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रूस के पूर्व जासूस की हत्या में व्लादिमीर पुतिन की क्या भूमिका थी?

ये कहानी एक रूसी जासूस की है. जो एक समय तक अपने देश के लिए जीने-मरने की कसमें खाता था. फिर एक दिन उसका अपनी सरकार से मोहभंग हो गया. वो अपना देश छोड़कर ब्रिटेन भाग गया. उसने अपनी सरकार का साथ छोड़ा था, लेकिन उसकी सरकार का ऐसा कोई इरादा नहीं था. उसके लिए सज़ा मुकर्रर हो चुकी थी. उसका हश्र सबको मालूम था. बस ये चीज़ पता नहीं थी कि उसे कब और कैसे सज़ा मिलेगी.

वो दिन आना तय था और आया भी. बिना किसी चेतावनी, बिना किसी संदेह के. एक दिन चाय पर चर्चा के बाद वो बीमार पड़ा. उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया. वहां कुछ ही दिनों बाद उसके सिर के सारे बाल गायब हो गए. डॉक्टरों ने उसे बचाने की पूरी कोशिश की. लेकिन, वे असफ़ल रहे. अस्पताल में भर्ती होने के तीन हफ़्ते बाद उसने दम तोड़ दिया. हालांकि, मरने से पहले उसने अपनी पूरी कहानी ब्रिटिश खुफिया एजेंसी को बता दी थी. इस कहानी ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया था. इसके चलते कई हफ़्तों तक पूरा ब्रिटेन डर के साये में जीता रहा.

कहानी अलेक्जेंडर लिविएंको की हत्या की

ये कहानी पूर्व-एफ़एसबी जासूस और बाद में ब्रिटिश नागरिक बने अलेक्जेंडर लिविएंको की है. लिविएंको के साथ क्या हुआ था? वो अपना देश छोड़कर क्यों भागा था? उसकी हत्या की पूरी कहानी क्या है? इस हत्या के तार रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से क्यों जुड़ते हैं? और, आज हम लिविएंको की चर्चा क्यों कर रहे हैं? सब विस्तार से बताएंगे.

Alexander Litvinenko
पूर्व-एफ़एसबी जासूस और बाद में ब्रिटिश नागरिक बने अलेक्जेंडर लिविएंको

साल 1991. सोवियत संघ के विघटन के बाद रशियन फ़ेडरेशन की स्थापना हुई. आम बोलचाल में इसे रूस के नाम से जाना जाता है. रूस के पहले राष्ट्रपति बने, बोरिस येल्तसिन. उनके कार्यकाल में सरकारी भ्रष्टाचार चरम पर था. महज आठ साल में हालात यहां तक पहुंच गए कि येल्तसिन का कुर्सी पर बने रहना असंभव हो गया. ऐसे में उन्होंने एक दांव खेला. सोवियत संघ के दौर की खुफिया एजेंसी केजीबी के एक एजेंट पर. इस एजेंट का नाम था, व्लादिमीर पुतिन. सोवियत संघ के विघटन के बाद केजीबी को भंंग कर दिया गया था. उसके स्थान पर एक नई खुफिया एजेंसी बनाई गई. फ़ेडरल सिक्योरिटी सर्विस या एफ़एसबी (FSB).

जुलाई 1998 में पुतिन को FSB का डायरेक्टर बना दिया गया. कुछ ही समय बाद येल्तसिन ने पुतिन को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया. मतलब ये कि येल्तसिन के बाद राष्ट्रपति की कुर्सी पर पुतिन का बैठना तय था. लेकिन ये इतना आसान था नहीं. इसके लिए जनता के वोट की ज़रूरत थी. और, आम जनता के बीच येल्तसिन की पकड़ बिल्कुल ढीली हो चुकी थी. उनकी अप्रूवल रेटिंग दो प्रतिशत तक पहुंच चुकी थी.

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रूस के पहले राष्ट्रपति बने, बोरिस येल्तसिन ने जुलाई 1998 में पुतिन को FSB का डायरेक्टर बना दिया गया.

4 बम धमाके और  पुतिन अपने एजेंडे में कामयाब

ऐसे ही दौर में कुछ धमाके हुए और सिक्का पूरी तरह से पलट गया. सितंबर 1999 में दो हफ़्ते के अंतराल में राजधानी मॉस्को में चार बम धमाके हुए. इन हमलों में तीन सौ से अधिक लोग मारे गए. जबकि एक हज़ार से अधिक लोग घायल हुए थे. इन बम धमाकों ने आम लोगों में दहशत भर दी. सरकार ने इस आपदा को अवसर में बदलने में पूरा ज़ोर लगा दिया. उन्होंने लोगों के मन में भरी दहशत को भुनाना शुरू कर दिया. बिना किसी सबूत के इन बम धमाकों का दोष चेचेन विद्रोहियों पर डाल दिया गया. पुतिन को चेचेन वॉर का मुखिया बना दिया गया. उन्होंने ये साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि अगर कोई व्यक्ति इस दहशत से आज़ादी दिला सकता है तो वो मैं ही हूं. पुतिन अपने एजेंडे में कामयाब रहे. जब मार्च 2000 में राष्ट्रपति पद का चुनाव हुआ, उन्हें चुनौती देने वाला कोई नहीं बचा था. पुतिन 53.4 प्रतिशत वोट जीतकर रूस के राष्ट्रपति बन गए.

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सितंबर 1999 में दो हफ़्ते के अंतराल में राजधानी मॉस्को में चार बम धमाके हुए. इन हमलों में तीन सौ से अधिक लोग मारे गए. जबकि एक हज़ार से अधिक लोग घायल हुए थे.

यहां पर एक विरोधाभासी घटना का ज़िक्र ज़रूरी हो जाता है. सितंबर 1999 में मॉस्को के अपार्टमेंट्स में चार बम धमाके हुए थे. लेकिन एक पांचवा बम भी था, जो फटा नहीं था. ये बम 22 सितंबर को मिला था. एक बिल्डिंग के बेसमेंट में. स्थानीय पुलिस अधिकारियों ने इस मामले में तीन लोगों को गिरफ़्तार किया. आपको ये जानकर हैरानी होगी कि ये तीनों लोग चेचेन विद्रोही नहीं, बल्कि FSB के एजेंट थे. FSB के डायरेक्टर ने बयान दिया कि ये एक एंटी-टेरर ड्रिल था. FSB ने दावा किया कि वहां विस्फ़ोटक की जगह चीनी का पाउडर रखा हुआ था. इस कथित ड्रिल और अपार्टमेंट्स में हुए धमाकों की सच्चाई कभी बाहर नहीं आई. सच कहा जाए तो कभी बाहर आने नहीं दी गई. मार्च 2000 में इस संबंध में दो मोशन रूस की संसद में पेश किए गए, लेकिन इन्हें रिजेक्ट कर दिया गया. फिर एक स्वतंत्र कमीशन ने जांच शुरू की. इससे पहले कि कोई सच बाहर आता, कमीशन से जुड़े मुख्य लोग रहस्यमयी परिस्थितियों में मरने लगे. कमीशन की जांच पीछे छूट गई.

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सितंबर 1999 में मॉस्को के अपार्टमेंट्स में चार बम धमाके हुए थे. लेकिन एक पांचवा बम भी था, जो फटा नहीं था. ये बम 22 सितंबर को मिला था. एक बिल्डिंग के बेसमेंट में.

किताब में धमाकों के पीछे FSB का हाथ बताया गया

सितंबर 1999 के बम धमाकों पर एक किताब लिखी गई. साल 2002 में. इस किताब का नाम था, ब्लोइंग अप रशिया: टेरर फ़्रॉम विदिन. इस किताब में बतौर लेखक दो लोगों का नाम छपा था. इनमें से एक नाम अलेक्जेंडर लिविएंको का था. इस किताब के ज़रिए ये साबित करने की कोशिश की गई थी कि सितंबर 1999 के धमाकों के पीछे FSB का हाथ था. दावा किया गया कि FSB धमाकों से उपजी दहशत के सहारे पुतिन को स्थापित करना चाहती थी. उन्हें इसमें कामयाबी भी मिली. इस किताब को रूस में बैन कर दिया गया. हालांकि, दुनिया की दो दर्जन से अधिक भाषाओं में इसका अनुवाद हो चुका है.

Blowing Up Russia
Blowing Up Russia

इस किताब के चलते लिविएंको ने रूसी सरकार से दुश्मनी का दूसरा पड़ाव पार कर लिया था. पहला पड़ाव क्या था? लिविएंको का जन्म 1962 में हुआ था. स्कूल के बाद उसने आर्मी ज्वाइन कर ली. 1988 में लिविएंको केजीबी में शामिल हो गया. केजीबी के भंग होने के बाद लिविएंको FSB में आ गया. चतुराई और मेहनत के दम पर उसने अपनी पहचान कायम कर ली थी. 1997 में लिविएंको को URPO में शामिल कर लिया गया. ये FSB का टॉप-सीक्रेट हिट स्क़्वाड था.

उसी कालखंड में बोरिस बेरोज़ोस्की नाम का एक उद्योगपति ख़ूब चर्चा में था. बोरिस येल्तसिन से उसकी क़रीबी बढ़ती जा रही थी. कहा जाता है कि बेरोज़ोस्की के कहने पर ही येल्तसिन ने पुतिन को अपना उत्तराधिकारी बनाया था. शायद बेरोज़ोस्की को ये भरम था कि पुतिन कठपुतली की तरह उनके इशारे पर काम करेंगे. लेकिन ये भरम जल्दी ही टूटने वाला था.

बेरोज़ोस्की ने क्रेमलिन में घुसते ही कई दुश्मन बना लिए थे. उन्हें मारने की कई साज़िशें रचीं गई. ऐसी ही एक साज़िश में लिविएंको को भी हिस्सा बनाया गया. लेकिन उसने बेरोज़ोस्की को मारने से मना कर दिया. कुछ समय बाद लिविएंको ने सारा कच्चा-चिट्ठा मीडिया के सामने खोल दिया. लिविएंको के दावे में कितनी सच्चाई थी, ये कभी पता नहीं चल पाई.

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बेरोज़ोस्की के कहने पर ही येल्तसिन ने पुतिन को अपना उत्तराधिकारी बनाया था.

हालांकि, मीडिया में आने का खामियाजा लिविएंको को भुगतना पड़ा. मार्च 1999 में उसे पहली बार गिरफ़्तार किया गया. आठ महीने बाद उसे रिहा किया गया. कुछ महीने बाद उसे दूसरे केस में जेल में बंद किया गया. इस बार भी उसे रिहाई मिल गई. सरकार उसके ऊपर तीसरा केस लादने की तैयारी करने लगी. लिविएंको को पता चल चुका था कि उसके लिए रूस में बने रहना बहुत मुश्किल होने वाला है. उसने अपनी पत्नी और बेटे के साथ रूस को अलविदा कह दिया.

लिविएंको ने ब्रिटेन में शरण ली

लिविएंको को ब्रिटेन में शरण मिली. उसने यहां ब्रिटिश खुफिया एजेंसी एमआई-सिक्स के लिए काम करना शुरू किया. लिविएंको रूसी माफ़िया गैंग्स की पोल खोलने में एमआई-सिक्स की मदद कर रहे थे. ये गैंग पुतिन और उनके खास लोगों की शह से अपना कारोबार पूरे यूरोप में फैला रहे थे. इसके अलावा, लिविएंको ने पत्रकार और लेखक के तौर पर भी अपना काम जारी रखा था. वो लगातार पुतिन की निरंकुशता पर सवाल उठा रहे थे. इसका नतीजा ये हुआ कि उनके दुश्मनों की संख्या लगातार बढ़ती चली गई.

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लिविएंके का बेटा और पत्नी.

फिर आई, 01 नवंबर 2006 की तारीख. इस दिन सेंट्रल लंदन के एक होटल में लिविएंको दो रूसी नागरिकों से मिले. आंद्रे लुगोवे और दमित्री कोवतुन. लिविएंको ने पहले भी इनकी मदद ली थी. लेकिन उन्हें ये पता नहीं था कि ये लोग असल में डबल एजेंट की भूमिका निभा रहे थे.

लिविएंको ने उस दिन होटल में ग्रीन टी के तीन-चार घूंट लिए. घर पहुंचते-पहुंंचते उनकी हालत बिगड़ने लगी थी. लिविएंको को अस्पताल ले जाया गया.

वहां उसके सिर के बाल गायब होने लगे. डॉक्टरों को ये अंदाज़ा तक नहीं था कि मरीज के साथ हुआ क्या है. कई दिनों तक जांच-पड़ताल चलती रही. उधर, मरीज की हालत खराब होती जा रही थी. 23 नवंबर 2006 को लिविएंको की मौत हो गई. मौत के कुछ घंटे पहले ही पता चला कि उन्हें पोलोनियम-210 नाम का केमिकल दिया गया है.

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23 नवंबर 2006 को लिविएंको की मौत हो गई. मौत के कुछ घंटे पहले ही पता चला कि उन्हें पोलोनियम-210 नाम का केमिकल दिया गया है.

ये बेहद रिएक्टिव केमिकल था. जानकारों के अनुसार, ये केमिकल सिर्फ़ और सिर्फ़ रूस में बनता था. इसका यूज़ न्युक्लियर ट्रिगर के लिए किया जाता था. और, इसके इस्तेमाल के लिए राष्ट्रपति पुतिन की मंज़ूरी ज़रूरी थी.

ये पता लगने के बाद अस्पताल में लिविएंको के कमरे को सील कर दिया गया. इसके बाद स्कॉटलैड यार्ड ने पूरे लंदन में जांच शुरू की. उन्होंने हर उस जगह पर रेडिएशन के स्तर को मापा, जहां पर लुगोवे और कोवतुन गए थे. स्कॉटलैंड यार्ड को इस बात के पुख्ता सबूत मिले कि पोलिनियम-210 उन्हीं के ज़रिए ब्रिटेन पहुंचा था. और, उन्हीं दोनों ने मिलकर लिविएंको को ज़हर दिया था.

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लुगोवे और कोवतुन

ब्रिटेन ने दोनों को प्रत्यर्पित करने की मांग रखी. लेकिन रूस ने इससे साफ़ इनकार कर दिया. 2015 में दमित्री कोवतुन वीडियो लिंक के सहारे जांच में हिस्सा लेने वाला था. लेकिन ऐन मौके पर उसने ऐसा करने से मना कर दिया.

आंद्रे लुगोवे बाद में रूस की संसद का सदस्य बन गया. वो आज भी सांसद है. और, लिविएंको की हत्या में अपना हाथ होने से इनकार करता है.

अलेक्जेंडर लिविएंको की कहानी आज क्यों सुना रहे हैं?

दरअसल, यूरोपियन ह्यूमन राइट्स कोर्ट (ECHR) ने इस केस में अपना फ़ैसला सुना दिया है. कोर्ट ने कहा कि अलेक्जेंडर लिविएंको की मौत के पीछे रूस का हाथ था. सबूतों और गवाहों के आधार पर अदालत इस नतीजे पर पहुंची है कि लिविएंको को ज़हर देने में लुगोवे और कोवतुन शामिल थे. वे दोनों रूसी एजेंट के तौर पर काम कर रहे थे. रूस ने दोनों के ऊपर लगे आरोपों की जांच करने की बजाय उसे सिरे से खारिज कर दिया. इससे ये साबित होता है कि इस हत्या में रूसी सरकार भी ज़िम्मेदार है.

ECHR ने रूस से कहा है कि वो लिविएंको की विधवा पत्नी मरीना लिविएंको को हर्ज़ाने के तौर पर एक करोड़ रुपये की राशि अदा करे. मरीना ने इस फ़ैसले का स्वागत किया है. उन्होंने कहा कि ये फ़ैसला एक उम्मीद की तरह है. उम्मीद कि रूस एक दिन बेहतर देश बनने में कामयाब होगा.

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कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि अलेक्जेंडर लिविएंको की मौत के पीछे रूस का हाथ था.

इस फ़ैसले पर रूस ने क्या कहा?

क्रेमलिन के प्रवक्ता दमित्री पेस्कोव ने कहा कि हम इस तरह के फ़ैसलों को नहीं मानते. लिविएंको के दो संदिग्ध हत्यारों में से एक लुगोवे अब रूस में सांसद बन है. उसने कहा कि अदालत का ये आदेश बेवकूफी भरा है. इस आदेश के आदेश के बाद मेरे लिए यूरोपियन कोर्ट का अस्तित्व खत्म हो चुका है.

लिविएंको के मामले में चाहे कोई भी अंतरराष्ट्रीय अदालत कोई फ़ैसला सुना दे, इन फ़ैसलों को अमलीजामा पहनाने की ज़िम्मेदारी रूसी सरकार की है. जब तक रूस इस मामले में ख़ुद से पहल नहीं करता, न्याय नामुमकिन है.

अफ़ग़ानिस्तान को लेकर दुनिया में क्या कुछ पक रहा है?

21 सितंबर 2021 को यूनाइटेड नेशंस जनरल असेंबली (UNGA) का 76वां सत्र शुरू हुआ. ये सत्र 27 सितंबर तक चलेगा. इसमें तमाम देशों के नेताओं को अपनी बात दुनिया तक पहुंचाने का मौका मिलता है. तालिबान ने भी इस बैठक में शामिल होने की मांग रखी है. उसने दोहा के अपने पॉलिटिकल ऑफ़िस के प्रवक्ता सुहैल शाहीन को यूएन में अफ़ग़ानिस्तान का राजदूत नियुक्त किया है.

यहां पर एक पेच फंस गया है. तालिबान की चिट्ठी से पांच दिन पहले ग़ुलाम इसाकज़ई ने यूएन की बैठक में शामिल होने की मंज़ूरी ले ली. ग़ुलाम इसाकज़ई, अशरफ़ ग़नी की सरकार की तरफ़ से यूएन में अफ़ग़ान राजदूत बनाए गए थे. 15 अगस्त को तालिबान ने काबुल पर क़ब्ज़ा कर लिया था. तालिबान के पहुंचने से पहले राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी देश छोड़कर भाग चुके थे.

तालिबान का कहना है कि पुरानी सरकार के प्रतिनिधि अफ़ग़ानिस्तान को रिप्रज़ेंट नहीं करते. इसलिए, उनकी तरफ़ से नियुक्त प्रतिनिधि को UNGA की बैठक को संबोधित करने का मौका मिलना चाहिए.

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यूनाइटेड नेशंस जनरल असेंबली में तालिबान ने अपनी बात रखने की मांग की है.

अब क्या होगा? वही होगा जो कमिटी को मंज़ूर होगा. कौन सी कमिटी? यूनाइटेड नेशंस की क्रेडेन्शियल्स कमिटी. ये कमिटी तालिबान की चिट्ठी पर विचार-विमर्श करेगी. फिर जाकर ये तय होगा कि तालिबान की तरफ़ से नियुक्त प्रतिनिधि को यूएन जनरल असेंबली में बोलने दिया जाए या नहीं. इस कमिटी में कुल नौ मेंबर हैं. इसमें अमेरिका, चीन और रूस भी शामिल हैं. ये तीनों यूएन सिक्योरिटी काउंसिल के स्थायी सदस्य भी हैं.

रूस और चीन, काबुल पर क़ब्ज़े के बाद से ही तालिबान सरकार को सपोर्ट करने की बात कर रहे हैं. अमेरिका भी कुछ-कुछ उसी दिशा में है. उसने तालिबान के साथ डील करने के बाद ही 20 साल पुराना युद्ध खत्म करने में कामयाबी पाई है. जानकारों का कहना है कि अमेरिका भी तालिबान की मांग पर सहमति जता सकता है.

 

Russia Afghanistan Conflict Taliban
Taliban

लेकिन इतने से बात नहीं बनने वाली. क्रेडेन्शियल्स कमिटी के बाकी छह सदस्य हैं – बहामास, भूटान, चिली, नामीबिया, सिएरा लियोन और स्वीडन. कमिटी की बैठक में इन देशों की राय भी अहम होने वाली है. पिछली बार तालिबान ने 1996 से 2001 तक अफ़ग़ानिस्तान में सरकार चलाई थी. उस वक़्त भी तालिबान ने यूएन जनरल असेंबली को चिट्ठी लिखी थी. लेकिन यूएन ने तालिबान सरकार को मान्यता देने से इनकार कर दिया था. उसके बदले, बुरहानुद्दीन रब्बानी के नेतृत्व वाली अपदस्थ सरकार के प्रतिनिधि यूएन की बैठकों में हिस्सा लेते थे.

इस बार क्या होगा? फिलहाल, जनरल असेंबली ने ग़ुलाम इसाकज़ई और तालिबान, दोनों की चिट्ठी कमिटी के पास भेज दी है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 27 सितंबर से पहले इस कमिटी की बैठक होने की कोई संभावना नहीं है. उसी दिन UNGA का सत्र समाप्त होना है. और, उसी दिन अफ़ग़ानिस्तान के बोलने की बारी है. यूएन के नियमों के अनुसार, जब तक तय न हो जाए, तब तक पुरानी सरकार के प्रतिनिधि को ही बैठक में शामिल होने का मौका मिलेगा.

जब तक कि कोई बड़ा फेरबदल न हो जाए, इस साल जनरल असेंबली की बैठक में तालिबान का शामिल होना नामुमकिन लग रहा है. बहुत संभावना है कि तालिबान को अगली बैठक में शामिल होने दिया जाए. लेकिन, इससे पहले यूनाइटेड नेशंस को अपनी रेपुटेशन के बारे में भी सोचना होगा. तालिबान की अंतरिम सरकार के पीएम, डिप्टी पीएम, गृहमंत्री समेत कई सदस्यों को यूएन ने प्रतिबंधित कर रखा है. कुछ तो घोषित आतंकी हैं और उनके ऊपर करोड़ों का ईनाम भी है. ऐसे में सवाल उठना तो लाज़िमी है. क्या समूची दुनिया का प्रतिनिधित्व करने का दावा करने वाली संस्था आतंकियों की सरकार की मांग को मान लेगी? क्या आम नागरिकों की आज़ादी छीनने वाली सरकार को वैश्विक मंच पर बोलने का मौका मिल जाएगा? इन सारे सवालों का जवाब कुछ ही दिनों में मिल जाएगा.

अब दक्षिण एशिया की बात

25 सितंबर को साउथ एशियन एसोसिएशन फ़ॉर रीज़नल कॉपरेशन (सार्क) देशों के विदेशमंत्रियों की बैठक तय थी. ये मीटिंग न्यू यॉर्क में होने वाली थी. यूएन जनरल असेंबली की ज़ारी बैठक के बीच. इस बार की बैठक की मेज़बानी नेपाल के पास थी.

सार्क में भारत, पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश, मालदीव, भूटान और अफ़ग़ानिस्तान शामिल हैं. अफ़ग़ानिस्तान इस गुट का सबसे नया सदस्य है. उसे 2017 में सार्क में शामिल किया गया था.

काबुल पर तालिबान के क़ब्ज़े के बाद सार्क की ये पहली बैठक होती, लेकिन पाकिस्तान की ज़िद की वजह से इसे रद्द करना पड़ा. पाकिस्तान की मांग थी कि इस बैठक में तालिबान के प्रतिनिधि को शामिल किया जाए. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत समेत कुछ और सदस्यों ने पाकिस्तान की मांग का विरोध किया. दुनिया के अधिकतर देशों ने तालिबान सरकार को मान्यता नहीं दी है. इनमें भारत और पाकिस्तान भी शामिल हैं. 21 सितंबर को पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने एक बयान दिया. क़ुरैशी ने कहा कि पाकिस्तान का जल्दबाजी में तालिबान सरकार को मान्यता देने का कोई इरादा नहीं है. पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान के हालात पर नज़र रख रहा है. अगर तालिबान को मान्यता चाहिए तो उसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय की राय का सम्मान करना होगा.

Imran Khan
पाकिस्तान की मांग थी कि सार्क की बैठक में तालिबान को भी शामिल किया जाए.

पाकिस्तान ने ख़ुद तालिबान को मान्यता नहीं दी है. लेकिन वो हर मंच पर तालिबान को प्रतिनिधित्व देने की मांग दोहरा रहा है. सार्क की बैठक से पहले पाकिस्तान ने कहा था कि अगर तालिबान को बैठक में शामिल नहीं होने दिया जा सकता, तो पुरानी सरकार के प्रतिनिधि को भी दरकिनार किया जाए. बाकी सदस्यों ने इस मांग पर आपत्ति जताई. सदस्यों के बीच आम सहमति न बन पाने के चलते बैठक को कैंसिल कर दिया गया. नेपाल ने इस बाबत बाकी सदस्यों के साथ साझा कर दी है.

सार्क की स्थापना दिसंबर 1985 में ढाका में हुई थी. इसका मुख्यालय नेपाल की राजधानी काठमांडू में स्थित है.


दुनियादारी: पूर्व जासूस अलेक्जेंडर लिविएंको की हत्या में रूस की क्या भूमिका थी?

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