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उसे भारत से प्रेम था इसलिए उसे नाज़ी और हिटलर समर्थक माना जाने लगा

# मोगली और मेरा नाइंटीज़ का बचपन

नब्बे के दशक की कोई अलसाई सी संडे-मोर्निंग, रंगोली खत्म हो चुका है और हम ब्रश करते हुए या होमवर्क करते हुए बार-बार टीवी वाले कमरे में झांक रहे हैं. लग रहा है कि समय कितना स्लो चल रहा है. लेकिन फिर गुलज़ार का लिखा हुआ एक गीत कानों में पड़ता है:

अरे चड्डी पहन के फूल खिला है, फूल खिला है…

ये वो मोमेंट होता था जिसे शब्दों में बयान करना मुश्किल था. पूरे एक हफ्ते तक दूर रहे थे हमारे प्यारे दोस्त हमसे – मोगली, शेरखान, बघीरा!

जिस तरह से ‘मन कुंतो मौला’ को अलग अलग लोगों ने गाया है, और हर बार उतना ही प्रसिद्ध हुआ है, वैसे ही दी जंगल बुक के न जाने कितने वर्जन आ चुके हैं – नॉवेल के, कार्टून के, कॉमिक्स के, सीरियल के और फिल्मों के भी. हाल ही में इसका थ्री-डी मूवी वर्जन भी आया था – वो भी उतना ही लोकप्रिय जितना इसके अन्य संस्करण.

दी जंगल बुक का हाल ही में एक 3D फ़िल्म संस्करण आया है.
दी जंगल बुक का हाल ही में एक 3D फ़िल्म संस्करण आया है.

यानी ‘दी जंगल बुक’ को बिना किसी सेकंड थॉट के कालजयी रचना कहा जा सकता है. और इसके लेखक ‘रुडयार्ड किपलिंग’ को कालजयी लेखक.


# मुंबई कनेक्शन

रुडयार्ड किपलिंग का जन्म 30 दिसंबर, 1865 को, भारत में हुआ था. मुम्बई में – आज के मुम्बई और तब के बॉम्बे में. उन्होंने बॉम्बे के लिए लिखा –

‘मेरे लिए यह(बॉम्बे) सभी शहरों की जननी है
क्यूंकि यहीं पर मेरा जन्म हुआ था
यहीं पर दुनिया का अंत होता है.’

भारत से रुडयार्ड का वही कनेक्शन था जो शायद कृष्ण का यशोदा से था. उनके पिता भी खुद को और अपने परिवार को एंग्लो-इंडियन कहते थे.


# चाचा नेहरु और अंकल किपलिंग

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री – जवाहर लाल नेहरु को भी रुडयार्ड का लेखन पसंद था. रुडयार्ड का नॉवल ‘किम’ तो उन्हें विशेष तौर पर पसंद था और इसका वो ज़िक्र भी किया करते थे.

‘किम’ को ‘मोर्डन लाइब्रेरी’ ने बीसवीं सदी के सौ महानतम उपन्यासों में से एक बताया था. होने को तो इसमें लाहौर में रहने वाले एक अनाथ आयरिश बच्चे की दास्तां है लेकिन ये उपन्यास भारतीय लोगों और भारतीय संस्कृति के ऊपर एक रुचिकर शोधपत्र के रूप में ज्यादा मान्यता प्राप्त है.


# हिटलर कनेक्शन

रुडयार्ड का भारत के प्रति प्रेम इतना गहरा था कि उनके लगभग हर नॉवल के कवर में कमल का फूल, हाथी और स्वस्तिक का चिन्ह मुद्रित है. आज का दौर होता तो उन्हें भाजपा या बसपा समर्थक समझा जाता, लेकिन वो दौर द्वितीय विश्व युद्ध का था इसलिए स्वस्तिक को हिटलर की नाज़ी पार्टी से जोड़कर देखा जाता था. और इसी कन्फ्यूजन का शिकार रुडयार्ड भी हुए. वो भी तब जबकि स्वस्तिक के साथ नाज़ी कनेक्शन 1920 के बाद स्थापित हुआ था और किपलिंग उससे पहले से ही इसे अपनी नॉवल के मुखपृष्ठ में यूज़ करते आ रहे थे.

रुडयार्ड अपनी हर पुस्तक के कवर में स्वस्तिक, हाथी और कमल यूज़ करते थे.
रुडयार्ड अपनी हर पुस्तक के कवर में स्वस्तिक, हाथी और कमल यूज़ करते थे.

हालांकि उन्होंने स्वस्तिक को बाद में हटा भी दिया था. और बाद में लोगों को, जो उन्हें नाज़ी समर्थक समझते थे, भी अपनी भूल का अहसास हो गया था.


# सेंस ऑफ़ ह्यूमर

अंतिम दिनों में वो काफी बीमार रहने लगे थे, लेकिन तब भी उनका सेंस-ऑफ़-ह्यूमर कमाल का था. व्हाट्सएप और जियो के इस दौर में जब हर दूसरी खबर फेक न्यूज़ लगती है, विश्वास करना कठिन है कि आज से लगभग सौ साल पहले भी हालात कमोबेश ऐसे ही रहे होंगे. लेकिन रुडयार्ड के आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब एक पत्रिका में उनकी मृत्यु की ‘फेक न्यूज़’ पब्लिश हुई. उसके बाद उन्होंने पत्रिका को लिखा:

‘अभी-अभी आपकी पत्रिका के माध्यम से मालूम चला है कि मैं मर चुका हूं, मुझे अपनी सबस्क्राइबर्स की लिस्ट से हटाना मत भूलना.’

होने को इसके कुछ ही महीनों बाद वो वास्तव में मृत्यु को प्राप्त हो गए थे. 12 जनवरी 1936 की रात, किपलिंग की छोटी आंत में रक्तस्राव होने लगा और उन्हें केवल एक सप्ताह ही और बचाया जा सका. 70 वर्ष की उम्र में 18 जनवरी को उनका देहावसान हो गया.


# और अंत में कविता

जब 1907 में उन्हें साहित्य के लिए नॉबेल प्राइज मिला तो वे इस पुरस्कार को पाने वाले अंग्रेजी के पहले लेखक थे. उसके लगभग सौ साल बाद, 1995 के एक ओपिनियन पोल में BBC ने उनकी कविता ‘इफ’ (यदि) को यूके की सबसे प्रिय कविता का ख़िताब दिया. आइए उसी मोटिवेशनल कविता का मेरे द्वारा किए गए हिंदी-भावानुवाद का लुत्फ़ उठाते हैं:

जब सभी लोग बेकाबू होकर तुम्हें दोष दे रहे हों
यदि तब भी तुम अपने दिमाग को बेकाबू होने से बचाए रखते हो
जब सभी तुमपर शक कर रहे हों
यदि तब भी तुम खुद पर भरोसा कर सको
(साथ ही उनकी शिकायतों पर भी ध्यान दे सको)
यदि तुम इंतजार कर सकते हो, और इस दौरान थकते नहीं हो
यदि झूठ का सामना करने पर खुद झूठे नहीं बनते हो
नफरत का सामना करने पर खुद नफरतें नहीं पालने लगते हो
और बावजूद इस सबके तुम न अधिक बनते फिरते हो न अधिक दिखाते फिरते हो

यदि तुम सपने देख सको – मगर उन सपनों की ग़ुलामी न करो
यदि तुम सोच सको – मगर सोच को अपना लक्ष्य न बनाओ
और ‘जीत’ और ‘हार’ का सामना करने पर
यदि तुम दोनों ‘महा-ठगनी मायाओं’ के साथ एक सा बर्ताव करो
यदि तुम उस सच को सुनने का भी सामर्थ्य रखते हो जो तुमने खुद बोला है
– लेकिन उसे अब दुष्टों ने अपने हित में तोड़ मरोड़ दिया है
या देख सकते हो उन चीज़ों को टूटते हुए जिनके लिए तुमने अपना पूरा जीवन समर्पित किया था
और फिर से उन टूट चुकी चीज़ों से अपने लिए एक नई दुनिया बना सको

यदि तुम अपने जीवन की सारी कमाई का एक जगह ढेर लगाकर
उससे जुएं का दांव खेल सकते हो
और सब कुछ हार चुकने पर एक नई शुरुआत कर सकते हो
साथ ही अपनी हार के बारे में भी कुछ नहीं सोचते और बोलते हो
यदि तुम तब भी आगे बढ़ सकते हो
जबकि तुम्हारा हृदय, तुम्हारी धड़कनें, तुम्हारी मांसपेशियां चूक चुकी हों
यदि तुम तब भी डंटे रह सकते हो जबकि तुम्हारे पास और तुम्हारे भीतर कुछ भी शेष न रहा
सिवाय उस जिजीविषा के जो कहती है – ‘लगे रहो!’

यदि भीड़ से बात करने हुए भी तुम अपना मूल स्वभाव नहीं खोते
और राजा के साथ होते हुए भी अपना आम आदमी वाला बर्ताव बनाये रखते हो
यदि तुम्हें न ही तुम्हारा दुश्मन और न ही तुम्हारा दोस्त दुख दे पाए
यदि सब तुमपर विश्वास कर सकें, पर तुम्हारी अंध भक्ति नहीं
यदि तुम हर उस एक मिनट – जो कतई माफ़ी के काबिल नहीं है – को
एक साठ सेकेंड के मूल्य की लंबी दौड़ से भर सकते हो
तो मेरे बच्चे –
तो ये सारी दुनिया और उसकी हर शै तुम्हारी है
और उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण ये कि – तुम एक मनुष्य बन पाओगे!


‘एक कहानी रोज़’ में कहानियां यहां पढ़ें:

याद एक अमरबेल है!

‘तुम किसको दीप जलाकर पथ दिखलाना चाहती हो’

उसकी आवाज गूंजती है, जैसे लोहे की सांकल बजती है, जैसे ईमान बजता है!

‘उसके चेहरे पर पालक की कोमलता, हरी मिर्चों की खुशबू पुती थी’

क्या हुआ जब मुसलमानों ने बकरीद को दीवाली की तरह मनाने का फैसला किया?

‘यही तुम अंग्रेजी की एम.ए. हो?’

एक कहानी रोज़: ‘मुगलों ने सल्तनत बख्श दी’


Video देखें: केदारनाथ सिंह की ‘बनारस’:

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