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खाली कुकर गैस पर चढ़ाने से क्या होगा?

कुकर में से चने निकाल दिए और ख़ाली कुकर गैस पर चढ़ा दिया. ये राशी बेन का काम था. और इस रवैए को लेकर कोकिला बेन की नाराज़गी पूरे देश ने देखी. लेकिन इस बीच रसोड़े की सबसे ज़रूरी बात इग्नोर कर दी गई. वो है इसके पीछे की साइंस. हम अक्सर प्रेशर कुकर ब्लास्ट होने की ख़बर सुनते हैं. कुकर से होने वाले ये धमाके जानलेवा भी साबित हो सकते हैं. तो कुछ लोगों के मन में ये सवाल आया कि क्या ख़ाली कुकर गैस पर चढ़ाने से ब्लास्ट हो जाएगा. विज्ञान के ज़रिए हमें इस सवाल का जवाब ढूंढने की कोशिश कर सकते हैं.

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साइंसकारी के इस एपिसोड में हम प्रेशर कुकर की साइंस समझेंगे. ये क्यों ज़रूरी होता है? कैसे काम करता है? ब्लास्ट क्यों हो जाता है? और सबसे बड़ा सवाल – क्या राशी का ख़ाली कुकर कोकिला बेन की जान ले सकता था?

प्रेशर कुकर की साइंस बहुत ही सिंपल और बहुत कमाल की है. लेकिन सबसे पहले हमें दो और कमाल की चीज़ों के बारे में जान लेना चाहिए.

आग और पानी

हमारे पुरखों को हज़ारों साल पहले आग के बारे में पता चला. उन्होंने आग से खाना पकाना सीखा. आग खाने से बहुत सारे कीटाणु ख़त्म कर देती है. स्वाद बढ़िया हो जाता है. और उसे आसानी से खाया जा सकता है.

आग ने हमें रोशनी दी, बल दिया और दिया बढ़िया भोजन. (विकीमीडिया)
आग ने हमें रोशनी दी, बल दिया और दिया बढ़िया भोजन. (विकीमीडिया)

आगे चलकर खाना पकाने के लिए आग के साथ पानी का इस्तेमाल भी होने लगा. खाने के हर हिस्से तक उष्मा पहुंचाने के लिए पानी एक ज़रिया बना. पानी आसपास प्रचुर मात्रा में पाया जाता है. और ये अच्छा हीट कंडक्टर भी होता है. उष्मा का संचालक.

फिर हमें समझ आया कि आग और पानी मिलकर खाने को नर्म बना देते हैं. जिससे उसे चबाना और पचाना आसान हो जाता है. तो बहुत सख़्त चीज़ों को उबालकर खाया जाने लगा. लेकिन एक दिक़्क़त थी. चीज़ों को उबालने में बहुत समय और ऊर्जा खर्च होती है. तो फिर ये देखा गया कि यार ज़्यादातर आग तो पानी को भाप बनाने में खर्च हो जा रही है. क्यों न इसे किसी तरह रोक लिया जाए.

हमने सुना है कि कैमिस्ट्री में पानी को H2O कहा जाता है. ये H2O पानी के मॉलीक्यूल यानी अणु का नाम है. आपको पता है एक ग्लास पानी में कितने H2O के मॉलीक्यूल होते हैं?

करीब 66,855 × 10^20.
25 अंक की संख्या. एक ग्लास पानी में इतने मॉलीक्यूल होते हैं.

ये H2O सॉलिड भी हो सकता है, लिक्विड भी और गैस भी. बर्फ, पानी या भाप. H2O इनमें से क्या होगा ये इस बात पर डिपेंड करता है कि उसके मॉलीक्यूल के आपसी रिश्ते कैसे हैं. यानी मॉलीक्यूल्स के बीच कितने मज़बूत बॉन्ड हैं. अगर बहुत मज़बूत बॉन्ड है, तो वो बर्फ होगी. ठीक-ठाक बॉन्ड हैं तो पानी. और कमज़ोर बॉन्ड हैं तो भाप.

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा? (विकीमीडिया)
पानी रे पानी तेरा रंग कैसा? (विकीमीडिया)

जब पानी बनता है भाप

इस बॉन्ड और गर्मी का रिलेशन समझने के लिए जेम्स बॉन्ड होने की ज़रूरत नहीं है. सीधा सी बात है कि नॉर्मल तापमान पर H2O तरल पानी रहेगा. अगर उसे ठंडा कर दिया जाए तो बर्फ बन जाएगी. और उसका तापमान बढ़ाया जाए तो भाप में कन्वर्ट होने लगेगा. कितना तापमान? नॉर्मली ये तापमान 100 डिग्री सेल्सियस होता है, जब पानी भाप बनने लगता है. इसे बॉइलिंग पॉइंट कहते हैं.

ये बॉइलिंग पॉइंट वातावरण के प्रेशर पर भी डिपेंड करता है. प्रेशर यानी दाब. अगर आसपास का प्रेशर ज़्यादा होगा तो ये बॉइलिंग पॉइंट भी ज़्यादा होगा. अगर प्रेशर कम होगा तो ये बॉइलिंग पॉइंट भी कम होगा. इसलिए समुद्रतल के बराबर ऊंचाई वाले इलाक़ों में पानी 100 डिग्री सेल्सियस पर भाप बनता है. लेकिन माउंट एवरेस्ट पर ये 70 डिग्री तापमान से उबलने लगेगा. क्योंकि वहां प्रेशर कम है.

प्रेशर और तापमान एक दूसरे पर डिपेंड करते हैं. ये गे-लूसेक का सिद्धांत कहलाता है.
प्रेशर और तापमान एक दूसरे पर सीधे निर्भर होते हैं. ये गे-लूसेक का सिद्धांत कहलाता है.

आप खुश हो रहे होंगे कि वहां तो कम तापमान पे ही पानी उबलने लगता है, कितनी अच्छी बात है. नहीं, ये बुरी बात है. हम चाहते हैं कि पानी उबलते वक़्त उसका तापमान ज़्यादा से ज़्यादा रहे. ताकि उसमें रखा भोजन जल्दी और अच्छे से पके.

मान लीजिए आप एक पतीले में पानी उबालने के लिए नीचे से हीट दे रहे हैं. पानी का तापमान 100 डिग्री पहुंचेगा, पानी खौलने लगेगा और वो तापमान उतने पे ही रुक जाएगा. आपकी जितनी हीट है वो H2O मॉलीक्यूल्स के आपसी रिश्ते खराब करने में खर्च हो जाएगी. तापमान बढ़ाने की जगह पानी को भाप बनाने में यानी खर्च होती जाएगी. और वो भाप अपने साथ ऊर्जा लेकर उड़ जा रही है.

कुकर का आविष्कार

कुछ लोगों को आइडिया आया कि अगर किसी तरह इस ऊर्जा का इस्तेमाल इस बर्तन के अंदर ही रोक लिया जाए, तो हमारा काफ़ी समय और ऊर्जा बच जाएगी. ये आइडिया तो बहुत लोगों को आया होगा लेकिन इसे इंप्लीमेंट फ़्रेंच फिज़िसिस्ट डेनिस पापिन ने किया. 1679 में पापिन ने स्टीम डाइजेस्टर का आविष्कार किया.

ये स्टीम डाइजेस्टर एक बहुत ही बेसिक प्रेशर कुकर की डिज़ाइन थी. जिसमें सारी भाप को क़ैद कर लिया जाता है. भाप के क़ैद होने से अंदर का प्रेशर बढ़ जाता है. क्योंकि पानी उबलने के साथ कुकर में हाई एनर्जी H2O मॉलीक्यूल्स ऊपर बढ़ते जाते हैं.

इस बात पर मतभेद है कि पापिन के कुकर ने स्टीम इंजन की डिज़ाइन को प्रभावित किया या नहीं. ( विकीमीडिया)
इस बात पर मतभेद है कि पापिन के कुकर ने स्टीम इंजन की डिज़ाइन को प्रभावित किया या नहीं. (विकीमीडिया)

अब कमाल की बात ये है कि अंदर का प्रेशर बढ़ने के साथ वहां बॉइलिंग पाइंट भी बढ़ जाता है. यानी खुले पतीले में जो पानी 100 डिग्री पर उबलता है. बंद कुकर में ये पानी 120 डिग्री पर उबलता है. पानी का तापमान जितना ज़्यादा होगा खाना बनने में लगने वाला समय उतना कम होगा.हिसाब देखिए.

जो चीज़ खुले पतीले में 100 डिग्री में उबलने पर 8 घंटे लेती है. वो प्रेशर कुकर के अंदर 120 डिग्री में 30 मिनट के अंदर बन जाती है बन जाती है. सबसे बढ़िया बात ये है कि गर्मी के साथ मिलकर कुकर के अंदर का प्रेशर खाने को बहुत ही मुलायम बना देता है.

लेकिन कई बार यही प्रेशर और गर्मी इतनी ज़्यादा हो जाती है कि कुकर ब्लास्ट होने का ख़तरा हो सकता है. डेनिश पापिन के बनाए कुकर से भी कई ब्लास्ट की घटनाएं देखी गईं. इन धमाकों को देखकर पापिन ने अपने कुकर में एक स्टीम वॉल्व डिज़ाइन किया. इसके लिए कुकर की लिड यानी उसके ढक्कन में एक छेद होता था. इस छेद के ऊपर एक वज़न रखा होता था. वज़न इतना कि प्रेशर एक डेंजर लेवल से ज़्यादा होते ही ये हट जाता था. और अंदर की भाप निकलने के लिए एक जगह बन जाती थी.

इसी वॉल्व ने आगे चलकर स्टीम इंजन की डिज़ाइन्स को प्रेरित किया. सिद्धांत वही है. पानी को गर्म करो. भाप बनेगी. भाप का प्रेशर इतना होगा कि वो भारी से भारी चीज़ को भी हिला देगा.

सोचिए जिस भाप का प्रेशर भारी-भारी रेलगाड़ियां चला सकता है, उससे कितना बल पैदा होगा. छोटे से कुकर में जब वही प्रेशर खूब ज़्यादा होगा तो बरसात तो नहीं होगी. ब्लास्ट ही होगा न.

कुकर बम भी बनाए जाते हैं. उसी बम का एक टुकड़ा. (विकिमीडिया)
कुकर बम भी बनाए जाते हैं. उसी बम का एक टुकड़ा. (विकिमीडिया)

हम आजकल जो कुकर इस्तेमाल करते हैं, उसमें पहले के मुक़ाबले काफ़ी सुधार हुए हैं. सबसे पहली तो उसके ऊपर की स्टीम वेंट, जहां से ज़्यादा प्रेशर होने पर भाप बाहर निकलती है. और हमारे कानों में वो मधुर संगीत सुनाई देता है.

इस स्टीम वेट के ऊपर एक वज़न रखा होता है. जिसे हम सीटी कहते हैं. इस सीटी का वज़न बहुत नाप तोल कर रखा जाता है. इसी के वज़न से डिसाइड होता है कि कुकर के अंदर कितना प्रेशर होने पर भाप को बाहर निकलने दिया जाएगा. कुकर की सीटी जितनी भारी होगी. उसके अंदर का मैक्सीमम प्रेशर उतना ज़्यादा होता है.

इसके अलावा ब्लास्ट का रिस्क कम करने के लिए कुकर की लिड में एक सेफ़्टी वॉल्व भी होता है. इस वॉल्व के अंदर एक ऐसा मटेरियल भरा होता जो ज़्यादा प्रेशर नहीं झेल सकता. अगर किसी कारण आपकी सीटी ब्लॉक हो गई. और कुकर का प्रेशर बढ़ता गया तो सेफ़्टी वॉल्व का मटेरियल हट जाएगा और सारी भाप वहां से बाहर निकलने लगेगी.

बम धमाका

इस सब के बावजूद ब्लास्ट क्यों होते हैं? होता ये है कि आपने कुछ बनाया और कुकर को अच्छे धोया नहीं. उस खाने के अवशेष से कुकर की सीटी और सेफ़्टी वॉल्व ब्लॉक हो सकते हैं. और ज़्यादा प्रेशर के कारण कुकर ब्लास्ट हो सकता है.

जब कुकर ब्लास्ट होता है तो अमूमन उसकी लिड यानी उसका ढक्कन हवा में बहुत तेजी से उछलता है. कई बार ऐसा भी होता है कि कुकर के अंदर बहुत ज़्यादा प्रेशर बना हुआ है और आपने ढक्कन हटा दिया. ऐसे अचानक ढक्कन खोल देने से भी ब्लास्ट होने का रिस्क होता है.

अब बड़े सवाल पर आते हैं. क्या ख़ाली कुकर गैस पर चढ़ाने ब्लास्ट हो सकता है?

अगर आप इसके कॉनसेप्ट पर ध्यान दे रहे हैं तो आपको इसका जवाब मिल गया होगा. कुकर के अंदर का सारा प्रेशर पानी के भाप में बनने से आ रहा है. अगर कुकर के अंदर पानी ही नहीं है तो कुछ ख़ास प्रेशर नहीं बनेगा. उसके अंदर की हवा का प्रेशर ज़रूर बढ़ सकता है, लेकिन वो इतना नहीं होगा कि कुकर ब्लास्ट हो जाए. होगा ये कि कुकर चढ़ा-चढ़ा बहुत गर्म हो जाएगा. और थोड़ी देर बाद वो काला हो जाएगा.

अगर राशी का इरादा कोकिला बेन को नुक़सान पहुंचाने का था, तो उसे स्मार्ट तरीक़े खोजने चाहिए. और कोकिला बेन को थोड़ा चिल करने की ज़रूरत है. चिल करने के लिए साइंस समझिए. और साइंसकारी बनिए.


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