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क्या कभी सचिन, गांगुली और द्रविड़ ने एक साथ सेंचुरी मारी है?

26 अगस्त 2002. लीड्स, इंग्लैंड. एक ठंडा दिन लेकिन बाकी दिनों की तुलना में कुछ गर्म. अनिल कुंबले. लंबी टांगें, लंबी बाहें, फ्रेंच कट दाढ़ी के साथ एक तेज़ गेंद फेंकते हैं. बिहार-झारखंड में ऐसी गेंदों को भर्री के नाम से जाना जाता है. बैटिंग पर एंड्रू कैडिक. कैडिक के पैरों के ठीक आगे गेंद टप्पा खाती है. कुम्बले की आदत के अनुसार गेंद उछाल खाती है. कैडिक गेंद को बल्ला दिखाकर उसे वहीं रोक लेना चाहते थे. लेकिन कैडिक से उछाल संभलती नहीं.

गेंद बल्ले का ऊपरी किनारा खाती है, सेकंड स्लिप के सर के ऊपर उछल जाती है. स्लिप में खड़ा फील्डर उस पर हाथ मारता है लेकिन फंसती नहीं. गेंद को लेकर लोट जाता है. गेंद कई बार उछलती है, लेकिन फिर हाथों में ही आ गिरती है. अम्पायर उंगली उठा देता है. इनिंग्स से पीछे चलती इंग्लैंड की टीम का आखिरी विकेट गिर गया. इंडिया एक इनिंग्स और 46 रनों से मैच जीत चुका था. स्लिप में खड़ा फील्डर इंडिया का कप्तान. सौरव गांगुली. मैदान में कूदते फिर रहे थे.

Saurav Ganguly

फ़्लैश बैक – इस दिन के 4 दिन पहले

गांगुली टॉस जीतकर पहले बैटिंग करने को कहते हैं. सहवाग पहले विकेट के रूप में पवेलियन वापस पहुंच जाते हैं. ये वो वक़्त था, जब लगता था कि सहवाग चाइनीज़ प्रोडक्ट हैं. चले तो चांद तक, नहीं तो रात तक. उन दिनों इंडियन क्रिकेट के बारे में कुछ बातें हमेशा ही कही जाती थीं. कहते थे कि सचिन इतने रन बनाते हैं कि अब बोरिंग हो गए हैं.

वो दुनिया के सबसे अच्छे बैट्समैन तो हैं, मगर मैच विनर नहीं हैं. बॉलर उन्हें बांध दे, तो वो खुल नहीं पाते और निपट जाते हैं. कहते थे कि गांगुली छोटी गेंदें नहीं खेल पाते हैं. ये हर किसी को मालूम था. एक छोटे बच्चे को भी. कहते थे कि राहुल द्रविड़ अपने ही अन्दर कॉम्प्लेक्स हुए घूम रहे थे. वो अपनी टेक्नीक्स को दुरुस्त करने में खर्च हुए जा रहे थे. उन्हें परफेक्शन की भूख थी. और यही भूख उनके क्रिकेट को खाए जा रही थी. 

22 अगस्त 2002. ये सभी बातें झुठलाई जाने वाली थीं. जिन्होंने कभी ये बातें कहीं-सुनी, लिखी-पढ़ीं थीं, उनके मुंह लाल होने वाले थे. इंडिया टेस्ट सीरीज़ में एक मैच हारने और एक ड्रॉ करवाने के बाद 1-0 से पीछे चल रही थी. सहवाग पवेलियन वापस जा चुके थे. और उनकी जगह आये द्रविड़ इस बात की कसम खाकर आये थे कि सभी तैरती हुई गेंदों को वो बल्ले के बीचों-बीच से ही खेलेंगे. उनका बल्ला, बल्ला नहीं एक शीशा था जिसे सीधा रखकर वो बॉलर्स को उनका मुंह दिखाते ही रहना चाह रहे थे.

द्रविड़ ने शुरुआती मूवमेंट को झेला और बॉलर्स को झेलाया. अन्दर आती गेंदों को खेला और बाहर जाती गेंदों को जाने दिया. खब्बू हिंदी कमेंट्री के अनुसार, ‘सम्मान दिया.’ द्रविड़ एक बौद्ध भिक्षु की माफ़िक खेल रहे थे. ज्ञान की खोज में. बिना किसी मोह के. अक्सर सोचता हूं कि अच्छा हुआ जो टेस्ट मैचों पर पांच दिनों की बंदिशें लगा दी गयीं. वरना द्रविड़ आज भी किसी टेस्ट मैच में खेल रहे होते.

Rahul Dravid

संजय बांगड़ को फ़्लिंटॉफ़ ने चलता किया तो क्रीज़ पर आये सचिन. सचिन कुछ ही सालों बाद उस मुक़ाम तक पहुंच गए थे, जहां इंडियन टीम पहली वो टीम बन गयी थी, जिसके फैन्स उसका पहला विकेट गिरने पर तालियां पीटने लगते थे. उस समय इसी समय की पृष्ठभूमि तैयार की जा रही थी. सचिन इस वक़्त एक बुरे दौर से गुज़र रहे थे. उन पर सवाल उठाये जा रहे थे.

अखबारों का कहना था कि उनका बल्ला खामोश है. क्लीशे वाली बातें. सचिन इस मैच में तख्ता पलटने वाले थे. उनकी स्ट्रेट ड्राइव उतनी ही शानदार तरीके से निकल रही थीं, जैसे उनके पुल शॉट्स. साथ ही उनके विकेट्स के बीच में दौड़ने की तेज़ी उनके कॉन्फिडेंस को दिखा रही थी. उस दिन सचमुच कुछ ऐसे का अंदेशा किया जाने लगा था जिसके बारे में इतिहास में दर्ज होने जैसी बातें कही जाती हैं.

Sachin Tendulkar

इन्हीं सब के बीच तेंदुलकर ने अपना तीसवां शतक पूरा किया. उनके आगे रिकॉर्ड लिस्ट में सिर्फ हमवतन सुनील गावस्कर बचे हुए थे. द्रविड़ के साथ 150 रनों की फन्ने खां पार्टनरशिप की और तभी द्रविड़ को ऐश्ले जाइल्स ने स्टम्प करवा दिया. द्रविड़ के जाते सचिन के साथ आये गांगुली. इंडियन कैप्टन और उस वक़्त में काफ़ी खरी-खोटी सुनते रहने वाले सौरव गांगुली. लेकिन उस दिन वो भी झोंके में थे. भारतीय त्रिमूर्ति चरम पर थी. वैसे जैसे अंडरटेकर अपनी कब्र से बाहर निकल सब को चित्त करने उठा खड़ा हो गया हो. वो सब कुछ जो अब तक लिखा गया था उन पर स्याही उड़ेलने. और स्याही रनों के सहारे उड़ेली भी जा रही थी.

बाकायदे. ऐश्ले जाइल्स पूरे मैच में पैड्स पर गेंद फेंके ही जा रहे थे. ऐसा लग रहा था जैसे किसी घोड़े के टप्पे को इस तरह लगा दिया हो कि उसे सीधे की बजाय टेढ़ा दिख रहा हो. और वो बारम्बार सीधे दौड़ने की बजाय टेढ़ा दौड़ रहा हो. जाइल्स को गांगुली ने खोपचे में लिया. एक ओवर में 23 रन हौंके. सौरव गांगुली से जुड़ी एक किंवदंती है जिस पर हर हिन्दुस्तानी को विश्वास है. अगर आप उस बात को नहीं मानते तो आप पर कट्टर क्रिकेट प्रेमी देशद्रोह जैसा संगीन आरोप भी लगा सकता है. किंवदंती के अनुसार सौरव गांगुली किसी स्पिनर पर अगर आगे बढ़ जायें तो गेंद बाउंड्री पर पड़ी निष्क्रिय रस्सी के उस पार, बहुत पार ही गिरती है. जाइल्स को गांगुली की नाइनटीज़ के दौरान इस बात का साक्षात दृष्टांत मिल रहा था.

nasser Hussainमैच के दौरान सबसे शानदार समय तब आया, जब अम्पायर ने गांगुली को बैड लाइट की दुहाई देते हुए खेल रोकने को कहा, तो गांगुली ने मना कर दिया. उन्हें मालूम था कि वो पीक पर बैटिंग कर रहे थे. उनके सामने उस वक़्त इंग्लैंड की वही हालत हो चुकी थी, जो रॉकी बेलबोआ ने अपोलो क्रीड की करी थी. चौथे विकेट के लिए गांगुली और तेंडुलकर ने 59.3 ओवर में 249 रन बनाये. गांगुली ने 128 रन बनाये.

इनिंग्स खतम होते-होते एंड्रू कैडिक बिना विकेट लिए 139 रन दे चुके थे. एश्ले जाइल्स 134 रन पर 1 विकेट ले पाए थे और एलेक्स ट्यूडर 113 रन देकर आखिरी विकेट ही निकाल पाए थे. नासिर हुसैन की हालत इंजीनियरिंग के दिनों में मेकेनिक्स का पेपर देते हुए मुझे समझ में आई. उन्हें कुछ भी समझ नहीं आ रहा था. वो बस समय ख़त्म होने का इंतज़ार ही कर रहे थे.

इंडियन क्रिकेट के इतिहास में पहली बार 150 रन के ऊपर लगातार तीन पार्टनरशिप बनी थीं. मैच इंडिया ने जीता. इनिंग्स के अंतर से. इंग्लैंड पहली इनिंग्स में 273 और दूसरी में 309 पर ऑल आउट हुआ. कुम्बले ने पहली इनिंग्स में 3 और दूसरी इनिंग्स में 4 विकेट लिए. राहुल द्रविड़ 148 रन बनाकर मैन ऑफ़ द मैच हुए.

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