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संबित पात्रा बनने का सबसे आसान तरीका मिल गया है!

vineet singh विनीत दी लल्लनटॉप के रीडर और पक्के वाले दोस्त हैं. बलिया से हैं. जहां से चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने थे. उन्हीं ने देवस्थली विद्यापीठ स्कूल खोला था जिस स्कूल में पढ़े हैं विनीत. आजकल मुंबई में रहते हैं और वहीं से दुनिया देख रहे हैं. अपने देखे सुने का तमाम एक्सपीरिएंस लल्लन के साथ भी बांटते हैं. अपने दोस्त मकालू से परेशान रहते हैं, उसके किस्से भेजते हैं. आप भी पढ़िए.


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आज सुबह मैं मार्निंग वाक के लिए पार्क में पहुंचा, देखा भीड़ लगी है. एक आदमी भाषण दे रहा है और बाकी के लोग खड़े होकर सुन रहे हैं. नजदीक जाकर देखा तो पता चला कि ये कोई और नहीं मकालू था, मेरा दोस्त. मैं फिर दोहरा दूं कि मैं उसे बिल्कुल भी पसंद नहीं करता. इस हद तक पसंद नहीं करता हूं कि अगर संभव होता तो उसे फेसबुक की तर्ज पर हमेशा के लिए असल जिंदगी से अनफ्रेंड कर देता और हमेशा के लिए ब्लाक भी कर देता. ऐसी वाली सेटिंग कर देता कि वो मुझे कभी खोज ही नहीं पाता. लेकिन सपने कहां पूरे होते हैं. खैर यहां लोगों को इकट्ठा करके मकालू कुछ बोल रहा था, मैं भी पीछे खड़ा होकर सुनने लगा.

मकालू – क्या आप जानते हैं कि राजनीतिक पार्टियों के प्रवक्ता दुनिया में कैसे आते हैं?

इससे ज्यादा बेवकूफी भरा सवाल मैंने नहीं सुना था, मैंने कुछ नहीं बोला. एक उम्रदराज आंटी ने जवाब दिया- बेशक वो भी सामान्य इंसान की तरह ही पैदा होते हैं.

मकालू बोला- माफ करना आंटी लेकिन आप गलत हैं, सच ये है कि प्रवक्ताओं का जन्म नहीं होता है, बल्कि वो अवतार लेते हैं. ग्रहों के विशेष संयोग होने से उनका धरती पर अवतार होता है, एक धुएं के गुबार के बीच पार्टियों के कार्यालयों में अवतरित होते हैं.

कुछ भी, क्यूं बेवकूफ बना रहे हो लोगों को- मुझसे रहा नहीं गया. मैंने कहा- मकालू तुम्हारे मुंह से मैंने बहुत तरह की वाहियात बातें सुनी हैं लेकिन ये आज तक कि सबसे ज्यादा वाहियात बात है. बिल्कुल झूठ, निराधार, बकवास.

मकालू बोला – गुरु तुम भी छिप के सुन रहे हो, वैसे तुम भी कमाल की बातें करते हो, लगता है कि तुम टीवी पर समाचार कम देखते हो, देखने लगे तो तुम भी मेरी बात से इत्तेफाक रखोगे .

इत्तेफाक तो मुझे तुम्हारी किसी भी बात से नहीं है, ये बात तो बिल्कुल बिना सिर पैर की है.

तभी एक अंकल ने मुझे टोक कर रहा, मकालू को अपनी बात तो रखने दो, बताओ मकालू क्यूं लगता है तुम्हें ऐसा.

मकालू शुरू हो गया- आप लोग ये तो मानेंगे कि सामान्य इंसान कितना भी पढ़ लिख ले लेकिन वो दुनिया के सारे विषयों में निपुण नहीं हो सकता है?

सबने एक स्वर में हामी भरी.

लेकिन प्रवक्ताओं के साथ ये बाध्यता नहीं है. बस यूं समझ लो कि दुनिया का ऐसा कोई विषय नहीं है जिसके उपर कोई प्रवक्ता घंटों लम्बा व्याख्यान नहीं दे सकता. पाषाण युग से लेकर भविष्य की किसी भी घटना पर उनसे सवाल पूछो और प्रवक्ता जवाब ना दे पाएं, ये असंभव है. आध्यात्मिक सवाल हों या टेक्नोलॉजी वाले सवाल आपको जवाब मिलना तय है. गुरूदत्त, दिलीप कुमार से लेकर सनी लियोनी तक हर विषय पर बोल सकते हैं.

प्रवक्ता के अंदर डॉक्टर, वकील, इंजीनियर,वैज्ञानिक, अर्थशास्त्री, ज्योतिष, नेता, अभिनेता और बाकी बचे हुए हर तरह के विषयों का ज्ञानपुंज होता है. वकील तो इतने बड़े होते हैं कि अगर उनके नेता ने बड़ा से बड़ा गुनाह भी किया हो, उसको ऐसा डिफेंड करते हैं कि जनता टीवी डीबेट देखकर ही नेता को ससम्मान बाइज्जत बरी कर देती है. इतना ज्ञान सिर्फ और सिर्फ किसी अवतार के अंदर ही हो सकता है, वर्ना आखिर एक आदमी ब्रह्मांड के हर विषय कि पढाई कैसे कर सकता है, वो इसलिए कि प्रवक्ता ब्रह्म ज्ञानी होते हैं, ब्रह्म ज्ञानी होने की चर्चा है पुराणों में, ये तो सुना होगा ही आप लोगों ने.

पार्क में उसे घेर कर सुन रहे लोग बहुत प्रभावित थे मकालू की बातों से, इसलिए मैंने सम्मोहन तोड़ने के लिए कहा- ये अवतार जैसी कोई बात होती ही नहीं है. आप लोग अपना समय बर्बाद कर रहे हैं, बेहतर होगा अगर आप लोग इसकी बकवास पर ध्यान नहीं देकर अपने कसरत पर ध्यान दें.

मुझे लगा कि लोग मेरा समर्थन करेंगे लेकिन हुआ उल्टा, एक अंकल मुझ पर चिल्लाते हुए बोले- चल निकल यहां से, हम लोग क्या बेवकूफ हैं, क्या हमें कुछ पता नहीं है, मैं खुद मानता हूं कि प्रवक्ता अवतार होते हैं. उनके अंदर एक और स्पेशल पावर होती है जो साबित करती है कि वो सामान्य इंसान नहीं होते हैं. ये तो देखा होगा कि प्रवक्ता एक ही वक्त पर कई टीवी चैनलों पर दिखाई देत हैं? ये काम कोई सामान्य इंसान कैसे कर सकता है, बताओ?

हाफ पैंट पहने हुए अंकल जी के हाथ में डंडा भी था, फिर भी मैंने डरते कोशिश की- अंकल जी नाराज ना हों, मैं समझाता हूं आपको.

अंकल बोले- तू मुझे समझाएगा, अभी कल ही मैं हाई कोर्ट के जज के पद से रिटायर हुआ हूं और तू समझाएगा मुझे.

मैं समझ गया कि ये जज साहब भी ब्रह्मचारी मोर वाली परंपरा के हैं, जज साहब से जिरह की गुंजाइश नहीं देखकर मैंने खुद ही आगे बढना उचित समझा, कौन मार खाए सुबह सुबह, मैंने मकालू की तरफ देखा, वो मेरी नाजुक स्थिति पर मुस्करा रहा था.

ये द्रश्य देखकर मुझे समझ आया कि आखिर जनता इन राजनीतिक पार्टियों के प्रवक्ताओं की बातों को आखिरी सच मानकर आपस में लड़ाई- झगड़े और मार काट पर क्यूं उतर जाती है, ये गिनकर दस- पन्द्रह प्रवक्ता होंगे जो रोज शाम को सदरी और झक सफेद कुर्ता पहनकर टीवी स्टूडियो पहुंच जाते हैं और पब्लिक के दिमाग की वायरिंग को रोज नए सिरे से सेट करते हैं, अपने राजनीतिक एजेंडा के अनुसार.

मकालू का भाषण फिर से शुरू हो चुका है, और मैं कसरत की हसरत को अधूरा छोड़कर वापस लौट रहा हूं.


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