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'प्रिय लल्लनटॉप, धोनी और क्रिकेट सिर्फ आंकड़े ही नहीं हैं'

सत्य व्यास लल्लनटॉप के पुराने साथी हैं, हाल के सालों में हिंदी के उदीयमान लेखक के रूप में उभरे हैं. (बेस्टसेलर बिना कहे ही समझ लीजे!) सत्य व्यास ने ‘बनारस टॉकीज’ से नया पाठक वर्ग बनाना शुरू किया तो शहर बदल दिल्ली पहुंचे. पाठक वर्ग भी ‘दिल्ली दरबार’ पहुंचा. वहां से कुछ बरस पीछे बोकारो लौटे और ‘चौरासी’ से होते हुए ‘बाग़ी बलिया’ लिखी-पढ़ाई. क्रिकेट के किस्सों में डूबे रहते हैं और कहानियां यूं सुनाते हैं मानो आज सुबह की बात हो.

हमारे साथी सूरज ने धोनी के T20 टीम का मेंटॉर बनने पर एक ओपिनियन लिखा था. और इससे असहमत सत्य ने इस मसले पर अपने विचार रखे हैं.

प्रिय The lallantop
शुरुआती दिनों से ही आपका नियमित पाठक रहा हूं और बिना शक-ओ-सुबहा यह कहने की आजादी ले रहा हूँ कि आपने जर्नलिज़्म मे एक मेयार स्थापित किया है. आपको बधाई. मगर मेरे लिखने का कारण दीगर है. और नजरंदाज नहीं कर पाया इसलिए लिख रहा हूं. आज सुबह फेसबुक स्क्रॉल करते हुए एक स्टोरी दिखने लगी जिसका उनवान यूं था,

‘सिर्फ धोनी के होने से वर्ल्ड कप जीता जाता तो हम तीन बार सुपर-8 में बे इज्जत न होते.’

क्लिक बेट की महत्ता समझता हूं. समझता हूं कि यह जरूरी होता होगा. मगर यह भी बताते चलना जरूरी समझता हूं कि खेल मे हार होती है, जीत होती है, ड्रा भी होता है. बेइज्जती नहीं होती. खेल के मैदान से दूर आपको युद्ध के मैदान में भी ले चलूं तो करनाल युद्ध हारने के बाद जब मुगल सेनापति सादत खान को देखते हुए नादिर शाह ने उसे कंधे से उठाए हुए कहा,

‘अच्छा लड़े.’

वह तो खैर युद्ध ही था. हम तो खेल की बात कर रहे थे.

खैर, मन खिन्न होने के बावजूद आगे पढ़ने को हुआ. दूसरे पैराग्राफ मे लिखा पाया,

‘धोनी के आने से देवताओं में हर्ष का माहौल है.’

यह व्यङ्गोक्ति होगी, ऐसा समझता हूं. देवताओं की ही बात आयी तो याद आया. निःशस्त्र नारायण का पांडवों के खेमे मे होना मात्र ही एक अतिरिक्त ऊर्जा का संचार कर जाता है. किसी भी दल को बस उसी एक अतिरिक्त ऊर्जा की जरूरत होती है. यहां यह उदाहरण मात्र है. नर से नारायण की क्या तुलना.

आंकड़ों की बात नहीं करता. और बिना किसी किन्तु-परंतु के यह मान लेता हूं कि आंकड़े सारे सही हैं. फिर भी कहूंगा कि यह मेरी मूर्खता ही होगी अगर मैं अजय शर्मा को सचिन तेंडुलकर के ऊपर तथा अफ़ग़ानिस्तान के बहीर शाह को सर डॉन ब्रैडमैन के ऊपर तरजीह दे दूं. आपको पता ही होगा मगर पाठकों को बताता चलूं कि डोमेस्टिक क्रिकेट में अजय शर्मा के आंकड़े सचिन से बेहतर हैं और 1000 प्रथम श्रेणी रन के मामले में तो बहीर शाह ने डॉन ब्रैडमैन को 25 % मार्जिन से पीछे छोड़ दिया है.

1992 विश्व कप की याद आती है. मार्टिन क्रो ने 114 के औसत से बल्लेबाजी की थी, जबकि जावेद मियादाद ने लगभग आधे औसत से.1992 सेमीफाइनल को याद करते हुए इंजमाम कहते हैं कि दूसरे छोर पर खड़े जावेद भाई से मैंने पूछा कि जावेद भाई करना क्या है? उन्होने कहा- करना वही है जो तुझे सबसे अच्छा आता है. इंजमाम ने वही किया जो उन्हे सबसे अच्छा आता था. रिजल्ट हम सब के सामने है. यही अनुभव है. यह किसी बड़े खिलाड़ी के साथ खड़े होने का करिश्मा है. इसके न होने से क्या होता है वह भी बताता हूं.

उसी मैच की बात है. मार्टिन क्रो अनुभवी खिलाड़ी थे और अपनी टीम को अपने खेल और अनुभव के बदौलत ही सेमी फ़ाइनल तक ले गए थे. 230 के जीत वाली पिच पर न्यूजीलैंड 262 बना ले गया. क्रो के पांव मे चोट लग गयी. वह फील्डिंग करने नहीं उतरे. उन्होने अपने उप कप्तान जॉन राइट को एक पर्चा दिया जिसमे 17 दफा बौलिंग चेंज करने का प्लान था.जॉन राइट उतरते ही पर्चा भूल गए. बोलिंग कोई 6 दफा ही बदली. जब तक जॉन राइट उस 17 बार बोलिंग चेज़ के पीछे के अनुभव को समझ पाते, खेल हाथ से निकल चुका था.

1997 का ब्रिजटाउन टेस्ट कौन भारतीय प्रेमी भूल सकता है. आखिरी पारी में जब भारत को जीत के लिए महज 121 रन बनाने थे, कप्तान ब्रायन लारा उदास हो गए. अगले दिन के खेल से पहले वाली रात कर्ट्ले एम्ब्रोस के कहा-

‘कप्तान यह मैच हम तुम्हारे लिए जीतेंगे.’

नतीजा! भारत 81 रन पर सिमट गई. सचिन पहली दफा रोते देखे-सुने गए.

इमरान खान को 92 विश्व कप से पहले संन्यास से पहले वापस बुलाने के वक्त भी सरफराज नवाज़ ने बुलंद मुखालफत की थी. इमरान बहरहाल आए और इतिहास बनाया. हरशेल गिब्स कहते थे कि हंसी क्रोनिए के महज आस पास रहने से जज्बा बना रहता है. डेव व्हात्मोर और गैरी कर्स्टन के चुनाव का मानदंड अगर उनका फ़ाइनल में प्रदर्शन रखा गया होता तो तारीख ने कुछ और ही कहानी लिखी होती.

खेल आंकड़ों से इतर भी होता है. मरहूम खिलाड़ी और कमेंटेटर टोनी ग्रेग कहा करते थे-

‘क्रिकेट इज प्लेड बिट्वीन द इयर्स.’

यह दिमाग का भी खेल है और उससे भी खेला जाना चाहिये. आंकड़े बन जाते हैं, बिगड़ भी जाते हैं. क्रिकेट सिर्फ आंकड़ो से नहीं खेला जाता. नर, नारायण नहीं है.

हासिल हुई भी अक्ल ए फलातूँ आर तो क्या
चलती नहीं किसी कि मुकद्दर के रु ब रु

प्रैक्टिकल बातों पर आऊं तो कहता चलूं कि वेंकेटेश प्रसाद बताते हैं कि सुपर ओवर मे छह गेंदबाज चुनने का फैसला मेरा था और कप्तान धोनी ने कोई समस्या नहीं दिखाई थी. हम जीते. सचिन कहते हैं कि वर्ल्ड कप फ़ाइनल मे युवराज से ऊपर धोनी को भेजने की सलाह मेरी थी और धोनी ने उसका सम्मान किया था. सौरव के आखिरी मैच की आखिरी पारी में उन्हे कप्तानी दे देने का कोई दबाव बीसीसीआई की ओर से आया हो ऐसा कोई खेल प्रेमी नहीं समझता. यह उनकी अपनी सदाशयता थी जो बताती है कि खिलाड़ी मैदान के बाहर भी रिश्तों को तरजीह देना जानता है.

शास्त्री और विराट से टकराव की जो बात आलेख में ‘तय’ बताई गयी है वह एकिक नियम के सवाल जैसी है, जहां हम सवाल का हल ही अनुमान के आधार पर करते हैं. फिल्म कांटे के महेश मांजरेकर याद आते हैं जो कहते हैं कि

‘मेरी बुआ को मूंछे होती तो चाचा कहता.’

जो बातें भविष्य के गर्भ में हैं, और जिनका होना अनुमान पर आधारित है.

बहुत लिखना है पर जानता हूं कि आप लोग 700 शब्द पर महदूद कर देंगे. इसलिए विराम देता हूं.


क्या भारत ने पांचवां टेस्ट खेलने से इनकार करते हुए इंग्लैंड को विजयी मान लिया?

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