय गुण नहीं दिखाए. आपने ये नहीं सोचा कि ये सब लोग नंगे काहे खड़े है? मैं ये सवाल नैतिकता के लिहाज़ से नहीं पूछ रहा हूं. ये सब लोग अपने शरीर के खुले हिस्सों पर ही ये बर्तन क्यों चिपका रहे हैं? अगर ये सच में मैग्नेटिक हैं, तो धातु कपड़े की मौजूदगी में भी चिपक जाती. साधारण कपड़ा चुंबकीय क्षेत्र में कोई खास बाधा नहीं डालते.

तो ये मैग्नेटिज़्म तो नहीं ही है, फिर ये हो क्या रहा है?

इसका जवाब जानने के लिए थोड़ा और ध्यान से देखना होगा.

चिपकू किस्म के लोग

इन सभी मैग्नेटिक मानवों में कुछ और फैक्टर कॉमन हैं.
इनकी त्वचा साधारण से अधिक इलास्टिक और चिपचिपी है.
ये शरीर के उन्हीं हिस्सों से चीज़ें चिपका रहे हैं, जहां पर बाल मौजूद नहीं है.
और ये जिस तरह की चीज़ें चिपका रहे हैं, उनकी सतह ज़्यादा स्मूद है.

जिस व्यक्ति ने ये सारे ऑब्ज़र्वेशन मुखर होकर पॉइंट आउट किया, उनका नाम है जेम्स रैंडी. रैंडी ने समझाया कि ये इनकी त्वचा की खासियत है कि इनसे चीज़ें चिपक जा रही हैं. बाल इस त्वचा से डायरेक्ट कॉन्टैक्ट बनने में बाधा खड़ी करते हैं. इसलिए ये बिलकुल क्लीन स्किन पर चीज़ें चिपका रहे हैं. इस बात को साबित करने के लिए जेम्स रैंडी ने टीवी पर एक मैग्नेट मैन के साथ लाइव डेमो दिया.

कोरिया का एक तथाकथित मैग्नेट मैन अपनी खुली छाती से भारी-भरकम चीज़ें चिपकाकर सबकों हैरान कर रहा था. रैंडी ने उसकी छाती पर ज़रा सा बेबी पाउडर मल दिया. इससे उसकी त्वचा कम चिपचिपी हो गई. और उसके शरीर से साधारण चीज़ें भी चिपकना बंद हो गईं. अगर ये सच में कोई चुंबकीय ऊर्जा होती, तो ज़रा सा बेबी पाउडर ये विस्मयी शक्ति क्षीण कर पाता.

तमाम सबूतों और गवाहों को मद्देनज़र रखते हुए, ये अदालत इस फैसले पर पहुंचती है, कि ये कोई चुंबक-बुंबक नहीं है. ये सब इनलोगों की त्वचा के कारण हो रहा है. इनकी स्किन बहुत चिपचिपी और लचीली है. इसलिए इनके नंगे बदन से बहुत कुछ चिपक जाता है.

क्या समझे?

हमारा मन बहुत बुद्धु है, वो हर नज़रा आने वाली चीज़ का सरलीकरण करता है. ज़्यादातर लोगों के जेहन में मैग्नीटो और चुंबा जैसे किरदार बसे हुए हैं. असल जीवन में वैसा कुछ दिखने पर हमारा साइंस-फिक्शनीय दिमाग सरलीकरण करने लगता है.

मैग्नेट-मैन वाला ये फर्ज़ी दावा कई दशकों से चलता आ रहा है. इस बार इसने वैक्सीनेशन वाली स्टोरी को भी साथ भांज लिया. भला हो जेम्स रैंडी जैसे संदेहवादियों का. उनको कोटि-कोटि प्रणाम.

हर चीज़ को ध्यान से देखिए. जादू प्रतीत होने वाली चीज़ को एक्स्ट्रा ध्यान से देखिए. साइंसकारी बनिए. और जाइए, पहले जाकर वैक्सीन लगवा आइए महाराज.


विडियो- साइंसकारी: इंसानी शरीर में चुंबकीय शक्ति होने की बात में कितना सच है?

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