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सारकेगुड़ा एनकाउंटर में जो 17 लोग मारे गए थे, उनके नक्सली होने के सबूत नहीं मिले

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28 जून की रात. साल 2012. जगह- सारकेगुड़ा. ज़िला- बीजापुर. छत्तीसगढ़. सीआरपीएफ और छत्तीसगढ़ पुलिस के संयुक्त एनकाउंटर में 17 लोग मारे गए. छह की उम्र 18 साल से कम थी. सात साल बाद इस एनकाउंटर की जांच रिपोर्ट सामने आई है.

रिपोर्ट के मुताबिक, उस मुठभेड़ में नक्सलियों के शामिल होने के सबूत नहीं मिले हैं. मारे गए लोग आम ग्रामीण थे. रिपोर्ट में यह भी लिखा है कि इस एनकाउंटर में जो जवान घायल हुए थे, वो एक-दूसरे की गोलियों से घायल हुए थे. ग्रामीणों की तरफ से गोली नहीं चली थी.

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सारकेगुड़ा, वो जगह जहां एनकाउंटर हुई थी. (फोटो: गूगल मैप्स)

सारकेगुड़ा एनकाउंटर के बाद क्या हुआ था?

घटना के बाद सुरक्षाबलों ने दावा किया था- उन्हें सूचना मिली थी कि सारकेगुड़ा में माओवादियों की बैठक चल रही है. बैठक में शामिल लोगों की तरफ से गोलीबारी की गई. जवाब में जवानों ने भी फायरिंग की.

इंडियन एक्सप्रेस ने घटना के बाद CRPF IG (ऑपरेशन) पंकज कुमार सिंह का बयान छापा था. उन्होंने कहा था,

सिल्गर में एक नक्सल ट्रेनिंग कैंप का भांडाफोड़ करने सिक्योरिटी फोर्सेज की टीम जा रही थी. सारकेगुड़ा में नक्सलियों ने फोर्सेज पर गोलीबारी की. यह देर रात करीब 12.45 बजे हुआ. टीम सुबह में फिर से वहां गई और जाकर शवों को निकाला. ग्रामीणों ने उनमें से कुछ को नक्सली के रूप में पहचाना और कुछ की पहचान जन मिलिशिया मेंबर के रूप में हुई. गोलीबारी में कुछ निर्दोष ग्रामीणों की मौत हो सकती है.

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, गांववालों का दावा था कि वो लोग बीज पंडुम त्योहार पर चर्चा के लिए बैठक कर रहे थे. जवानों ने उन्हें घेर लिया और उन पर गोली चलाई. ग्रामीणों ने ये भी दावा किया था कि अगली सुबह जवानों ने इरपा रमेश नाम के एक ग्रामीण को उसके घर से उठाया और उसकी हत्या कर दी.

रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस एनकाउंटर के कुछ ही दिन बाद बीजापुर जिला पुलिस ने राहत सामग्री से लदा एक ट्रक भेजा था, जिसे गांववालों ने लेने से मना कर दिया था. एनकाउंटर के बाद पूरे गांव के पुरुषों ने बीजापुर से सटे आंध्र प्रदेश के गांवों में शरण ले ली थी. गांव का हाट 10 दिन से ज्यादा वक्त तक बंद रहा था.

न्यूज़ एजेंसी IANS का यह ट्वीट देखिए जो 8 जुलाई 2012 का है.

इस घटना पर उस वक्त काफी हल्ला मचा था. तब राज्य में रमन सिंह के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार थी. कांग्रेस अध्यक्ष थे नंदकुमार पटेल. पटेल ने राज्य सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था. उन्होंने एनकाउंटर को फेक करार दिया था. सुरक्षा बलों की मनमानी के खिलाफ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने आवाज़ उठाई थी. काफी दबाव के बाद रमन सरकार ने जुलाई, 2012 में मामले की जांच के लिए आयोग बनाया. 11 जुलाई, 2012 को जबलपुर हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज वीके अग्रवाल की अध्यक्षता में आयोग ने जांच शुरू की. रिपोर्ट 17 अक्टूबर, 2019 को छत्तीसगढ़ सरकार को सौंपी गई. 29 नवंबर की देर रात यह रिपोर्ट छत्तीगसढ़ कैबिनेट के सामने पेश की गई थी. हालांकि, विधानसभा में पेश होने से पहले ही रिपोर्ट मीडिया में लीक हो गई.

और क्या-क्या लिखा है रिपोर्ट में?

– रिपोर्ट में कहा गया है कि मीटिंग खुले मैदान में हो रही थी. जो जंगल से सटा हुआ है. मीटिंग में नक्सलियों की मौजूदगी का कोई संतोषजनक सबूत नहीं मिला.

– रिपोर्ट में गांववालों के दावे को भी संदेहपूर्ण बताया गया है. कहा गया है कि वहां मौजूद कुछ लोगों का आपराधिक रिकॉर्ड था.

– सुरक्षाबलों ने सेल्फ डिफेंस में गोलीबारी नहीं की थी. गोलीबारी के साथ ही जवानों ने ग्रामीणों को पीटा था. कम से कम 6 लोगों के सिर में बंदूक की चोट थी. 17 में से 10 लोगों की पीठ पर बंदूक की चोट थी.

– रिपोर्ट में पुलिस की जांच पर सवाल उठाए गए हैं. कहा गया है कि जांच डिफेक्टिव है. जब्त की गई चीजों का पूरा ब्यौरा नहीं था. उन्हें ठीक से सील तक नहीं किया गया था.

– दोनों पक्षों की ओर से गवाहों ने जो बयान दिये हैं, उनमें कमियां हैं. रिकॉर्ड में दर्ज सबूत और परिस्थितियों पर दोबारा विचार करने और इन पर चर्चा करने की जरूरत है.

Sarkeguda Bijapur Chhattisgarh Encounter 2012
शव को अंतिम संस्कार के लिए ले जाते ग्रामीण. (फोटो: द हिंदू | अमन सेठी)

जज साहब की सुरक्षाबलों को सलाह

75 पेज की रिपोर्ट के आखिरी हिस्से में ‘भविष्य के लिए सिफारिशें’ लिखी हुई हैं. इसमें लिखा है-

– सुरक्षा बलों को बेहतर ट्रेनिंग और मॉडर्न गैजेट और कम्युनिकेशन के रिसोर्सेज उपलब्ध कराने चाहिए.

– क्रिटिकल सिचुएशंस को लेकर ध्यान देने की जरूरत है. सुरक्षा बलों के मानसिक ताने-बाने को सुधारने के लिए ट्रेनिंग देने की जरूरत है. क्रिटिकल सिचुएशन में पैनिक रिएक्ट न करें.

– सिक्योरिटी फोर्सेज को बुलेटप्रूफ जैकेट, नाइट विजन, मजबूत इंटेलिजेंस, बेहतर नेटवर्क के लिए कोशिश करनी चाहिए.

अब क्यों बवाल हो रहा है?

छत्तीसगढ़ का बस्तर संभाग नक्सल प्रभावित है. इस वजह से वहां छत्तीसगढ़ पुलिस और पैरा मिलिट्री फोर्स की भारी तैनाती रहती है. समय-समय पर सुरक्षाबलों पर मानवाधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगते रहे हैं. फर्जी एनकाउंटर के आरोप सुरक्षाबलों पर लगते रहे हैं. ऐसे में सारकेगुड़ा एनकाउंटर का फर्जी निकलना नक्सल प्रभावित इलाकों में पुलिस और सुरक्षाबलों की नीयत में एक बड़े झोल की तरफ इशारा करता है.

पूर्व मुख्यमंत्री डॉक्टर रमन सिंह ने वर्तमान भूपेश बघेल सरकार पर रिपोर्ट को एक महीने तक दबाकर रखने और मीडिया में लीक करने का आरोप लगाया है. उन्होंने कहा कि कायदे से यह रिपोर्ट मीडिया तक जाने से पहले विधानसभा में पेश की जानी थी.


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