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क्या है SC-ST ऐक्ट, जिसके लिए पूरा भारत बंद कर रहे हैं दलित संगठन

दलित उत्पीड़न रोकने के लिए 30 साल पहले SC-ST ऐक्ट बना था. इस ऐक्ट को और भी मजबूती मिली अप्रैल 2016 में. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले की सुनावई के दौरान इस कानून में कुछ बदलाव किया है. केंद्र सरकार कानून में बदलाव को वापस लेने के लिए सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटिशन दाखिल करने को कह रही है. लेकिन देश के दलित संगठन इसके विरोध में सड़क पर उतर आए हैं और भारत बंद की बात कही है.

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11 सितंबर 1989. राजीव गांधी की सरकार का कार्यकाल पूरा होने वाला था. 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए आम चुनाव में कांग्रेस को ऐतिहासिक जीत मिली थी. 404 सीटें जीतकर कांग्रेस सत्ता में थी. उस दिन संसद के पटल पर एक विधेयक रखा गया. इसे रखते हुए सरकार ने दलील दी-

”अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए तमाम सामाजिक आर्थिक बदलावों के बावजूद उनकी स्थिति बेहतर नहीं हुई है. क्रुरता के कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें उन्हें अपनी संपत्ति के साथ जान भी गंवानी पड़ी है. जब भी ये लोग अपने अधिकारों की बात करते हैं और किसी गलत बात का विरोध करते हैं, ताकतवर लोग उन्हें डराने की कोशिश करते हैं. जब भी एससी-एसटी समुदाय से ताल्लुक रखने वाले लोग अपनी और अपनी महिलाओं के आत्मसम्मान की बात करते हैं, प्रभावशाली लोग उन्हें अपमानित करते हैं. ऐसी स्थितियों में सिविल राइट ऐक्ट 1955 और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में किए गए प्रावधान उन्हें न्याय दिलाने में कमजोर पड़ रहे हैं. गैर एससी-एसटी लोगों की ओर से एससी-एसटी समुदाय के लोगों पर किए जा रहे अत्याचार को चिह्नित करने में दिक्कत आ रही है. ऐसे में ज़रूरत इस बात की है कि उनके खिलाफ होने वाले अत्याचार को परिभाषित किया जाए और ऐसे लोगों को सजा देने के लिए कड़े कानून बनाए जाएं. इसके अलावा राज्य और संघ शासित प्रदेश भी एससी-एसटी की सुरक्षा के लिए कानून बनाएं और जिसके साथ अत्याचार हो, उनके पुनर्वास की व्यवस्था करें.”

राजीव गांधी सरकार ने एससी-एसटी ऐक्ट को लागू किया था.
राजीव गांधी सरकार ने एससी-एसटी ऐक्ट को लागू किया था.

इन दलीलों के साथ केंद्र सरकार ने संसद में एक विधेयक पास किया. इसे नाम दिया गया अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम, 1989. संसद से पास होने के बाद इस विधेयक पर राष्ट्रपति ने हस्ताक्षर कर दिए, जिसके बाद 30 जनवरी 1990 को इस कानून को जम्मू-कश्मीर को छोड़कर पूरे देश में लागू कर दिया गया. इसके बाद अप्रैल 2016 में केंद्र सरकार ने इस कानून में कुछ संसोधन किए. इन संसोधनों के साथ 14 अप्रैल 2016 से इस कानून को फिर से लागू किया गया.

किस पर लागू होता है ये कानून

ये कानून देश के हर उस शख्स पर लागू होता है, जो अनुसूचित जाति-जनजाति (एससी-एसटी) का सदस्य नहीं है. अगर ऐसा कोई शख्स एससी-एसटी से ताल्लुक रखने वाले किसी शख्स का उत्पीड़न करता है, तो उसके खिलाफ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम, 1989 के तहत कार्रवाई की जाती है.

क्या करता है ये कानून

अगर कोई शख्स किसी भी तरह से किसी अनुसूचित जाति या जनजाति से संबंध रखने वाले किसी शख्स को प्रताड़ित करता है, तो उसके खिलाफ ये कानून कम करता है. और उस अपराध के लिए आईपीसी की धाराओं के अलावा इस कानून के तहत भी सजा भुगतनी होती है. इसके अलावा ये कानून पीड़ितों को विशेष सुरक्षा देता है. इस कानून के तहत पीड़ित को अलग-अलग अपराध के लिए 75,000 रुपये से लेकर 8 लाख 50 हजार रुपये तक की सहायता दी जाती है. साथ ही ऐसे मामलों के लिए इस कानून के तहत विशेष अदालतें बनाई जाती हैं जो ऐसे मामलों में तुरंत फैसले लेती हैं. इस ऐक्ट के तहत महिलाओं के खिलाफ अपराधों में पीड़ितों को राहत राशि और अलग से मेडिकल जांच की भी व्यवस्था है. एससी-एसटी के खिलाफ मामलों में पीड़ितों को अपना केस लड़ने के लिए सरकार की ओर से आर्थिक मदद भी दी जाती है.

किस-किस अपराध के लिए लागू होता है एससी-एसटी ऐक्ट

# अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के लोगों को अपमानित करना. 

# एससी-एसटी के किसी सदस्य का सामाजिक बहिष्कार.

# किसी एससी-एसटी के साथ जातिगत वजहों से कारोबार से इन्कार

# किसी एससी-एसटी को उसकी जाति के आधार पर काम न देने या नौकरी पर रखने से इन्कार करने

# किसी एससी-एसटी को जाति के आधार पर किसी तरह की सेवा देने से इन्कार करने

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# अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य से मारपीट करना.

# उनके घर के आस-पास या परिवार में उन्हें अपमानित करना या फिर उन्हें किसी भी तरह से परेशान करना.

# एससी-एसटी समुदाय के किसी शख्स के कपड़े उतारकर उसे नंगा करना या फिर उसके चेहरे पर कालिख पोतना.

# किसी भी तरह से सार्वजनिक तौर पर अपमानित करना.

# जमीन पर जबरन कब्जा करना, गैरकानूनी ढंग से किसी जमीन को हथिया लेना.

# किसी एससी-एसटी समुदाय के शख्स को भीख मांगने के लिए मजबूर करना

# उसे बंधुआ मजदूर बनाना

# वोट देने से रोकना या किसी खास को वोट देने के लिए बाध्य करना.

# किसी महिला को अपमानित करना

# किसी सार्वजनिक जगह पर जाने से रोकना

# अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य को अपना मकान छोड़ने पर मजबूर करना

ये सब ऐसे अपराध हैं, जिनमें भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत कार्रवाई होती है. लेकिन अगर ये अपराध किसी एससी-एसटी के समुदाय से ताल्लुक रखने वाले शख्स के साथ होता है, तो उसमें आईपीसी की अलग-अलग धाराओं के साथ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम, 1989 के तहत भी कार्रवाई होती है.

कितनी होती है सजा

आईपीसी की सजा के अलावा एससी-एसटी ऐक्ट में अलग से छह महीने से लेकर उम्रकैद तक की सजा और जुर्माने की व्यवस्था है. अगर अपराध किसी सरकारी अधिकारी ने किया है, तो आईपीसी के अलावा उसे इस कानून के तहत छह महीने से लेकर एक साल की सजा होती है.

अगर अपराध किसी सरकारी अधिकारी ने कियाा है तो…

अगर कोई सरकारी अधिकारी एससी-एसटी वर्ग से ताल्लुक नहीं रखता है और वो जानबूझकर किसी एससी-एसटी समुदाय के शख्स को परेशान करता है, तो उसे छह महीने से लेकर एक साल तक की जेल हो सकती है. किसी सरकारी अधिकारी पर केस तभी दर्ज किया जा सकता है, जब पूरे मामले की जांच के दौरान सरकारी अधिकारी दोषी पाया गया हो.

विशेष अदालत की है व्यवस्था

अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम, 1989 के तहत विशेष अदालतों की भी व्यवस्था है. अधिनियम की धारा 14 के तहत इस कानून के तहत दर्ज केस के ट्रायल के लिए विशेष अदालत की व्यवस्था की गई है, जो हर राज्य में बनी हुई है.

क्या होती है केस दर्ज होने के बाद की प्रक्रिया

अगर किसी के खिलाफ एससी-एसटी ऐक्ट के तहत केस दर्ज होता है, तो पुलिस उस शख्स को तुरंत गिरफ्तार कर लेती है. इस केस में किसी तरह की अग्रिम जमानत नहीं मिलती है. गिरफ्तारी के बाद डिस्ट्रिक्ट जज ही जमानत दे सकता है. इसके अलावा किसी शख्स की गिरफ्तारी के 60 दिन के अंदर पुलिस को चार्जशीट दाखिल करनी होती है. चार्जशीट दाखिल होने के बाद पूरे मामले की सुनवाई विशेष अदालत में होती है, जो एससी-एसटी के मामलों की सुनवाई के लिए बनी होती है.

क्यों है विवाद

सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट

नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक देश भर में 2016 में कुल 11060 ऐसे केस दर्ज हुए, जो एससी-एसटी ऐक्ट के तहत थे. इनमें से जांच के दौरान 935 शिकायतें पूरी तरह से गलत पाई गईं. चूंकि शिकायत दर्ज होने के तुरंत बाद गिरफ्तारी तय होती है, ऐसे में इस कानून को लेकर हमेशा से विवाद रहा है. कई बार राजनैतिक दबाव में भी इस कानून का दुरुपयोग होता रहा है. इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की गई थी. सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के बाद इस कानून को फिर से परिभाषित करते हुए 20 मार्च को कुछ निर्देश दिए. इसके तहत-

1.एससी-एसटी ऐक्ट के मामलों की जांच कम से कम डिप्टी एसपी रैंक के अधिकारी करेंगे. पहले ये जांच इंस्पेक्टर रैंक के अधिकारी करते थे.

2.किसी भी सरकारी अधिकारी पर केस दर्ज होने पर ही उसकी गिरफ्तारी तुरंत नहीं होगी. उस सरकारी अधिकारी के विभाग से गिरफ्तारी के लिए इजाजत लेनी होगी.

3.अगर किसी आम आदमी पर एससी-एसटी ऐक्ट के तहत केस दर्ज होता है, तो उसकी भी गिरफ्तारी तुरंत नहीं होगी. उसकी गिरफ्तारी के लिए जिले के एसपी या एसएसपी से इजाजत लेनी होगी.

4.किसी पर केस दर्ज होने के बाद उसे अग्रिम जमानत भी दी जा सकती है. अग्रिम जमानत देने या न देने का अधिकार मैजिस्ट्रेट के पास होगा. अभी तक अग्रिम जमानत नहीं मिलती थी. जमानत भी हाई कोर्ट देता था.


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