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जब शोले का सांभा जेल से छूटकर कपड़ाफाड़ होली खेलने पहुंचा

पियूष पांडे
पीयूष पांडे

पीयूष पांडे टीवी पत्रकार हैं. व्यंग्यकार हैं. किताबें भी लिखी हैं, हाल ही में आई ‘धंधे मातरम्’. पीयूष जी हमारे लिए भी लिखते हैं. आपने उन्हें ‘लौंझड़’ नाम की लल्लनटॉप सीरीज़ में पढ़ चुके हैं. पढ़िए उनका एक और व्यंग्य.


जेल से छूटकर सांभा सीधे रामगढ़ पहुंचा. उसे पूरा यकीन था कि गब्बर की मौत के बाद डाकुओं की दुनिया में आए ‘वैक्यूम’ को गब्बर का सच्चा वारिस होने के नाते वही भरेगा. लेकिन रामगढ़ पहुंचते ही हर गली मैकडोनाल्ड की दुकानें और फर्राटा दौड़ती फॉर्च्युनर देखकर सांभा को 440 वोल्ट का तगड़ा झटका लगा. वैसे ही, जैसे अरसे पहले होली के दिन रामगढ़ में गब्बर से निपटते वक्त जय-वीरु को लगा था, जब ठाकुर ने ऐन पैरों में पड़ी बंदूक उठाकर उनकी तरफ नहीं उछाली थी.

सांभा को अचानक होली की याद हो आई. संयोग से आज भी होली थी. सांभा जेल में ट्रेनी जेबकतरों की पिछली होली पर ली सेल्फी देखने के बाद से बहुत दुखी था. सांभा को याद आया कि जेल में एक चेले ने उससे कहा था- “होली अब कॉम्पलिकेटेड त्योहार है, उसी तरह जैसे रिलेशनशिप स्टेटस कॉम्पिलिकेटेड होते हैं.” सांभा को ये बात उसी तरह पल्ले नहीं पड़ी थी, जिस तरह मोबाइल पर बच्चों के भेजे इमोजी कई बार बड़ों के पल्ले नहीं पड़ते.

सांभा गब्बर के अड्डे पर कई साल तक होली का इवेंट मैनेजर रहा था. सांभा गब्बर परंपरा का होलीबाज था. उसे याद था कि कैसे गब्बर अचानक पूछने लगता था- होली कब है, कब है होली? जिस तरह बचपन में अच्छा क्रिकेट खेलने वाला क्रिकेटर कई साल बाद हाथ में बैट पकड़कर सोचता है कि वो आज भी पहली गेंद पर छक्का जड़ सकता है, उसी तरह सांभा को यकीन था कि उसे होली खेलने का मौका मिले तो वो धूम मचा देगा. सांभा की कपड़ाफाड़ होली में तो एक्सपर्टीज थी. उसे याद आया कि कैसे एक होली पर उसने कालिया के लिटा-लिटाकर कपड़े फाड़े थे.

सांभा का मन होली खेलने को व्याकुल हो गया. एक जमाने में रामगढ़ में सांभा का अपना जलवा था और उसी जलवे के तैश में सांभा बिना नेम प्लेट पढ़े एक ऐसे घर में घुस गया, जहां होली की धूम थी. होली खेलने का एक अलिखित संविधान होता है, लेकिन सांभा बेचारे को क्या पता. फिर, जिस जमाने में सांभा होली खेलता था, उस दौर में अखबारों में संविधान-संविधान का हल्ला भी नहीं मचता था.

सांभा ने घर में घुसते ही आंगन में बंटती भांग की ठंडाई के तीन गिलास डकारे. रंग उठाया और पहले से रंगी-पुती एक मोहतरमा के गालों पर लगा दिया. दो बच्चों ने सांभा के मुंह पर रंग भरे गुब्बारे मारे लेकिन सांभा को बुरा नहीं लगा. दरअसल, गब्बर भी कई बार मूड खराब होने पर इतनी रैगिंग करता था कि सांभा को इमोशन पर कंट्रोल करना मालूम था. अलबत्ता सांभा ने बच्चों के गाल पर रगड़ के रंग लगाया और फिर रंगा-पुता घर से निकलने को हुआ. निकलते वक्त दो गिलास ठंडाई और पी और फिर सीधे जाकर अपने अड्डे पर सो गया.

सांभा की आंख खुली तो वो हवालात में था. ऊपर की जेब में एक कागज था. बंदा प्रेमपत्र की बाट जोह रहा हो, उसे कोर्ट का नोटिस मिल जाए तो उसके लिए ह्द्याघात की आशंका दोगुनी हो जाती है. यही सांभा के साथ हुआ, क्योंकि जेब में रखा कागज दरअसल एफआईआर की कॉपी थी. इस एफआईआर में सांभा के खिलाफ आईपीसी की धारा 342, 376, 354-ए, 506, 509/34, जेजे एक्ट 23 व 26 और पोक्सो एक्ट की धारा 8 के तहत केस दर्ज हुआ था. सांभा गश खाकर गिरता, उससे पहले ही पुलिसवाले ने सीधे करारा थप्पड़ जड़ा. ‘थप्पड़’ फिल्म रिलीज हो चुकी थी, तो पुलिसवाला फिल्म का प्रचार कर रहा था अथवा उसे थप्पड़ मारने का शौक था, ये सांभा को उसी तरह समझ नहीं आया, जिस तरह 90 फीसदी हिन्दुस्तानी दर्शकों को हॉलीवुड फिल्मों की अंग्रेजी सुनकर कुछ समझ नहीं आता. वो सिर्फ एक्शन से अंदाज लगाते हैं कि हीरो ने क्या बोला होगा. सांभा की परेशानी यह थी कि उसे ना एफआईआर से और ना एक्शन से समझ आया कि उसकी पिटाई क्यों हुई?

अब पुलिसवाले ने उसकी लघु शंका का समाधान किया.

“क्यों बे, लड़की छेड़ता है. यौन उत्पीड़न की कोशिश. हें…अबे तेरी जेब में रखे सालों पुराने पेपर से पता चला कि तेरा नाम सांभा है. तू खुद को क्या गब्बर वाला सांभा समझता है?”

“मैं गब्बर का असिस्टेंट सांभा ही हूं.” सांभा ने जवाब दिया.

“तू सांभा तो मैं गब्बर का बाप. अब ये बता तेने लड़की क्यों छेड़ी.” पुलिसवाला तमतमाया.

“लड़की छेड़ी? कब? ” सांभा ने कहा.

“होली पे. अबे तेने घर में घुसकर लड़की के गालों पर जबरन रंग लगाया. और छेड़खानी की.”

“साहब, मैंने बस रंग लगाया था. ये छेड़ने वगैरह के आरोप झूठे हैं.”

“क्यों लगाया? तेरी बहन थी?” पुलिसवाला गरजा.

“बहन होगी साहब आपकी. मेरी…”

“मेरी क्या बे…कौन है तेरी?”

“प्रेमिका.” सांभा के मुंह से अचानक निकल गया. ये गलती उसी तरह की थी, जिस तरह की गलती गब्बर ने बसंती को जबरन नचाकर की थी. उसी डांस परफोरमेंस के दौरान जब वीरु ने कहा था कि बसंती तुम इन कुत्तों के आगे मत नाचना, उसी वक्त साफ हो गया था कि गब्बर अब बचेगा नहीं. कुछ ऐसा ही सांभा को भी लगा. हुआ भी यही.

प्रेमिका शब्द बोलते ही पुलिसवाले ने सांभा की तुड़ाई शुरु कर दी. करीब आधा घंटा पिटाई का प्रसाद देने के बाद पुलिसवाला बोला- “अबे,वो मेरी गर्लफ्रेंड है. और पुलिसवाले की गर्लफ्रेंड को रंग लगाना लगभग उसी कैटेगरी का पाप है, जैसा शोले में गब्बर ने बसंती को अगवा कर किया था. फिर, तूने तो हद कर दी. पुलिसवाले के घर में घुस गया. और मैंने अपनी गर्लफ्रेंड के गाल पर जो पिंक कलर लगाया था, उस पर भद्दा काला रंग लगा दिया.”

सांभा कंफ्यूज था. उसे समझ नहीं आ रहा था कि लड़की के गाल को छूना बड़ा अपराध था या उसे रंग लगाना या पिंक पर भद्दा काला रंग लगाना या पुलिसवाले की गर्लफ्रेंड से होली खेलना. सांभा का नशा उतर चुका था. अमूमन होली पर उसका नशा एक हफ्ते तक नहीं उतरता था. और जिस भांग का नशा एक हफ्ते में उतर जाए, उसे वो उसी तरह फर्जी करार दे देता था, जिस तरह सोशल मीडिया पर इन दिनों दक्षिणपंथी और वामपंथी एक दूसरे को फर्जी करार देते हैं.

सांभा ने धीरे से कहा- “माईबाप गलती हो गई. सारे लोग रंगे पुते थे. मैं कैसे पहचानता वो आपकी गर्लफ्रेंड है?”

पुलिसवाला थोड़े दार्शनिक अंदाज में बोला- “अबे, यहां लोगों ने भी एक चेहरे पर इतने चेहरे लगा रखे हैं, लेकिन हम पहचानते हैं ना.”

सांभा ने बचने के लिए धर्म का सहारा लिया- “ माईबाप कन्हैया भी तो गोपियों संग होली खेलते थे. मैं…”

“चुप बे, कन्हैया पर तो देशद्रोह के आरोप लगे हैं. तू उसके चक्कर में मत फंस. वरना, एफआईआर में देशद्रोह का आरोप और जड़ दूंगा.”

जेल में कैदियों की सैकड़ों कहानियां सुन चुका सांभा जानता था कि हिन्दुस्तानी पुलिस गूंगे से गवाही दिला सकती है, कोर्ट में बकरी को भैंस साबित कर सकती है तो सांभा को यौन शोषण मामले में दोषी साबित करना कोई बड़ी बात नहीं थी.

सांभा के पास अब सिर्फ एक विकल्प था. उसने गले की चेन और उंगली की अंगूठी पुलिसवाले की हथेली पर रखी. गब्बर के अड्डे पर गुप्त रूप से छिपाकर रखा गया सोने का पता बताया. और पुलिसवाले के पैर छूकर थाने से निकल गया. उसे समझ आ गया था. होली गाल छूने की इजाजत तो देती है, लेकिन सिर्फ अपनों के!


वीडियो- होली पर चीन से आए रंग और पिचकारियों के इस्तेमाल से हो जाएगा कोरोनावायरस?

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