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दुनिया सहमी हुई है, लेकिन ये कौन से देश हैं जो तालिबान के साथ खड़े हैं

अफगानिस्तान में तालिबान ने अपने पांव पूरी तरह जमा लिए हैं. अमेरिका समर्थित अफगानी सरकार गिरने के बाद तालिबान ने 15 अगस्त को राजधानी काबुल पर कब्जा कर लिया. इसके चलते राष्ट्रपति अशरफ गनी को देश छोड़कर भागना पड़ा. देश में अफरातफरी का आलम है. अफगानिस्तान का हाल देखकर दुनिया के तमाम देश आशंकाओं से सहमे हुए हैं. तालिबान (Taliban) का पुराना रिकॉर्ड इन आशंकाओं को बल दे रहा है. अमेरिका, ब्रिटेन, साउथ कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, भारत समेत कई देशों ने अपने दूतावास एक तरह से बंद करके राजनयिकों को वापस बुला लिया है. लेकिन इसके बीच कई देश ऐसे भी हैं, जो तालिबान के समर्थन में खड़े हैं. आइए इनके बारे में जान लेते हैं.

चीन

तालिबान का समर्थन करने वाले देशों में पहला नाम चीन का है. अफगानिस्तान की अशरफ गनी सरकार बेदखल होने के बाद चीन ने तालिबान से मैत्रीपूर्ण संबंधों की बात कही है. चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता हुआ चुनयिंग ने प्रेस वार्ता में कहा,

“हम उम्मीद करते हैं कि तालिबान सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण के वादे को निभाएगा. अफगानिस्तान के नागरिकों और विदेशी राजदूतों की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी लेगा.”

चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता ने आगे कहा कि अफगानिस्तान के लोग अपनी किस्मत का फैसला खुद करें. चीन उनके इस हक की इज्जत करता है. चीन अफगानिस्तान के साथ मैत्रीपूर्ण और सहयोगात्मक रिश्ते विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ने के लिए इच्छुक है.

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तस्वीर 28 जुलाई की है, जब अब्दुल गनी बरादर की अगुआई में चीन गए तालिबान के दल ने विदेश मंत्री वांग यी से मुलाकात की थी. (फोटो AP)

तालिबान और चीन की नजदीकियां हाल के समय में कुछ बढ़ी हैं. काबुल पर कब्जा करने से पहले तालिबान के दल ने चीन जाकर चीनी विदेश मंत्री वांग यी से मुलाकात की थी. ये दल मुल्‍ला अब्‍दुल गनी बरादर के नेतृत्व में चीन पहुंचा था. अफगानिस्तान से अमेरिकी सेनाओं की वापसी के ऐलान के बाद ये पहला मौका था, जब तालिबानी नेता चीन पहुंचे. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मुलाकात में चीन ने तालिबान नेताओं से कहा कि वो आतंकी संगठनों से अपने संबंध पूरी तरह खत्‍म करें. इनमें अल कायदा समर्थित उइगर मुस्लिम संगठन ETIM भी शामिल है. यह संगठन चीन के शिन्जियांग प्रांत में आजादी की लड़ाई लड़ रहा है.

ईरान

चीन के बाद दूसरा नाम आता है ईरान का. ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी ने अफगानिस्तान की नई सत्ता यानी तालिबान का समर्थन करने की बात कही है. इब्राहिम रईसी ने कहा,

“अफगानिस्तान में फौज की शिकस्त और अमेरिकी वापसी को शांति और सुरक्षा बहाली के तौर पर देखा जाना चाहिए. ईरान अफगानिस्तान में स्थिरता बहाल करने में मदद करेगा. फिलहाल अफगानिस्तान की यही पहली जरूरत है.”

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ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी ने अफगानिस्तान में स्थिरता बहाल करने के लिए तालिबान की मदद की बात कही है. (फोटो: इंडिया टुडे)

रईसी ने आगे कहा कि ईरान पड़ोसी और बिरादर देश की हैसियत से अफगानिस्तान के सभी गुटों को राष्ट्रीय सहमति बनाने के लिए निमंत्रण देता है. हम ये मानते हैं कि अफगानिस्तान के लोगों की भी यही मर्जी है कि वहां स्थिरता और सुरक्षा का माहौल बने. इसके लिए हम अफगानिस्तान में हो रही घटनाओं पर नजर बनाए हुए हैं.

वैसे तो शिया बहुल देश ईरान की सुन्नी मुस्लिमों वाले तालिबान से लंबे समय तक अनबन रही है. लेकिन पिछले कुछ साल में वह खुलकर तालिबान नेताओं से मेलजोल बढ़ा रहा है. जुलाई में ईरान ने तत्कालीन अफगान सरकार और उच्च स्तरीय तालिबान राजनीतिक कमेटी के बीच मीटिंग की मेजबानी भी की थी. यह अलग बात है कि अब अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे का असर ईरान को भी झेलना पड़ रहा है. तमाम अफगानी ईरान की सीमा में शरण लेने के लिए आ रहे हैं. ईरान पहले से ही अफगानी शरणार्थियों के लिए इंतजाम करता रहा है.

पाकिस्तान

तालिबान की जीत पर सबसे खुश होने वाले देशों में जो अगला नाम है, वह बहुत ही स्वाभाविक है. जी हां, हम पाकिस्तान की बात कर रहे हैं. पाकिस्तान ने तालिबान को काबिज होने के लिए बधाई भी दे डाली है. तालिबान की जीत पर पाकिस्तान के क्वेटा शहर में तो मिठाइयां भी बंट गईं. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने 16 अगस्त को कहा,

“अफगानिस्तान के लोगों ने गुलामी की बेड़ियां तोड़ी हैं. जब आप दूसरे का कल्चर अपनाते हैं तो फिर मानसिक रूप से गुलाम होते हैं. याद रखें कि यह वास्तविक दासता से भी बुरा है. सांस्कृतिक गुलामी की जंजीरों को तोड़ना आसान नहीं होता है. अफगानिस्तान में इन दिनों जो हो रहा है, वह गुलामी की जंजीरों को तोड़ने जैसा है.”

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पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने तालिबान के सत्ता में लौटने पर अफगानिस्तान को बेड़ियों से आजाद मुल्क बताया. (फोटो: साभार आज तक)

पाकिस्तान तालिबान का खुला समर्थक रहा है. तालिबान की जीत में पाकिस्तान अपनी जीत देख रहा है. उसे लग रहा है कि अब अफगानिस्तान में भारत का असर कम होगा, और इसका फायदा वह तालिबान के करीब जाकर उठा सकेगा. लेकिन जानकार इसे लेकर पाकिस्तान को आगाह भी कर रहे हैं. रक्षा मामलों के विशेषज्ञ सी. उदय भास्कर ने NDTV से बातचीत में कहा कि चीन और पाकिस्तान के लिए तालिबान भस्मासुर भी बन सकता है. अफगानिस्तान में जिस धार्मिक कट्टरता को हवा देने का दोनों देश प्रयास कर रहे हैं. उसका असर तहरीक ए तालिबान पाकिस्तान या चीन के मुस्लिम बहुल प्रांत शिनजियांग के उइगुर में देखने को मिल सकता है.

रूस

तालिबान के समर्थन करने वालों की फेहरिस्त में एक बड़ा और चौंकाने वाला नाम रूस का है. रूस ने तालिबान शासन में काबुल की स्थिति पिछली सरकार की तुलना में बेहतर बताई है. अफगानिस्तान में रूस के राजदूत दिमित्री जिरनोव ने तालिबान की तारीफ करते हुए कहा,

“तालिबान ने 24 घंटों में ही काबुल को गनी के शासन की तुलना में अधिक सुरक्षित बना दिया है. स्थिति शांतिपूर्ण और अच्छी है. शहर में सब कुछ शांत हो गया है.”

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, दिमित्री ने यह बात मॉस्को के एको मोस्किवी रेडियो स्टेशन से बात करते हुए कही. दिमित्री ने आगे कहा कि गनी का शासन ताश के पत्तों की तरह बिखर गया. उनके वक्त अव्यवस्था चरम पर थी. लोगों ने उम्मीद खो दी थी. विकास शून्य हो गया था. लेकिन अब तालिबान के 24 घंटे के शासन से पता चलता है कि शहर में आने वाले दिनों में सबकुछ ठीक होने वाला है.

Putin
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पूतिन. रूस ने कहा है कि अफगानिस्तान के नए हालात में उसके ठिकानों को कोई खतरा नहीं है. (फाइल फोटो AP)

रूस भले ही अब तालिबान के लिए दरियादिली दिखा रहा हो, लेकिन 80 के दशक में रूस ने अफगानिस्तान में अफगान मुजाहिदीन के खिलाफ अभियान चलाया था. हालांकि पिछले कुछ समय में रूस ने तालिबान के लिए कई बार वार्ता का आयोजन किया था. जानकारों का कहना है कि तालिबान का पक्ष लेकर रूस मध्य एशिया में अपने सैन्य ठिकाने को मजबूत करना चाहता है.

बता दें कि रूस, ईरान, चीन और पाकिस्तान जैसे देशों की अमेरिका से कई मुद्दों पर अनबन जगजाहिर है. ऐसे में अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी में ये देश अपना प्रभाव बढ़ाने का मौका तलाश रहे हैं.

(ये स्टोरी हमारे यहां इंटर्नशिप कर रहे रौनक भैड़ा ने लिखी है)


वीडियो- अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान का कब्जा महिलाओं के लिए क्या मुसीबतें लाएगा?

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