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फिल्म हैदर में एक रोल करने वाला लड़का कश्मीर के एनकाउंटर में मारा गया

हमारे आस-पास के 14-15 की उम्र के बच्चे अब भी चिप्स खाने के लिए घरवालों से 10-20 रुपये मांगते हैं. ज्यादा टीवी देखने पर पापा डांटते हैं. मगर ये हमारी ‘दुनिया’ की बात है. कश्मीर की बात और है. वहां इस उम्र के दो बच्चे एनकाउंटर में मारे गए. 15 साल का शाकिब बिलाल. 14 साल का मुदसिर. दोनों चार महीने पहले मिलिटेंट बन गए थे. आप चाहें, तो मिलिटेंट को ‘टेररिस्ट’ भी कह सकते हैं. मुझसे उनके लिए ये शब्द लिखा नहीं गया.

एनकाउंटर में लश्कर के आतंकवादी के साथ वो भी मारा गया
हैदर- विशाल भारद्वाज की फिल्म. कश्मीर पर बनी थी. भारत और पाकिस्तान के बीच पिसता कश्मीर. अगली बार जब कभी ये फिल्म देखें, तो क्रेडिट लिस्ट में शाकिब बिलाल का नाम खोजिएगा. शाकिब कश्मीर का था. यहां हाजिन नाम की एक जगह है. वहीं रहता था. छठी क्लास में था, जब उसने ‘हैदर’ में एक छोटा सा रोल किया. शाकिब अब इस दुनिया में नहीं है. 9 दिसंबर को श्रीनगर के बाहरी हिस्से में सेना और आतंकियों के बीच एक मुठभेड़ हुई. इसमें लश्कर-ए-तैयबा का एक आतंकवादी मारा गया. उसके साथ शाकिब की भी लाश मिली. हिंदुस्तान टाइम्स में आशिक हुसैन ने डिटेल रिपोर्ट की है शाकिब पर. उसके घरवालों से बात की है. 

शाकिब ने डिस्टिंक्शन में 10वीं पास की. 11वीं में फिजिक्स, कैमेस्ट्री और मैथ्स था उसके पास. पढ़ाई में, खेल में सबमें अच्छा था. ये हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट है.
शाकिब ने डिस्टिंक्शन में 10वीं पास की. 11वीं में फिजिक्स, कैमेस्ट्री और मैथ्स था उसके पास. पढ़ाई में, खेल में सबमें अच्छा था. ये हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट है.

कश्मीर में किसी लड़के-बच्चे के एकाएक गायब होने का क्या मतलब होता है?
31 अगस्त को शाकिब आम दिनों की तरह घर से निकला था. पास की दुकान से घर की ज़रूरत का कुछ सामान लाने. मगर वो लौटकर घर नहीं आया. घरवालों को समझ ही नहीं आया कि वो कहां चला गया. वो हर जगह तलाशते रहे उसे. उसकी सलामती की दुआ करते रहे. उम्मीद करते रहे कि शायद शाकिब लौट आएगा. मगर जब महीनेभर तक शाकिब की कोई खबर नहीं आई, तो घरवाले जैसे आप ही समझ गए. कश्मीर में जब घर के लड़के-बच्चे इस तरह गायब होते हैं तो उसका मतलब होता है कि वो मिलिटेंट हो गए हैं. मिलिटेंट होने का मतलब हद से हद कुछ महीनों की बाकी ज़िंदगी. शाकिब ने मिलिटेंसी क्यों जॉइन की, इसका कोई जवाब नहीं था परिवार के पास. वो शाकिब के घर लौटने की उम्मीद में दरगाहों पर भी गए. फकीरों से दुआएं करवाईं. मगर किसी दुआ की सुनवाई नहीं हुई. शाकिब मर चुका है और मरे लोग कभी नहीं लौटते.

कुका पारे के पड़ोस में ही था शाकिब का घर
‘द वायर’ ने शाकिब से जुड़ा एक संयोग बताया है. उसके पड़ोस में ही है मुहम्मद युसूफ पारे उर्फ कुका पारे का घर. कुका पारे 90 के दशक में मिलिटेंट बन गया था. बाद में वो भारत की साइड में आ गया था. वो सेना और सुरक्षा बलों के साथ मिलकर आतंकियों को निशाना बनाता था. बहुत खौफ था उसका. उसने अपने लड़ाकों का एक संगठन भी बनाया. इनको लोग इख़वान कहते थे. ये जो हाजिन है, वो इखवानियों का गढ़ था. कुका पारे को बाद में आतंकियों ने ही गोलियों से भूनकर मार डाला. उसकी मौत से एक महीने पहले ही पैदा हुआ था शाकिब.

दिल लगाकर पढ़ता था, खूब खेलता था, इंजिनियर बनना था उसको
घर छोड़कर जाते वक्त शाकिब 11वीं में पढ़ रहा था. 10वीं में खूब अच्छे नंबर आए थे उसके. तमन्ना थी इंजिनियर बनने की. थियेटर में भी दिलचस्पी थी उसकी. ड्रामा में हिस्सा लेता. खेलों में भी बड़ा दिल लगता था उसका. कुल मिलाकर एक आम सा बच्चा था वो. उस 9वीं क्लास में पढ़ने वाले अपने दोस्त मुदसिर की तरह, जो शाकिब के साथ ही अपना घर छोड़कर मिलिटेंट बनने चला गया. वो भी मुठभेड़ में शाकिब के साथ ही मारा जा चुका है.

घरवालों को बस एक ये ही वजह समझ आ रही है
शाकिब का परिवार क्लूलेस है. मातम करने के अलावा उनकी सारी इंद्रियां इस सवाल का जवाब तलाशने में जुटी हैं कि उनका बच्चा मिलिटेंट बना ही क्यों. उन्हें एक ही मुमकिन वजह समझ आ रही है. उन्होंने हिंदुस्तान टाइम्स को बताया-

जिस दिन शाकिब गायब हुआ, उससे एक दिन पहले सुरक्षाबलों और आतंकवादियों के बीच एक एनकाउंटर हुआ था. कुछ आतंकी मारे गए थे. जिस जगह पर ये घटना हुई थी, उसे देखने भी गए थे लोग. शायद ये वजह रही हो.

ये 'द वायर' की मुदसिर पर की गई रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट है. मुदसिर और शाकिब में दोस्ती कराई थी फुटबॉल ने. वो साथ खेलते थे. साथ ही घर छोड़कर गए. साथ ही मारे गए.
ये ‘द वायर’ की मुदसिर पर की गई रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट है. मुदसिर और शाकिब में दोस्ती कराई थी फुटबॉल ने. वो साथ खेलते थे. साथ ही घर छोड़कर गए. साथ ही मारे गए.

मुदसिर के परिवार का क्या हाल है? 
‘द वायर’ में अज़ान जावेद ने मुदसिर पर लंबी रिपोर्ट लिखी है.वो भी हाजिन का ही रहने वाला था. शाकिब और मुदसिर की दोस्ती थी. दोनों साथ फुटबॉल खेलते थे. कुछ महीनों पुरानी दोस्ती इतनी गहरी हो गई कि दोनों साथ ही घर से भी भागे. मुदसिर के पिता ने ‘द वायर’ को बताया. कि मना करने पर भी मुदसिर छोटे-छोटे काम करके घर में पैसे देता था. 31 अगस्त को वो फुटबॉल खेलने ईदगाह के लिए निकला. फिर कभी ज़िंदा घर नहीं लौटा. उसके गायब होने से पहले लोगों ने उसे शाकिब के साथ देखा था. मुदसिर ने कभी घरवालों को फोन भी नहीं किया. मुदसिर के रिश्तेदारों और पड़ोसियों ने ‘द वायर’ को बताया-

2016 की बात है. मुदसिर को पुलिस पकड़कर ले गई थी. पुलिस का कहना था कि वो पत्थरबाजी में शामिल था. तकरीबन एक हफ्ते तक हिरासत में रखा उसको. बाद में पुलिस ने उसे छोड़ दिया. बहुत छोटा था वो. उसने कभी मिलिटेंसी जॉइन करने की बात तो नहीं की.

मुदसिर के पिता को बेटे की ‘शहादत’ पर गर्व है?
‘द वायर’ ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि मुदसिर के मातम में उसके घर पर क्या माहौल था. वहां ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे लग रहे थे. उसके पिता राशिद पारे ने ‘द वायर’ से कहा-

जिस दिन मैंने AK-47 थामे मुदसिर की फोटो देखी, उसी दिन उसका इंतजार खत्म हो गया. मैं जानता था कि आगे क्या होगा. देखिए, वही हुआ. मैं अल्लाह का शुक्रगुज़ार हूं कि मेरा बेटा जिस मकसद पर निकला था, उसने उसमें कामयाबी पाई. मैं दुआ करता हूं कि ऊपरवाला उसकी शहादत मंजूर करे.

मुदसिर का परिवार झूठ कहता होगा कि उन्हें बेटे की ‘शहादत’ पर गर्व है
ये क्या कोई बदहवासी है, जो गर्व की बात करके अपने बच्चे को गंवाने वाले पिता को ढांढस देती है? क्या शहादत कह देने से बच्चे के मरने पर थोड़ा संतोष होता होगा? क्योंकि ये तो नामुमकिन लगता है कि कोई मां-बाप अपने बच्चे की ऐसी मौत पर गर्व करें. या फिर ये राशिद पारे की हताशा है? या कट्टरता? मुझे इस गर्व वाली फीलिंग पर शुबहा है. मुझे लगता है कि राशिद पारे झूठ कह रहे हैं. ऐसा इसलिए कि ‘द वायर’ ने अपनी रिपोर्ट में चीखकर, छाती पीट-पीटकर रो रही एक औरत का भी जिक्र किया है. वो मुदसिर के परिवार की है. शायद मां हो. वो जोर-जोर से रो रही है. रोते-रोते गा रही है. उस गाने में मुदसिर की ‘शहादत’ की तारीफ है. लेकिन अगर उस औरत को मुदसिर की मौत पर गर्व है, तो वो रोते-रोते बेहोश क्यों हो जाती है? अगर परिवार को मुदसिर की इस कथित शहादत पर इतना ही गर्व है, तो फिर क्यों मुदसिर के दादा ग़ुलाम अहमद बिलख-बिलखकर रोते हैं और कहते हैं-

किसी ने मुझे नहीं बताया कि मुदसिर मिलिटेंट बन गया है. मुझे तो कुछ दिनों पहले ही ये मालूम चला.

अगर सच में राशिद पारे को अपने बेटे के मिलिटेंट बनने पर इतना ही गर्व था, तो उन्होंने अपने पिता से ये बात क्यों छुपाई? इसलिए ही छुपाई होगी न कि वो जानते थे कि पोता किसी भी घड़ी मर सकता है, ये जानकर दादा का कलेजा फटेगा! मरने वाले को शहीद कहना मौत को ग्लोरिफाई भले करे, मगर मरने के सच को नहीं बदलता.

मिलिटेंट कहें कि आतंकवादी, हिंसा तो दोनों में है
वो कौन है, जो इस उम्र के बच्चों के हाथ में हथियार थमा रहा है? क्या किसी भी मकसद के नाम पर ये मौतें जस्टिफाइड हैं? या फिर इन कमउम्र बच्चों को बहकाकर और भड़काकर अपने साथ मिलाना आतंकवादी संगठनों की सोची-समझी रणनीति है? क्योंकि बच्चों की मौत ज्यादा खलती है. बच्चे एनकाउंटर्स में मारे जाएंगे, तो कश्मीरी ज्यादा भड़केंगे. तो क्या लोगों की सहानुभूति हासिल करने के लिए बच्चों को दांव पर लगाया जा रहा है? आप आतंकवादी कहें कि मिलिटेंट, ऐंगल तो दोनों हिंसा का ही है.

इतने छोटे बच्चे हथियार उठा रहे हैं, फेलियर तो हमारा भी है
कश्मीरियों को सोचना चाहिए. कि इतने कमउम्र बच्चों को बहकाने वाले उनके हीरो कैसे हो सकते हैं? बाकी देश के जिस हिस्से में हम रहते हैं, वहां नाबालिगों के हाथों हुए अपराध पर बेहद संवेदनशील रवैया दिखाया जाता है. कुछ रेयर मामलों में उनपर मुकदमा चलाने का प्रावधान बनाया गया है. मगर क्या हमारे पास ऐसे मिलिटेंट्स की मिसालें नहीं हैं, जिन्होंने वो रास्ता छोड़ दिया? हथियार डालकर आम ज़िंदगी में दोबारा लौट आए? बल्कि हमारे पास तो ऐसे भी मिलिटेंट्स की मिसालें हैं, जो सेना के साथ आए. पॉलिटिक्स में आए. शाकिब और उसका वो 9वीं वाला दोस्त, इस उमर के बच्चे हथियार उठा रहे हैं या कोई उन्हें गुमराह कर पा रहा है, तो ये हमारा कलेक्टिव फेलियर भी तो है. बाकी शाकिब ने जो ‘हैदर’ की थी, उसमें कब्रिस्तान का एक गाना है. कब्रें ही कब्रें हैं. गाना कहता है-

अरे आओ न, कि जान गई, जहां गया, सो जाओ
अरे आओ न, कि थक गई है जिंदगी, सो जाओ…

ये कश्मीर में होने वाली ‘बेमौत की मौतों’ का सिंबल था. आयरनी देखिए. जिस फिल्म का ये गाना है, उसी में काम करने वाला एक बच्चा ऐसे ही एक कब्रिस्तान के एक कब्र में दफ़्न है. मुझे ये सब लिखते-लिखते शाहिद की याद आ रही है. शाहिद अनंतनाग में रहता है. 17-18 साल का है. जून 2018 में जब मैं कश्मीर गई थी, तब वो मिला था. हम अब दोस्त हो गए हैं. हम अक्सर बातें करते हैं. 2016 में तकरीबन 25 दिनों तक वो पुलिस हिरासत में था. पुलिस आधी रात को उसके घर आई और ले गई. कहा, उसने पत्थरबाजी की है. मुझे शाहिद का कहा याद आ रहा है-

बताओ, मैं डॉक्टर बनना चाहता हूं. पत्थर क्यों फेकूंगा? मैंने कुछ नहीं किया था.

उन 25 दिनों को गुज़रे हुए दो साल से ज्यादा का वक्त हो गया है. शाहिद की मां तब से ही बीमार रहती हैं. डरती रहती हैं. शाहिद का बड़ा भाई अक्सर उसे टटोलता है. वो डरते हैं कि कोई शाहिद को बहकाकर न ले जाए. कहीं शाहिद भी उस राह न निकल जाए. मगर शाहिद कहीं नहीं जाएगा. उसने वादा किया है कि वो मिलिटेंट नहीं, डॉक्टर बनेगा.


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