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'ताजमहल ध्वस्त हो गया तो कौन दुखी होगा और कौन खुश होगा?'

पियूष पांडे
पीयूष पांडे

पीयूष पांडे टीवी पत्रकार हैं. व्यंग्यकार हैं. किताबें भी लिखी हैं, हाल ही में आई ‘धंधे मातरम्’. पीयूष जी हमारे लिए भी लिखते हैं. आपने उन्हें ‘लौंझड़’ नाम की लल्लनटॉप सीरीज में पढ़ चुके हैं. पढ़िए उनका एक और व्यंग्य


फुटबॉल वर्ल्डकप खत्म हो गया. 50 दिन तक फुटबॉल में चीरा लगा-लगाकर मैंने कई व्यंग्य निकाले. लेकिन वर्ल्ड कप क्या खत्म हुआ, ऐसा लग रहा है कि खोपड़ी के एंटीने को बंदरों ने उखाड़ दिया. व्यंग्य का कोई सिग्नल पकड़ ही नहीं रहा. हाल वैसा ही है जैसे एक जमाने में कस्बे में टीवी का एंटीना सिग्नल पकड़ना बंद कर देता था. उस वक्त अचानक कोई धुंधली तस्वीर टीवी पर चमक उठती तो पूरा परिवार संभावना के उत्साह में डूब जाता था. ऐसा ही हाल मेरा है. रह-रहकर आइडिया दिमाग में चमकता है, और फिर झटके में गुम हो जाता है. काफी कोशिश के बाद भी मस्तिष्क के सैटटॉप बॉक्स ने आइडिया की धुंधली तरंगों को साफ तस्वीर में तब्दील नहीं किया तो मैंने निठल्ला चिंतन की राह पकड़ी.

बंदा चाह ले तो ईश्वर मिल जाता है, मुझे तो अदद विषय चाहिए था. तो निठल्ला चिंतन शुरु करते ही आइडिया सामने पड़े अखबार की सुर्खियों में मिल गया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ताज को खूबसूरत बनाओ या ध्वस्त कर दो. अब सुप्रीम कोर्ट कतई निठल्ला नहीं है,लेकिन 1995 से हर 10-15वें दिन ताजमहल को लेकर चिंता जताता है. सरकार और अधिकारी हैं कि सुनते नहीं. अब कल ही केंद्र ने फैसला किया है कि ताज को प्रदूषण मुक्त करने के लिए समिति बनाएगी. दो साल बाद जब सुप्रीम कोर्ट सरकार से पूछेगी कि भइया, बताओ समिति ने क्या किया? तो पता चलेगा कि ताज को प्रदूषण मुक्त कराने के नाम पर अधिकारियों ने दुनिया के छह अजूबों की सैर कर ली और 30-40 करोड़ का बिल सरकार को थमा दिया. बाकी-हाल वैसे का वैसा.

ताज महल के पीछे से होकर यमुना बहती है.
ताज महल के पीछे से होकर यमुना बहती है.

निठल्ला चिंतन करते वक्त मेरे दिमाग में ख्याल आया कि ताजमहल ध्वस्त हो गया तो कौन दुखी होगा और कौन खुश होगा. सबसे ज्यादा दुखी ताजमहल परिसर में घूम रहे बंदर होंगे, जिन्होंने दुनिया के सातवें अजूबे पर बाकायदा कब्जा कर रखा है. खुश आगरा में रह रहे वो लोग होंगे, जिन्हें हर हफ्ते, दो हफ्ते में रिश्तेदारों को लेकर ताजमहल घूमाने ले जाना पड़ता है. आगरा के कई परिवारों में तो एक बेरोजगार बंदा सिर्फ इसी काम में लगा हुआ है कि वो रिश्तेदारों को ताजमहल घुमाए. कई बार दूरदराज के रिश्तेदार सिर्फ इसलिए आगरा वाली बूआ,दीदी या चच्चा के यहां आ टपकते हैं, क्योंकि उन्हें ताजमहल देखना होता है. वरना, वे व्हाटसएप तक पर भाव नहीं देते.

निठल्ले चिंतन की खूबी यही है कि वो कोई भी दिशा पकड़ सकता है. तो मेरे मन में ख्याल आया कि शाहजहां ने ताजमहल बनवाया ही क्यों. ये मुमताज से प्यार में ताज बनाने वाली थ्योरी जमती नहीं क्योंकि शाहजहां की छह बीवियां थी. अगर एक से कुछ ज्यादा मुहब्बत होती तो बाकी पांच जीना मुहाल कर देतीं. शाहजहां साहब कितने भी बड़े बादशाह रहे हों, पांच बीवियों का कोपभाजन नहीं झेल सकते थे. पांचों मिलकर ऐसा बवाल काटती कि शाहजहां पहले ही औरंगजेब को राजपाट सौंप लालकिले में बंद हो जाते. हो सकता है वो रईसी दिखाना चाहते हों. अब आम आदमी रईस हो जाता है तो फॉर्च्यूनर खरीदता. विदेशी रिवॉल्वर खरीदता है. या बेटी की शादी में 10 की जगह 20 स्टार्टर रखवा लेता है. लेकिन बादशाह बेचारा क्या करता? बनवा दिया ताजमहल. उस वक्त माइकल जैक्सन टाइप के सितारों का कंसर्ट होता नहीं था, वरना किसी इंटरनेशल स्टार को बुला लेता. औरंगजेब और दाराशिकोह का भी निकाह हो लिया था. वरना स्विटजरलैंड में डेस्टिनेशन वेडिंग करते हुए बारात में शाहरुख जैसे किसी सितारे को बुलाया जा सकता था और रिसेप्शन में 20 एक्स्ट्रा व्यंजन बनवाकर रईसी झाड़ी जा सकती थी.

ताजमहल दुनिया के सात अजूबो में से एक है.
ताजमहल दुनिया के सात अजूबो में से एक है.

कुल मिलाकर आदमी विकट रईस हो तो क्या करे. सो ताजमहल ही बनवा दिया. अजूबा. हो सकता है कि शाहजहां ने आगरा की अर्थव्यवस्था में बढ़ोतरी को ध्यान में रखते हुए 20 वर्षीय मनरेगा स्कीम के तहत ताजमहल बनवाया हो. मजदूरों को काम मिल जाएगा. ताज के आसपास कॉलोनी बन जाएंगी. ताज बनेगा तो वही ठेले चाटवाले अपनी रेहड़ी लगा लेंगे. इससे अर्थव्यवस्था में बढ़ोतरी होगी.

मुझे ताज बनाने वाले मजदूरों के हाथ काटने की खबर भी फेक न्यूज लगती है, जो उस वक्त किसी एक दो अंसतुष्ट मजदूरों ने फैलाई थी. 20 हजार ‘ठाकुर’ पूरे शहर में घूम रहे होते तो किसी न किसी अंग्रेज की नजर जरुर पड़ी होती. और अंग्रेजों को आदत थी-हर बात का दस्तावेजीकरण करने की. उन्होंने नाम पते के साथ लिखा होता कि किस किस मजदूर के हाथ काटे गए. ऐसा होता तो इन मजदूरों के परिजन आज जरुर वक्फ बोर्ड से पेंशन ले रहे होते या जंतर मंतर पर पेंशन के लिए इनका आंदोलन चल रहा होता.

निठल्ला चिंतन का निष्कर्ष यही है कि ताज शाहजहां ने मजे मजे में बनवा दिया. बादशाहों को कुछ काम चाहिए होता है तो रोज एक बिल्डिंग को बनते देखना ही काम था. मजे-मजे में बनवाए ताज पर अब सरकारें भी मजे लेती हैं. ताजमहल पीला हो या हरा-किसी को क्या फर्क पड़ता है. वो तो अच्छा है कि अभी उत्साही युवाओं ने ताजमहल को भगवा या हरे रंग ने नहीं पोता. ताजमहल बचे या गिरे किसी को फर्क नहीं. सुप्रीम कोर्ट बेवजह ज्यादा ही सीरियत होता रहता है.


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