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पाकिस्तान के पत्रकार की लाश स्वीडन में क्यों मिली?

ईरान और अफ़गानिस्तान से सटा पाकिस्तान का एक प्रांत है- बलोचिस्तान. जुलाई 2010 से यहां एक अज़ीब सिलसिला शुरू हुआ. एकाएक लोग लापता होने लगे. कुछ दिनों की ग़ुमशुदगी के बाद कोई चुपके से किसी बाग, या सुनसान सड़क किनारे, या किसी खंडहर में, उनकी लाश रख जाता. ज़्यादातर दो-तीन लाशें साथ रखी मिलतीं. कभी किसी का हाथ-पैर कटा होता. शरीर पर चाकुओं से गोदे जाने के निशान होते. किसी के शरीर पर ड्रिलिंग मशीन से छेद किया होता. किसी का गुप्तांग काट दिया गया होता. कभी लाश को गलाने के लिए उसपर चूना डाला गया होता. तो कभी लाश मिलते-मिलते कोई जंगली जानवर उसे आधा खा चुका होता. दो चीजें थीं, जो सारी लाशों में कॉमन थी. एक तो ये कि अमूमन सभी के सिर में गोली मारी गई होती. और दूसरी कॉमन बात ये कि सबको ही मारने से पहले ख़ूब टॉर्चर किया गया था.

अफ़गानिस्तान से होने वाले ड्रग्स के कारोबार और तालिबानी हिंसा से बलोचिस्तान भी काफी प्रभावित है. बीते कई दशकों से यहां लोग पाकिस्तान से आज़ाद होने की मांग कर रहे हैं. पाकिस्तानी सेना और ISI दशकों से ज़ोर-जुल्म के रास्ते ये मांग कुचलती आई है. इसका एक नतीजा ये हुआ कि इस मांग ने सशस्त्र संघर्ष की शक्ल ले ली (फोटो: गूगल अर्थ)
अफ़गानिस्तान से होने वाले ड्रग्स के कारोबार और तालिबानी हिंसा से बलोचिस्तान भी काफी प्रभावित है. बीते कई दशकों से यहां लोग पाकिस्तान से आज़ाद होने की मांग कर रहे हैं. पाकिस्तानी सेना और ISI दशकों से ज़ोर-जुल्म के रास्ते ये मांग कुचलती आई है. इसका एक नतीजा ये हुआ कि इस मांग ने सशस्त्र संघर्ष की शक्ल ले ली (फोटो: गूगल अर्थ)

हत्यारे पकड़े क्यों नहीं जा रहे थे?
एक-के-बाद एक लोग मारे जा रहे थे. मगर हत्यारे पकड़े नहीं जा रहे थे. क्यों? क्योंकि पाकिस्तानी प्रशासन को इन हत्याओं की जांच में कोई दिलचस्पी नहीं थी. दिलचस्पी होती भी कैसे जब इन हत्याओं में ख़ुद पाकिस्तानी सेना और ख़ुफिया एजेंसी ISI शामिल थी. ताकि वहां चल रहे आज़ाद बलोचिस्तान मूवमेंट को कुचला जा सके. पाकिस्तानी आर्मी और ISI के डर से पाकिस्तानी मीडिया भी इन हत्याओं पर चुप थी. मगर कुछ बलोचिस्तानी पत्रकार थे, जो इसपर लिख-बोल रहे थे. इनमें से ही एक थे- साजिद हुसैन. ईमानदारी से पत्रकारिता कर रहे साजिद पर ख़तरा मंडराने लगा. उन्हें जान से मारने की धमकियां मिलने लगीं. साल 2012 में साजिद किसी तरह जान बचाकर भाग गए. उनकी पत्नी. नौ साल की बेटी. पांच साल का बेटा. सब वहीं रह गए.

स्वीडन स्कैंडिनेविया का हिस्सा है. जीवन स्तर, नागरिक अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक मूल्य जैसी चीजों में स्कैंडिनेविया दुनिया में सबसे बेहतर माना जाता है (फोटो: गूगल अर्थ)
स्वीडन स्कैंडिनेविया का हिस्सा है. जीवन स्तर, नागरिक अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक मूल्य जैसी चीजों में स्कैंडिनेविया दुनिया में सबसे बेहतर माना जाता है (फोटो: गूगल अर्थ)

2012 में बलोचिस्तान से भागे साजिद पांच साल बाद स्वीडन पहुंचे
पहले ओमान. फिर दुबई. फिर युगांडा. दर-बदर भागने को मज़बूर साजिद ने बलोचिस्तान के हालात और वहां हो रही ज़्यादतियों पर लिखना नहीं छोड़ा. 2015 में बाहर रहते हुए ही उन्होंने ‘बलोचिस्तान टाइम्स’ नाम का एक ऑनलाइन अख़बार शुरू किया. 2017 में साजिद स्वीडन पहुंचे. 2019 में स्वीडन ने उन्हें असाइलम भी दे दिया. यहां की एक यूनिवर्सिटी में पढ़ाने लगे साजिद. उसी यूनिवर्सिटी के एक मास्टर्स कोर्स में ख़ुद भी दाखिला ले लिया.

…और फिर लापता हो गए साजिद
स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम के पास अकाला नाम की जगह है. यहां अपने एक दोस्त के साथ रहते थे साजिद. पास के उपसाला शहर में उन्होंने अपने रहने का नया इंतज़ाम देखा. 2 मार्च को सुबह तकरीबन साढ़े 10 बजे होंगे, जब साजिद स्टॉकहोम में एक ट्रेन पर चढ़े. 45 मिनट बाद ट्रेन उपसाला स्टेशन पहुंची और साजिद वहां उतर गए. अब उन्हें शहर में ही एक जगह जाकर अपने नए अपार्टमेंट की चाभी लेनी थी. मगर साजिद वहां पहुंचे ही नहीं. स्टेशन पर उतरने के बाद वो किसी को नज़र नहीं आए. लापता हो गए. उनके दोस्तों ने 3 मार्च को उपसाला पुलिस में शिकायत लिखवाई.

जानने वालों को साजिद के लिए डर लग रहा था
शुरू में पुलिस को लगा, शायद अपनी इच्छा से कहीं घूमने चले गए हों साजिद. मगर साजिद के दोस्तों को आशंका थी कि साजिद के साथ कुछ अनहोनी हुई है. 3 मार्च को लिखी शिकायत बंद करके 5 मार्च को पुलिस ने फिर एक नया केस दर्ज किया. साजिद की खोज शुरू हुई. स्वीडन में ‘मिसिंग पीपल’ नाम की एक ग़ैर-सरकारी संस्था है.जब कोई गुमशुदा हो जाता है, तो उसे खोजने में ये संस्था पुलिस की मदद करती है. साजिद के केस में भी इन्होंने पुलिस के साथ मिलकर तलाश शुरू की. मगर साजिद का कुछ पता नहीं चला. 28 मार्च को साजिद के गुमशुदा होने की ख़बर उनके अख़बार ‘बलोचिस्तान टाइम्स’ में भी पब्लिश हुई. इसमें साजिद के लिए फ़िक्र जताई गई थी.

…और फिर ISI का नाम आया
फ़िक्रमंदों में ‘रिपोर्टर्स विदआउट बॉडर्स’ (RSF) नाम की संस्था भी थी. ये एक अंतरराष्ट्रीय संस्था है. इसका काम है देश और सीमाओं से परे जाकर दुनियाभर के पत्रकारों के लिए सुरक्षित माहौल बनाने की कोशिश करना. निष्पक्ष पत्रकारिता को बढ़ावा देना. 30 मार्च को इन्होंने एक बयान जारी किया. इसमें स्वीडन की पुलिस से अपील की गई थी कि वो साजिद को खोजने की हर मुमकिन कोशिश करें. RSF ने एक और ज़रूरी बात लिखी थी. इनका कहना था कि पुलिस साजिद की तलाश करते हुए ये आशंका ध्यान में रखे कि शायद साजिद को किडनैप किया गया है. और ये किडनैपिंग करवाई है पाकिस्तानी ख़ुफिया एजेंसी ने.

अपने बयान में RSF ने एक और परेशान करने वाली बात लिखी थी. इनका कहना था कि पाकिस्तानी सरकार और सेना से असहमति रखने वाले कई लोग जो देश से भागकर कहीं और रह रहे हैं, इनकी एक लिस्ट अंदर-ही-अंदर ISI के लोगों के बीच घूम रही है. ये बात किसी हिटलिस्ट की तरफ इशारा करती थी.

करीब दो महीने बाद नदी में मिली साजिद की लाश
बलोचिस्तान टाइम्स, RSF और साजिद के दोस्तों-रिश्तेदारों की फ़िक्र सही साबित हुई. 1 मई को उपसाला के बाहर नदी में एक लाश मिली. 1 मई को ख़बर आई कि वो लाश साजिद हुसैन की थी. वो बस 39 साल के थे.

शुरुआती जांच में पुलिस को कुछ संदिग्ध नहीं मिला है. न शरीर पर कोई जख़्म है. न किसी चोट का निशान है. ऐसे में पुलिस को सीधे हत्या का ऐंगल नहीं दिख रहा. मगर जांच अब भी जारी है. साजिद कहां लापता थे? वो अपनी मर्ज़ी से गए थे या इसके पीछे किसी और का हाथ है? उनकी मौत कैसे हुई? ऐसे कई सवाल हैं, जिनका जवाब मिलना अभी बाकी है. साजिद की प्रोफाइल, उनके बैकग्राउंड को देखते हुए ये मामला बहुत हाई-प्रोफाइल हो गया है.

इस केस के सिलसिले में हमने RSF,मिसिंग पीपल स्वीडन और उपसाला पुलिस से संपर्क करने की कोशिश की. RSF और उपसाला पुलिस का अभी तक कोई जवाब नहीं आया है. हां, मिसिंग पीपल स्वीडन ने मेल भेजकर कहा है कि वो इस केस से जुड़ी जानकारी साझा नहीं कर सकते. क्योंकि उन्हें क़ानूनी तौर पर इसकी इजाज़त नहीं है. ऐसा बताया जा रहा है कि पुलिस इस केस की तफ़्तीश में बहुत गोपनीयता बरत रही है. ऐसा इस केस की संवेदनशीलता को देखते हुए किया जा रहा है या कोई और बात है, अभी हमें ये मालूम नहीं चल पाया है.

मीडिया की स्वतंत्रता के लिए बहुत समर्पण है नॉर्डिक देशों में
प्रेस की आज़ादी के लिहाज से नंबर वन देश है नॉर्वे. इसके बाद फिनलैंड. फिर डेनमार्क. फिर स्वीडन.इनके ठीक विपरीत हैं पाकिस्तान जैसे देश. वहां सरकार की तय लाइन के खिलाफ जाकर सच दिखाने वाले पत्रकार कई बार मारे भी जाते हैं. ऐसे में साजिद जैसे कई पत्रकार अपनी जान बचाकर नॉर्वे और स्वीडन जैसे देशों में शरण लेते हैं. मगर ख़तरा यहां भी पूरी तरह ख़त्म नहीं होता. इसकी एक मिसाल हमें अहमद गोराया के केस में भी मिलती है.

क्या हुआ अहमद गोराया के साथ?
अहमद पाकिस्तान के रहने वाले हैं. पेशे से पत्रकार हैं और पाकिस्तानी सेना और सरकार द्वारा किए जा रहे मानवाधिकार उल्लंघनों पर लिखते रहते हैं. जनवरी 2017 में उन्हें अगवा कर लिया गया. कई दिनों तक ख़ूब टॉर्चर करने और डराने-धमकाने के बाद अहमद को रिहा कर दिया गया. वो भागकर नीदरलैंड्स आ गए. अहमद का कहना था कि उन्हें पाकिस्तानी सेना ने किडनैप करवाया था. अभी फरवरी 2020 में ख़बर आई कि नीदरलैंड्स में अहमद पर हमला हुआ है.इसके पीछे भी ISI का हाथ होने की शंका है. ख़बरों के मुताबिक, अमेरिका और यूरोप में ISI का एक पूरा नेटवर्क इस काम में लगा है.

पहले भी कई पत्रकार मारे गए हैं पाकिस्तान में
‘कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स’ नाम की एक अंतरराष्ट्रीय संस्था है.इसके मुताबिक, 1992 से अब तक 60 ऐसे पत्रकार मारे गए हैं पाकिस्तान में, जिनके मारे जाने की वजह उनकी पत्रकारिता थी. ये 60 ऐसे लोग हैं, जिनके मारे जाने की पुख़्ता वजह पता है. संदिग्ध हालात में मारे गए पत्रकारों की संख्या इससे कहीं ज़्यादा है. इन्हीं वजहों से पत्रकारों के लिए सबसे ख़तरनाक जगहों में गिना जाता है पाकिस्तान. उस पाकिस्तान के अंदर अगर आप ख़ास बलोचिस्तान की बात करें, तो ख़तरा और ज़्यादा है.

‘किल ऐंड डंप’
पाकिस्तानी सेना और ISI अपनी बलोचिस्तान पॉलिसी के लिए कुख़्यात है. वहां लोगों को अगवा कर लेना. फिर उनकी लाश कहीं फेंक जाना. इसे पाकिस्तान की ‘किल ऐंड डंप पॉलिसी’ कहते हैं. ऐसी ही नीतियों के सहारे पाकिस्तानी सेना बलोचिस्तान की ज़मीन को अपने साथ जोड़े रखने में कामयाब होती आई है. उसकी दिलचस्पी बलोचिस्तान के बाशिंदों में नहीं है. उसकी दिलचस्पी है उन कच्चे तेल, तांबे, प्लेटिनम और सोने की खदानों में, जो भरपूर मात्रा में यहां उपलब्ध हैं. लोगों का कहना है कि उनकी ज़मीन में मौजूद संसाधनों से पाकिस्तान कमाता है. मगर इस कमाई का फ़ायदा बलोचिस्तान के लोगों तक नहीं पहुंचता. उल्टा सरकार तो बलोच आवाम की सांस्कृतिक पहचान को ख़त्म करने में लगी है. लोगों को मारा जा रहा है. खुलेआम कभी बसों से घसीटते हुए. तो कभी दुकानों से, घरों से लोगों को किडनैप कर लिया जाता है.

मिसाल के तौर पर ‘द गार्डियन’ की एक रिपोर्ट में छपी अब्दुल रहीम की आपबीती सुनाते हैं आपको.बलोचिस्तान में एक ज़िला है- ख़ुजदार. यहीं के रहने वाले हैं अब्दुल रहीम. साल 2009 की बात है, जब एक दिन उनका बेटा सादुल्लाह लापता हो गया. बेटे को खोजने के लिए क़ानूनी मदद चाहिए थी. सो अब्दुल रहीम अदालत पहुंचे. मगर उनके वकील की गोली मारकर हत्या कर दी गई. मदद की आस में अब्दुल ने अपने यहां की मीडिया से संपर्क किया. मगर फिर स्थानीय प्रेस क्लब के अध्यक्ष की हत्या कर दी गई. पहले वकील, फिर पत्रकार. साफ था कि जो भी अब्दुल की मदद करेगा, मारा जाएगा. ऐसे में फिर किसी ने अब्दुल की मदद करने की कोशिश नहीं की. विदेशी मीडिया की रिपोर्ट्स में आपको ऐसे कई वाकये, ऐसे कई नाम मिल जाएंगे. और ये ही वाकये, ये ही नाम बलोचिस्तान की सच्चाई हैं.

…जब चीन से भागकर एक लेखक स्वीडन आया
इस ख़बर में स्वीडन का ज़िक्र आया. इसी ज़िक्र से जुड़ा एक नाम है ग्वेई मिनहाई का. ग्वेई हॉन्ग कॉन्ग के रहने वाले थे. वहां एक पब्लिशिंग हाउस चलाते थे. अपने काम को लेकर ग्वेई सरकार के निशाने पर आए. जान पर ख़तरा बना, तो भागकर स्वीडन चले गए. वहां स्वीडन ने उन्हें असाइलम दे दिया. 2015 में ग्वेई किसी काम से थाइलैंड गए. वहां से उनका अपहरण कर लिया गया. एक साल बाद वो चीन की सरकारी टीवी पर नज़र आए. पता चला कि चीन ने 11 साल पुराने एक केस में उन्हें पकड़ लिया है. ग्वेई पर केस चलाया गया. 2017 में कुछ दिनों के लिए रिहा करने के बाद दोबारा क़ैद कर लिया गया उन्हें. फिर फरवरी 2020 में ख़़बर आई कि चीन की एक अदालत ने ग्वेई को 10 साल कैद की सज़ा सुनाई है. कोई ट्रायल नहीं. कोई निष्पक्ष जांच नहीं. सिस्टम भी मनमाना, उसकी सुनाई सज़ा भी मनमानी.

चीन और स्वीडन के डिप्लोमैटिक रिश्ते ख़राब हो गए हैं
ग्वेई के साथ जो हुआ, हो रहा है, उससे बहुत नाराज़ है स्वीडन. वो ग्वेई को रिहा किए जाने की मांग कर रहा है. चीन इसके लिए राज़ी नहीं. जब स्वीडन ने अपना नागरिक होने के नाते ग्वेई से मिलने की इजाज़त चाही, तो चीन ने झूठ कह दिया कि ग्वेई ने स्वीडिश नागरिकता छोड़कर वापस चीन की नागरिकता ले ली है. स्वीडन इस दावे को खारिज़ करता है . वो ग्वेई के साथ हुए सलूक को स्वीडन की लिबरल संस्कृति, अपने लोकतांत्रिक उसूलों पर हमला मानता है. इस मामले ने इतना तूल पकड़ा है कि चीन और स्वीडन के आपसी रिश्ते ख़राब हो गए हैं.

शरण. शरणागत.
चीन ने कई बार खुलकर धमकाया स्वीडन को. उसके सामने अपनी ताकत का प्रदर्शन करते हुए कहा कि उसके सामने स्वीडन कुछ भी नहीं. मगर तब भी स्वीडन ने अपना स्टैंड नहीं बदला. 2019 में ग्वेई की ग़ैरमौजूदगी में ही स्वीडन के भीतर उन्हें ‘टूहॉलस्की’ नाम का एक प्रतिष्ठित पुरस्कार दिया गया. ये प्राइज ‘टूहॉलस्की’ नाम के एक जर्मन लेखक के नाम पर शुरू किया गया था. हिटलर के राज में वो अपनी जान बचाकर जर्मनी से स्वीडन भाग आए थे. उनकी याद में ये पुरस्कार हर साल ऐसे ही किसी लेखक को दिया जाता है. ऐसा लेखक, जो अपनी कलम के कारण अपने देश में डराया गया हो. जिसे जान बचाकर वहां से भागना पड़ा हो. ग्वेई को ये प्राइज़ दिए जाने का ऐलान होने पर चीन ने स्वीडन को धमकी दी. कहा, अंजाम भुगतना पड़ेगा. स्वीडन के प्रधानमंत्री स्टीफन लोफियन ने चीन की धमकी का जवाब देते हुए कहा-

इस तरह की धमकियों के आगे झुकने वाले नहीं हैं हम. कभी नहीं झुकेंगे हम, कभी समझौता नहीं करेंगे. स्वीडन में हर किसी के पास अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है. यहां हमेशा ऐसा ही रहेगा.

 

कितनी ख़ूबसूरत बात है न कि एक शरणागत के लिए चीन से भिड़ गया है स्वीडन.


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