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'बराला कांड' पर सबसे सही बात इस आदमी ने कही है!

vineet singh विनीत दी लल्लनटॉप के रीडर और पक्के वाले दोस्त हैं. बलिया से हैं. जहां से चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने थे. उन्हीं ने देवस्थली विद्यापीठ स्कूल खोला था जिस स्कूल में पढ़े हैं विनीत. आजकल मुंबई में रहते हैं और वहीं से दुनिया देख रहे हैं. अपने देखे सुने का तमाम एक्सपीरिएंस लल्लन के साथ भी बांटते हैं. अपने दोस्त मकालू से परेशान रहते हैं, उसके किस्से भेजते हैं. आप भी पढ़िए.


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मैं कल शाम चाय की दुकान पर बैठा अख़बार पढ़ रहा था. एक कार आकर रुकी. उसमें चार लड़के बैठे थे. सामने बैठे लड़के ने चाय वाले को चिल्ला के आवाज लगायी. शब्दों के श्रृंगार के लिए दो चार गालियां भी साथ थीं. चाय वाला सारे ग्राहकों को छोड़ कर भागता हुआ कार के पास गया. साथ में दो सिगरेट भी ले गया- भइया बहुत दिन बाद इधर आए. आते रहा करिए.

लड़के ने चाय वाले को बिल्कुल भाव नहीं दिया. सिगरेट जलाया. और बिना कोई रिएक्शन दिए धुंआ छोड़ते हुए आगे बढ़ गया.
चाय वाला वापस आया तो मैंने पूछा- अबे ये कौन लौंडा था जिसको तू इतना भइया-भइया कर रहा था?

चाय वाला जवाब देता उससे पहले वहां मकालू आ धमका. वही मेरा वाहियात दोस्त. बोला – गुरु तुम्हारी आंखे हैं या गोटी?

सही सलामत और अच्छी भली आंखें हैं मेरी. और मेरी बातों के बीच में तुम क्यों टांग घुसेड़ रहे हो? मैंने तुमसे तो पूछा नही- मुझे मकालू के बेवजह दखल से गुस्सा आ रहा था.

गुरु आंखें होती तो देख लेते. कोई मामूली लौंडा नहीं था. अपने नेता जी का लड़का था. लड्डू भइया नाम है- मकालू ने पात्र परिचय कराया.

इसके नाम में ही भइया है क्या? और मैं कैसे पहचान जाता भला?

क्या गुरु. उंगलियां नहीं देखीं? कितनी अंगूठियां थीं सोने की. गले में लटकी सोने की चेन भी नहीं दिखी. रेबेन का चश्मा भी नहीं दिखा तुमको? उसकी रोलेक्स की घड़ी नहीं देख पाए तो कम से कम अपनी घड़ी ही देख लेते. देख नहीं रहे शाम हो गयी है. ये वक़्त शेरों के शिकार पर निकलने का है. और रही बात ‘भइया’ की तो लडडू को उसके बाप भी डर के मारे भइया ही कहते हैं – मकालू ने जवाब दिया.

अच्छा अच्छा. अब याद आया. ये वही है ना जो रात में लड़कियों को छेड़ता चलता है – मैंने इसके कई किस्से सुन रखे थे.

मकालू उखड़ गया – कभी किसी को छेड़ते नहीं हैं लड्डू भइया. हां, थोड़ी हंसी ठिठोली जरूर कर लेते हैं. इसमें क्या बुराई है? और गुरु कभी कभी लड़कियों के बारे में भी तो बोला करो. रात को अकेले घूमना कहा तक सही है? रात को छोटे छोटे कपडे पहन कर घूमना अच्छी बात है? लड़कों से मुस्करा के प्यार से बात करना कहां तक सही है? फिर लड़कों का मन डोल गया तो लड़के बुरे बनते हैं.

कैसी बेहूदा बात कर रहे हो मकालू. तुम साले खुद कच्छा पहन कर पूरे गांव में दातून रगड़ते घूमते हो तो वो ठीक है. लड़कियों के लिए चाहते हो कि उनको बोरे में भर कर रखा जाए और लड़की मुस्करा के बात कर दे तो ग्रीन सिग्नल समझ के शुरू हो जाते हो और अगर तुम्हारी तरह गालियां देकर बातें करे तो असभ्य और चरित्रहीन घोषित कर देते हो. और एक बात मेरी समझ में नहीं आती, आखिर शाम ढलते ही ऐसा क्या हो जाता है ऐसे लड़कों को? अबे दिन भर जिस तमीज में रहते हो वही तमीज रात को कहां चली जाती है? और तुमने ये रात-रात की रट क्या लगा रखी है. क्या रात सिर्फ मर्दों की जागीर है?

मकालू बोला – गुरु नाराज ना हो और फालतू में अपना खून ना जलाओ. मेरी बातों को समझो. मैं जो कह रहा हूं वो भी समझो और जो नहीं कह रहा वो भी समझने की कोशिश करो.

बको. कोशिश करता हूं – मुझे गुस्सा आ रहा था.

गुरु दरअसल ये समाज बुनियादी तौर पर ऐसा ही है. जितना सुन्दर और नेक है उतना ही अश्लील और उतना ही ज्यादा डरावना भी है. दिन में लोग अपने अंदर के जानवर को जैसे तैसे खूंटे में बांध कर रख लेते हैं. लेकिन शाम होते ही सभ्यता की परत धीरे धीरे उतरने लगती है और अंदर का जानवर किसी सियार की तरह आवाजें मारने लगता है और फिर कभी ना कभी हम रंगे हाथों पकडे जाते हैं.

मैं मकालू को बहुत ध्यान से सुन रहा था.

गुरु सार्वजनिक रूप से बड़ी-बड़ी आदर्शवादी बातें करने वाले लोग भी निजी जीवन में कई बार छोटी-बड़ी चोरी कर लिया करते हैं. नैतिक शुचिता की बातें करने वाले मित्र सामने से आती लड़की को आंखों से टटोलते हुए ओझल होने तक छोड़ के आते हैं. और करीबी दोस्तों के बीच उनकी अश्लीलता सारी हदें पार कर जाती हैं. सबसे बड़ा दुर्भाग्य ये है कि इस प्रवृति का अमीर-गरीब या रसूखदार और कमजोर होने से कोई लेना देना नहीं होता है. और ना ही इसका किसी खास पेशे से ताल्लुक है.

लेकिन उनके घर के लोगो को तो उन्हें सही गलत का फर्क सिखाना चाहिए या नहीं?

तुम भी कहां अटके हो गुरु. बात समझते ही नहीं. अरे जब बाप ही डर के मारे बेटे को लड्डू भइया कहता है. वो अपने लड़के को क्या घंटा सिखाएगा – मकालू ने कन्क्लूड किया.

ऐसा बहुत कम होता है जब मैं मकालू से बात करते हुए गुस्से में वॉकआउट ना कर जाऊं. लेकिन कल मैं मकालू की बातों से सौ फीसदी सहमत था. कल मैंने पहली बार अपने साथ साथ मकालू के लिए भी एक चाय आर्डर किया.


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अगर आप भी सिगरेट और चाय उधार की पीते हैं तो ये पढ़िए!

 

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