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साइंसकारी: क्या होता है मॉनसून? कहां से आता है, कहां जाता है?

हम मॉनसून की साइंस समझेंगे. लेकिन उससे पहले पढ़िए प्राचीन संस्कृत कविता की ये पंक्तियां-

आषाढस्य प्रथमदिवसे मेघमाश्लिष्टसानु
वप्रक्रीडापरिणतगजप्रेक्षणीयं ददर्श।

अर्थात- आषाढ़ मास के पहले दिन पहाड़ की चोटी पर झुके हुए मेघ को विरही यक्ष ने देखा तो उसे ऐसा लगा मानो क्रीड़ा में मगन कोई हाथी हो।

कालिदास की लोकप्रिय रचना, मेघदूत. कालिदास ने करीब 1700 साल पहले इसे लिखा था.

आषाढ़ को बारिश वाला महीना भी कहते हैं. 1700 साल पहले भी सालाना कुछ फिक्स महीनों में बर्षा होती थी. आज भी ऐसा ही होता है. ये भारतीय भूभाग की एक खास घटना है, जिसे मॉनसून कहते हैं.

ये मॉनसून आखिर आता कैसे है? और आता है, तो साल के इन्हीं महीनों में क्यों आता है? मॉनसून का वो कौन सा अदृश्य हिस्सा है, जो हमें दिखाई नहीं देता? इन्हीं सवालों के जवाब पता करेंगे, साइंसकारी के इस एपिसोड में.

साइंसकारी में आज समझेंगे, रिम-झिम गिरे सावन. AKA मॉनसून.

मॉनसून क्या होता है, इसे लेकर बहुत से लोगों में अधूरी समझ है. इसलिए शुरुआत करते हैं डेफिनेशन से.

# मॉनसून माने क्या?

आम बोलचाल की भाषा में भारी वर्षा वाले मौसम को मॉनसून कहते हैं. लेकिन वैज्ञानिकों ने मॉनसून को अलग ढंग से परिभाषित किया है. उनका फोकस बारिश पर न होकर हवाओं पर है. मॉनसून की साइंटिफिक परिभाषा है – ‘मौसम बदलने से हवाओं का दिशा बदलना.’ और बारिश इन्हीं हवाओं के दिशा बदलने का नतीजा है.

मॉनसून अरबी शब्द ‘मौसिम’ से आया है. इसी मौसिम से हिंदी का शब्द मौसम भी आया. अरबी भाषा में मौसिम का अर्थ होता है ऋतु. सीज़न. मौसम.

मौसम बदलने के साथ हवाएं दिशा बदलती हैं. और ये हवाएं अपने साथ पानी लाती हैं. लेकिन कैसे और क्यों? इसे डीटेल में समझेंगे.

# समंदर और ज़मीन की गर्मी

हवाओं के दिशा बदलने की जड़ में है, समुद्र और धरती की गर्मी में फर्क. पृथ्वी पर अधिकतर गर्मी सूर्य से आती है. लेकिन सूरज की किरणों से सारी जगह एक समान गर्म नहीं होतीं.

सूर्य की किरणों से ज़मीन जल्दी गर्म हो जाती है. और समुद्र के पानी को गर्म होने में टाइम लगता है. ये ज़मीन और पानी के अपने गुणधर्म कारण होता है, जिसे फिज़िक्स में स्पेसिफिक हीट कैपेसिटी कहते हैं.

गर्मी के दिनों में सूर्य उत्तरी गोलार्ध के ऊपर अपना कहर बरपाता है. इससे ज़मीन बेहद गर्म हो जाती है. लेकिन सागर ज़मीन के मुकाबले ठंडे रहे आते हैं. इससे ज़मीन और सागर के ऊपर का वातावरण बदलने लगता है. स्पेसिफिक होकर बात की जाए तो, वातावरण का दाब बदलने लगता है. अंग्रेज़ी में कहते हैं, एट्मॉस्फेरिक प्रेशर.

# चले कैसे हवाएं सनन-सनन?

सीधा सा फंडा है. गर्मी और प्रेशर का 36 का आंकड़ा है. जहां की हवा ज़्यादा गर्म होती है, वहां का प्रेशर कम हो जाता है. और जहां की हवा ठंडी होती है, वहां का प्रेशर ज़्यादा हो जाता है.

प्रेशर में यही अंतर हवा के बहने का कारण बनता है. हवा हमेशा ज़्यादा प्रेशर से कम प्रेशर की तरफ भागती है. इसलिए समुद्र के ठंडे इलाके से भारतीय भूभाग के गर्म इलाके के की तरफ हवा बहने लगती है.

लेकिन हवा अकेले नहीं आती. वो पानी को भी साथ लाती है. ये कैसे होता है?
समुद्र कितना भी सख्त लौंडा बन ले, लेकिन पिघलता वो भी है. गर्मी में समुद्र का पानी भाप बनने लगता है. ये भाप ऊपर वायुमंडल में इकट्ठी होती है. और वहां हाई प्रेशर वाली हवा इस भाप से कहती है, चलो बुलावा आया है.

हवा इस भाप को ज़मीन के ऊपर ले आती है. और इस नमी भरी हवा से भाप बूंद-बूंद पानी बनकर टपकने लगती है. इस तरह मॉनसून की हवाओं से बारिश होती है.

# कहां से आया, कहां जाएगा?

भारत में जो मॉनसून आता है, उसे साउथ-वेस्ट मॉनसून कहते हैं. क्योंकि हवाएं दक्षिण-पश्चिम की तरफ से आती हैं. साउथ-वेस्ट मॉनसून दो मुख्य धाराओं में भारतीय भूभाग पर आता है. अरब सागर की तरफ से और बंगाल की खाड़ी की तरफ से.

अरब सागर से आने वाली धारा सबसे पहले केरल में आती है. जीके का सवाल है – मॉनसून में सबसे पहले बारिश कहां होती है? जवाब है, केरल. केरल के बाद मॉनसून उत्तर भारत की तरफ आगे बढ़ता है.

बंगाल की खाड़ी से मॉनसून की दूसरी धारा आती है. ये हवाएं भारत के पूर्वी हिस्से में एंट्री मारती है. इससे पश्चिम बंगाल, नॉर्थईस्टऔर बांग्लादेश में बारिश होती है.

हिमालय मॉनसून में अहम भूमिका निभाते हैं. ये मॉनसून के सामने एक दीवार बनकर खड़े होते हैं. और नम हवाओं को आगे जाने से रोकते हैं.


# मॉनसून का रिवर्स गियर

ज़्यादातर लोग मॉनसून के सिर्फ इस बारिश वाले हिस्से को ही पहचानते हैं. लेकिन ये मॉनसून की आधी कहानी है. बाकी आधी कहानी मॉसून की विदाई से जुड़ी है. जैसे मॉनसून भारतीय भूभाग पर आता है, उसी तरह वापस भी लौटता है. लेकिन ये लौटते समय हल्ला नहीं मचाता. शांति से निकल जाता है.

होता क्या है कि गर्मी और बारिश के बाद आती है ठंडी. इसलिए ज़मीन और समंदर के ऊपर का प्रेशर अलटी-पलटी हो जाता है.

शीत ऋतु में ज़मीन जल्दी ठंडी होती है. और पानी ज़मीन के मुकाबले गर्म रहा आता है. इससे भूभाग के ऊपर ज़्यादा प्रेशर बनता है और समुद्र के ऊपर कम प्रेशर. इसलिए हवा समुद्र की तरफ कूच कर जाती है.

लौटते हुए भी मॉनसून खाली हाथ नहीं जाता. वो भारतीय भूभाग से नमी लेकर चला जाता है. इसलिए जाड़े के मौसम में सूखी-सूखी हवाएं चलती हैं. अपने होठ और गाल फटने लगते हैं. ये सब मॉनसून के कारण होता है.


# आपदा लाने वाली आदतें

भारत के अलावा अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और सेंट्रल अमेरिका में भी मॉनसून होता है. लेकिन भारत जितने विराट रूप में नहीं होता. यहां मॉनसून एक उत्सव है.

मॉनसून और भारत का रिश्ता सदियों पुराना है. आज भी भारतीय अर्थव्यवस्था काफी हद तक मॉनसून कितना निर्भर करती है, ये किसानों की आंखें बताती हैं. जब भी मॉनसून के आगमन की घोषणा होती है, स्टॉक मार्केट में हलचल मच जाती है. कुछ लोगों के लिए मॉनसून राहत लेकर आता है. कुछ के लिए बाढ़ और आपदा.

हमारी हरकतें अधिक आपदाओं को निमंत्रण दे रही हैं. जानकारों की मानें तो ग्लोबल वॉर्मिंग से मॉनसून प्रभावित हो सकता है. मॉनसून का प्रकट असर तो सिर्फ भारत में होता है. लेकिन इसके बुरी तरह प्रभावित होने से पूरी दुनिया को नुकसान होगा. इसलिए पर्यावरण को लेकर सतर्क होना बेहद ज़रूरी है.

# मेरा यार हंस रहा है

मॉनसून निरी वैज्ञानिक घटना है. लेकिन इसकी सुंदरता को दर्ज करने का ज़िम्मा कलाकारों का है.

कालिदास के बाद भी कई कवियों ने वर्षा पर बहुत कुछ लिखा. काव्य-जगत में आज भी वर्षा होती रहती है. जैसे कि 2021 में आई कवि जानी की लोकप्रिय कविता – मेरा यार हंस रहा है, बारिश की जाए.

नहीं इस गाने पर खत्म नहीं कर सकते. जाते-जाते कुछ रिकमेंडेशन लेते जाइए. जिनके ज़रिए भारतीय मॉनसून को और अच्छे से दिल में उतार लेंगे. एक किताब पढ़िए और दो डॉक्यूमेंट्री देख डालिए.

1. राकेश मोहन का लिखा नाटक, आषाढ़ का एक दिन.

ये नाटक कालिदास और उनकी प्रेमिका मल्लिका के ऊपर है. अद्भुत किताब है. क्विक रीड है. इसे पढ़ते हुए तरह-तरह की भावनाएं सिर उठाने लगती हैं.

2. मॉनसून पर DW की डॉक्यूमेंट्री – दो हिस्सों में.

3. BBC की डॉक्यूमेंट्री – मॉनसून रेल्वे – दो हिस्सों में.


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