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पुतिन की नाक में दम करने वाले नेता को मारने के लिए दिया गया नोविचोक क्या है?

आप आंसू गैस तो जानते ही होंगे. दुनिया की सरकारें खुले हाथों से इसका इस्तेमाल करती हैं. ये टीयर गैस एक तरह का केमिकल है. इस गैस के संपर्क में आकर इंसान की आंखें जलने लगती हैं. आंख आंसू से भर जाते हैं. सांस लेने में तकलीफ़ होती है. कुछ देर तक इंसान को कुछ नहीं सूझता. आंसू गैस के इसी स्वभाव के कारण सिक्यॉरिटी फोर्सेज़ भीड़ को तितर-बितर करने के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं.

आज भले ये गैस नागरिकों पर इस्तेमाल होती हो, मगर एक जमाने में ये युद्ध का हथियार थी. जंग के मैदान में इसे पहली बार फ्रांस ने इस्तेमाल किया था. अगस्त 1914 में, जर्मन सेना के खिलाफ़. ये पहली बार था, जब किसी जंग में रासायनिक गैस का इस्तेमाल किया गया हो. मगर आंसू गैस कोई मारक हथियार नहीं था. ज़्यादा से ज़्यादा ये इतना कर सकता था कि कुछ देर के लिए दुश्मन सेना में भगदड़ मचा दे. टीयर गैस का युद्ध में बहुत फ़ायदा भले न मिला हो, मगर इसके इस्तेमाल से दूसरे रासायनिक हथियारों के लिए रास्ते खुल गए.

पहले वर्ल्ड वॉर के दौरान ऐसे कई केमिकल हथियार इस्तेमाल हुए. मसलन- क्लोरिन गैस, फॉसज़ीन, मस्टर्ड गैस. फिर जब युद्ध ख़त्म हुआ, तो दुनिया ने समझा कि जह़रीली गैसों के इस्तेमाल से तो सबको ख़तरा है. यही सोचकर साल 1925 में हुआ जिनिवा प्रोटोकॉल. इसमें ज़हरीली गैसों को हथियार की तरह इस्तेमाल किए जाने पर रोक लगाई गई.

Geneva Protocol 1925
साल 1925 का जिनिवा प्रोटोकॉल.

तो क्या इसके बाद केमिकल हथियार बनने बंद हो गए?

नहीं, इस प्रोटोकॉल के कुछ ही बरस बाद एक बेहद ख़तरनाक केमिकल हथियार की खोज हुई. वो केमिकल वेपन, जिसकी एक क़िस्म अभी सुर्खियों में है. ये सुर्खी जुड़ी है रूस के विपक्षी नेता अलेक्सी नवलनी से. कुछ दिनों पहले नवलनी की तबीयत बिगड़ी थी. इलाज के लिए उन्हें जर्मनी ले जाया गया. यहां जर्मन डॉक्टरों ने बताया कि नवलनी को ज़हर दिया गया है.

ये कौन सा ज़हर था? आर्सेनिक? या फिर साइनाइड? जवाब है, इन दोनों में से कोई नहीं. ये ज़हर इतना ख़तरनाक था कि जर्मन डॉक्टरों ने घबराकर अपने देश के आर्मी एक्सपर्ट्स को बुला लिया. इन एक्सपर्ट्स ने 2 सितंबर को अपनी रिपोर्ट दी. इसके मुताबिक, नवलनी को मिलिटरी ग्रेड का एक नर्व एजेंट दिया गया है. एक ख़ास तरह का नर्व एजेंट, जिसका नाम है- नोविचोक. रशियन भाषा में नोविचोक का मतलब होता है, न्यू Guy. नया आदमी. सोचिए, तड़पाकर मारने वाले एक ज़हरीले रसायन का नाम नया आदमी है.

Sereg And Yulia Skripal
सेरगी स्क्रिप्ल और उनकी बेटी यूलिया. (फोटो: एपी)

ये पहली बार नहीं है, जब रूस पर अपने किसी दुश्मन को नोविचोक देने का आरोप लगा हो. इससे पहले मार्च 2018 में नोविचोक का इस्तेमाल हुआ था. उस समय इसका निशाना बने थे रूस के पूर्व जासूस सेरगी स्क्रिप्ल और उनकी बेटी यूलिया. ब्रिटेन में हुए इस केमिकल वार में रशियन मिलिटरी इंटेलिजेंस सर्विस GRU के तीन अफसर शामिल थे. इस हमले से पहले वैज्ञानिकों, जासूसों और रासायनिक हथियार विशेषज्ञों के अलावा बहुत कम लोगों ने ही नर्व एजेंट नोविचोक का नाम सुना था. अब नवलनी पर इसके इस्तेमाल की पुष्टि होने के बाद नोविचोक एकबार फिर सुर्खियों में है.

Gru Officers
रशियन मिलिटरी इंटेलिजेंस सर्विस GRU के अफसर. (फोटो: एएफपी)

नोविचोक और नर्व एजेंट

ख़बर जान ली. अब थोड़ा नोविचोक के बारे में जान लेते हैं. हमने आपको बताया कि ये नर्व एजेंट की फैमिली का सदस्य है.  नर्व एजेंट को समझिए बेहद ज़हरीले रसायनों का एक समूह. नर्व एजेंट्स के ये टॉक्सिक केमिकल कहलाते हैं- ऑर्गेनोफॉस्फेट्स. ये केमिकल इंसान के शरीर में घुसकर उसके तंत्रिका तंत्र, यानी न्यूरॉन को तबाह कर देते हैं. ये शरीर में कैसे काम करता है, इसको हम आपको नोविचोक का असर बताते हुए एक्सप्लेन करेंगे.

नर्व एजेंट्स की तकरीबन 20 किस्में पता हैं दुनिया को. इनमें सबसे ज़हरीले हैं वीएक्स और सरीन. सरीन का इस्तेमाल तो कई कुख़्यात हमलों में हो चुका है. मसलन- ईरान के साथ युद्ध में सद्दाम हुसैन ने इसका इस्तेमाल किया. सद्दाम ने मार्च 1988 में कुर्दों के शहर हलाब्ज़ा पर भी सरीन बम गिराए थे. 2013 और 2017 में सीरियन तानाशाह बशर अल असद ने भी अपने ही लोगों पर सरीन का इस्तेमाल किया था.

Bashar Al Assad
सीरियन तानाशाह बशर अल असद (फोटो: एपी)

मगर वीएक्स और सरीन, दोनों से कहीं ज़्यादा घातक है नोविचोक

हमने नर्व एजेंट्स के बारे में बताते हुए ख़तरनाक ऑर्गेनोफॉस्फेट कंपाउंड का नाम लिया था. इस ज़हरीले परिवार का सबसे सीनियर मेंबर है नोविचोक. ये रसायन एक बारीक पाउडर की शक्ल में होता है. इस पाउडर से लिक्विड और गैस, दोनों तैयार किए जा सकते हैं. ये किसी चीज में मिलाकर खिलाया जा सकता है. हवा में छिड़ककर सांस के रास्ते शरीर में भेजा जा सकता है. ये त्वचा के सहारे भी शरीर में दाखिल हो सकता है.

शरीर में घुसकर नोविचोक हमारे तंत्रिका तंत्र, यानी नर्वस सिस्टम पर अटैक करता है. तंत्रिका तंत्र को समझिए हमारे शरीर का डाकिया. इसी के सहारे शरीर के अलग-अलग हिस्से दिमाग तक अपनी बात पहुंचाते हैं. ब्रेन भी बाकी शरीर से बातचीत के लिए इसी तंत्रिका तंत्र का इस्तेमाल करता है. इस सिस्टम में ‘कॉलीनेस्टरेस’ नाम के एंजाइम की बड़ी भूमिका होती है. अगर तंत्रिका तंत्र शरीर का पोस्टमैन है, तो इस सिस्टम को रेग्यूलेट करने वाला पोस्टमास्टर है कॉलीनेस्टरेस. इसी एंजाइम की मदद से हमारा नर्वस सिस्टम बाकी अंगों तक सिग्नल ट्रांसमिट कर पाता है. इसी कॉलीनेस्टरेस का काम ब्लॉक करता है नोविचोक.

Alexei Navalny
जर्मन डॉक्टरों ने बताया है कि अलेक्सी नवलनी को ज़हर दिया गया है. (फोटो: एपी)

कॉलीनेस्टरेस अपना काम नहीं कर पाता. इससे मांसपेशियों में ऐंठन होने लगती है. फेफड़ों में लिक्विड भरने लग जाता है. उल्टियां होने लगती हैं. बेहोशी आ जाती है. दिल की धड़कनें तेज़ हो जाती हैं. इंसान की श्वास नली में पैरालिसिस हो सकता है. ऐसा हुआ, तो दिल और दिमाग को ऑक्सिजन नहीं मिलेगा. नोविचोक की सबसे ख़ास बात ये है कि ये आसानी से पकड़ में नहीं आता. इसकी वजह से मरे हुए इंसान की जांच हो, तो लगेगा कि दिल का दौरा पड़ने से मौत हुई है.

तो क्या नोविचोक अटैक के इलाज का कोई तरीका नहीं?

तरीका है. एक ऐट्रोपाइन नाम की दवा है. अगर समय रहते मरीज़ को ये दवा दी जाए, उसका सही इलाज़ किया जाए, तो वो बच सकता है. ऐसा नहीं कि एक बार इलाज मिल जाने पर ख़तरा टल गया. इस केमिकल के एक्सपोज़ होने के सालों बाद तक इंसान पर बीमार पड़ने का ख़तरा बना रहता है.

ये तो हुआ नोविचोक का असर. मगर इसका नाम आते ही सबसे पहले रूस पर क्यों उंगली उठती है? इसके लिए आपको थोड़ी हिस्ट्री बतानी होगी. कोल्ड वॉर के दौर में हथियारों की ख़ूब होड़ थी. इसमें शामिल देश बस न्यूक्लियर हथियार ही नहीं बना रहे थे. उन्होंने केमिकल वेपन्स भी विकसित किए थे. केमिकल वेपन्स का ये खेल पर्दे के पीछे था. अमेरिका पर तो वियतनाम युद्ध के दौरान इसके इस्तेमाल का इल्ज़ाम भी लगा. उसने ईरान पर इस्तेमाल करने के लिए सद्दाम को भी केमिकल वेपन्स दिए. सोवियत पर भी ऐसे कई आरोप थे. फिर 1991 में सोवियत का विघटन हुआ. हथियारों से जुड़े कई तरह के समझौते हुए. इनमें से एक था, 1993 में हुआ केमिकल वेपन्स कन्वेंशन. इसमें 20 तरह के नर्व एजेंट्स की लिस्ट बनी. 1997 में जब इस कन्वेंशन पर आधारित अंतरराष्ट्रीय क़ानून बना, तो बाकी केमिकल हथियारों के साथ इन 20 नर्व एजेंट्स के इस्तेमाल पर भी बैन लगा.

Chemical Weapons Convention 1997
1997 में केमिकल वेपन्स कन्वेंशन में 20 नर्व एजेंट्स के इस्तेमाल पर बैन लगा था.

नोविचोक बैन से कैसे बच गया?

मगर नोविचोक इस बैन से बच गया. इसलिए कि नर्व एजेंट्स की उस लिस्ट में इसका नाम ही नहीं था. नाम इसलिए नहीं था कि रूस ने कभी इसके होने की बात ही नहीं मानी. अब जो चीज है ही नहीं, उसपर बैन कैसे लगाएंगे?

रूस ने भले नोविचोक को डिक्लेयर न किया हो, मगर दुनिया को इस केमिकल की भनक थी. इस जानकारी का ज़रिया बने ख़ुद रूस के वैज्ञानिक. इनमें से पहला नाम था, आंद्रेई ज़ेलेज़न्याकोव. आंद्रेई नोविचोक डिवेलप करने वाली टीम का हिस्सा थे. इसी केमिकल पर प्रयोग के दौरान 1987 में लैब के भीतर एक हादसा हुआ. इस ऐक्सिडेंट में आंद्रेई नोविचोक के सीधे संपर्क में आ गए. उस वक़्त आंद्रेई की जान तो बच गई, मगर उनके कई अंग ख़राब हो गए. बहुत कोशिश के बाद भी आंद्रेई को ठीक नहीं किया जा सका. 1992 में उनकी मौत हो गई. मगर मरने से पहले आंद्रेई एक बड़ा काम कर गए. मौत से कुछ दिन पहले उन्होंने एक अख़बार को नोविचोक की कहानी सुना दी. बाद के बरसों में सोवियत के कई केमिकल वेपन्स प्रोग्राम में काम करने वाले कई वैज्ञानिक अमेरिका जाकर बस गए. इनमें से भी कई ने नोविचोक का नाम लिया. मगर तब भी रूस इस केमिकल हथियार के अस्तित्व को नकारता रहा.

Andrei Zheleznyakov
आंद्रेई ज़ेलेज़न्याकोव. (फोटो: The Guardian)

नोविचोक के इस्तेमाल का पहला केस भी रूस से ही सामने आया था

ये 1995 की बात है. उस साल एक रूसी कारोबारी और उसके सेक्रटरी पर इस केमिकल का इस्तेमाल हुआ. उस घटना के बाद 2018 में आकर सेरगी स्क्रिप्ल केस में इसका नाम सुना दुनिया ने. उस केस में एक परफ्यूम बोतल के अंदर भरकर इसे इस्तेमाल किया गया था. सेरगी और उनकी बेटी तो हमले में बच गए. मगर हमलावरों की फेंकी वो परफ्यूम बोतल एक आदमी को मिली. उसने अपनी गर्लफ्रेंड को परफ्यूम समझकर वो बोतल दे दी. लड़की ने अच्छी-खासी मात्रा में उसे शरीर पर छिड़का और मर गई.

Gerhard Schrader
गेरार्ड श्राडेर: (फोटो: Bayer AG Corporate History & Archives)

आपको एक ट्रिविया बताएं. जर्मनी ने हमें बताया कि ऐलेक्से नवलनी पर नोवोचिक इस्तेमाल हुआ. नोवोचिक एक नर्व एजेंट है. और पता है, नर्व एजेंट की खोज कहां हुई थी? इसी जर्मनी में. इस खोज का ताल्लुक था मकई से. उन दिनों जर्मनी में लोग मक्के की फसल में लगने वाले कीड़ों से तंग थे. इनसे निपटने के लिए अच्छा कीटनाशक खोजा था रहा था. 1936 में यही कीटनाशक बनाने की कोशिश कर रहे जर्मन रसायनशास्त्री गेरार्ड श्राडेर ने नर्व एजेंट की खोज की थी. उस पहले नर्व एजेंट का नाम था- ताबुन. जर्मन भाषा में ताबुन का मतलब होता है, टैबू. माने कोई निषिद्ध काम. ये बहुत ज़हरीला रसायन था. खेती में इस्तेमाल होता, तो लोग मरते. ऐसे में गेरार्ड श्राडेर कोई रसायन खोजने लगे. पता नहीं संयोग था कि एक बरस बाद कीटनाशक बना रहे उनके हाथों ने एक और नर्व एजेंट बना लिया. ताबुन से भी ज़हरीला. इस केमिकल का नाम था- सरीन. जिसने आगे चलकर हज़ारों बेग़ुनाहों की जान ली.


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