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भौकाली अप्रेजल लपकना है तो 'मकालू कोचिंग' जॉइन करो

vineet singh विनीत दी लल्लनटॉप के रीडर और पक्के वाले दोस्त हैं. बलिया से हैं. जहां से चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने थे. उन्हीं ने देवस्थली विद्यापीठ स्कूल खोला था जिस स्कूल में पढ़े हैं विनीत. पढ़ लिख के पथरा हुए तो चले गए बंबई. वहां टाटा कंपनी में कोई बड़ी जिम्मेदारी वाला काम संभाल रहे हैं. अपनी पोस्ट का नाम अंग्रेजी में बताया है. लेकिन वो इत्ता लंबा था कि हम भूल गए. दोबारा पूछ के कॉपी पेस्ट कर देंगे. उन्होंने लल्लन के लिए बड़े मजे की चीजें लिखी हैं. हमको पढ़के मजा आया, आप भी पढ़िए.


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आफिस से लौटते वक्त मेरा बवाली दोस्त मकालू मिल गया. और आज मेरा मूड खराब ही नहीं था बल्कि बिल्कुल सड़ा हुआ था इसलिए मैंने मिलते ही कहा- मकालू आज प्लीज कोई ज्ञान नहीं देना और ना ही कोई फालतू के सवाल पूछना. आज मैं तुम्हारी बकवास सुनने के मूड में बिल्कुल भी नहीं हूं.

मकालू बोला – गुरु लगता है आज इंक्रीमेंट लेटर मिला है और इस बार भी तुमको प्रमोशन नहीं मिला.

मैं हैरान. आखिर इस मकालू को सब पता कैसे चल जाता है. मिश्रा ने बताया होगा. वो मुझसे पहले आफिस से निकला था.
मैंने कहा – मिश्रा ने बताया ना? मैं उसे कल देखता हूं. हां, नहीं मिला प्रमोशन. मैं बॉस की चमचागीरी नहीं करता. और ना मुझसे कभी होगा.

मकालू बोला – गुरु मुझे किसी ने नहीं बताया. अरे किसे नहीं पता कि ये अप्रैल और मई का महीना प्राइवेट नौकरी में अप्रेजल का महीना होता है. मतलब तनख्वाह में बढ़ोतरी के संभावनाओ का महीना. और बाकी आगे की कहानी तुम्हारी शक्ल ने बयान कर दी.

मैंने सोचा अब तो ये जान गया है और जैसा कि लोग कहते हैं कि दुःख दर्द बांटने से कम होता है. सो थोड़ा मकालू से बाट ही लेता हूं.

मैंने कहा – सच कह रहे हो. मुझे इस बार बड़ी संभावना थी प्रमोशन की, लेकिन आज जबसे इंक्रीमेंट लेटर देखा है. बस यूं समझ लो कि प्रतिशोध की ज्वाला में जल रहा हूं. मेरा नालायक बॉस. एक गुण नहीं है उसके अंदर बॉस बनने के लिए, बेइमान कहीं का, बस अपने चमचो को खुश रखता है.

मकालू थोड़ा दार्शनिक अंदाज में बोला – गुरु मेरा थोड़ा अलग अनुभव है इस मामले में. मैं हर साल इन महीनों में दो तरह के लोगों से मिलता हूं. एक जिन्हें बॉस से अच्छी रेटिंग और प्रमोशन मिली होती है. और वो चहकते हुए पार्टी करने और नया घर और नई कार खरीदने की बात करते हुए मिलते हैं और दूसरी प्रजाति जो बहुतायत में मिलती है. वो मिलते ही सीधे तीन बातों में से कोई एक बात करते हैं. मैं समझ जाता हूं कि इस साल भी भाई को बाबा जी घंटा भी नहीं मिला है.

मैंने उत्सुकता में पूछा – कौन सी तीन बातें?

मकालू बोला – गुरु ये बातें हैं –
1- यार प्राइवेट नौकरी में कुछ नहीं रखा. सोच रहा हूं फिर से पढाई शुरू करू. सिविल सर्विस की तैयारी करू या किसी “आईएएम” से एक्जीक्यूटीव एमबीए कर लू.
2- भाई बहुत हो गई प्राइवेट नौकरी अब कुछ अपना काम शुरू करना है.
3- मेरा बॉस सही आदमी नहीं है. जो उसे तेल लगाते हैं उनको ही सही रेटिंग देता है.

मैं समझ गया मेरा नंबर कहा है. मैंने पूछा – फिर ये भी बता दो कि कि कुछ उपाय भी बताया है कभी किसी ने?

मकालू बोला – गुरु पहली और दूसरी लाइन वालों के लिए तो फिर भी उपाय है. वो या पढाई शुरू कर दें या अपना काम शुरू कर दें. लेकिन तीसरे लाइन वालों की बदकिस्मती अलग है. बॉस अगर सच में काबिल नहीं है और तुम्हारे साल भर की मेहनत के उपर चमचों को तरजीह देता है. तब उन लोगों के लिए बस एक उपाय है. और वो है बटरिंग पुराण.

मैंने पूछा – कभी सुना नहीं मैंने इस पुराण के बारे में.

मकालू बोला – गुरु ये तो जरूर सुना होगा कि पहले राजा अपने दरबार में राज कवि रखते थे. राज कवि रोज सभा की शुरुआत राजा की स्तुति से करते थे. जिसमें वो राजा के साहस, पराक्रम, शौर्य, वीरता, धन वैभव से लेकर राजा की सुंदरता और कपड़े लत्ते तक का सबके सामने गुण गान करते थे. और राजा खुश होकर कवि को हीरो जवाहरातों से तौल देता था. अब जरूरी नहीं था कि कवि सबकुछ सच बोलता था. लेकिन ये निश्चित था कि वो अपने घर माल लेकर लौटता था और यही सार है बटरिंग पुराण का.

मैं कन्फ्यूज हो चुका था. लेकिन मैंने कहा – ये सुना तो है लेकिन मैं अपने आफिस में इसका उपयोग कैसे करूं?

मकालू बोला – बॉस की तारीफ करो. उसके हर प्रजेंटेशन की तारीफ करो. बॉस क्या धांसू स्पीच दी आज आपने. आज तो आपने सबको धो डाला. हो सके तो उसके हर एक हाव भाव की तारीफ करो. उसके कुत्ते के लहराते बालों से लेकर उसके सिर के बालों तक की तारीफ, उसकी हर पसंद और नापसंद का ध्यान रखो, मैं जानता हूं थोड़ा नहीं बल्कि बहुत मुश्किल है. जबान अटक जाती है. आत्मा गवाही नहीं देती, जमीर को भी मारना पड़ता है. आफिस में दूसरे लोगों के सामने शर्म भी आती है. लेकिन याद करो उस राजकवि को. अगर वो ये सब सोच कर भरी सभा में झिझकता तो क्या उसे हीरे मोती मिलते? बस तुम कर्म करो गुरु और देखो अगला प्रमोशन नहीं मिला तो कहना.

मुझे मकालू आज महाभारत के रण में ज्ञान देते कृष्ण की तरह लग रहा था और मैं श्रद्धा से झुके और ज्ञान लेते पार्थ की तरह. मेरे दिल से आवाज आई – जैसी आपकी आज्ञा प्रभु. और मैं वहां से नई रणनीति के साथ अपने स्कूटर रूपी रथ पर सवार होकर घर के लिए प्रस्थान कर गया.


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