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'लिंचिंग' के बारे में बात करने के पहले मोहन भागवत को ये सच जान लेना चाहिए था

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मोहन भागवत. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक यानी सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति. हाल में ही विजयादशमी पर RSS का स्थापना दिवस (फाउंडेशन डे) मनाया गया. इसी मौके पर मोहन भागवत ने लिंचिंग को लेकर बयान दिया. बयान ये था:

एक शब्द चला पिछले साल. लिंचिंग. ये क्या हमारे यहां होता था कभी? हुआ है? ये शब्द कहां कहां से आए हैं? इससे सम्बंधित एक पुरानी कहानी, जो बाहर के धर्मग्रन्थ तैयार हुआ , उससे मिलती है. उस धर्म से उसका कोई सम्बन्ध  नहीं. लेकिन वो घटना कि एक महिला को ऐसे ही पत्थरों से मारने के लिए जुट गए गांव के लोग. तो वहां ईसा मसीह पहुंचे और उन्होंने कहा, ये पापी है इसलिए आप इसको पत्थर मार रहे हैं? तो ठीक है, मारो. लेकिन जिसने पाप न किया हो, वो पहला पत्थर उठाए. तो सब लोगों के ध्यान में अपनी गलती आई.

तो ये घटनाएं कहां की हैं? जहां की हैं वहां उसके लिए ये शब्द है. हमारे यहां ऐसा कुछ हुआ नहीं. ये छुटपुट समूहों की घटनाएं हैं, जिन पर कड़ी कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए. ऐसा सब लोग चाहते हैं. हमारे देश की परम्परा उदारता की है. मिलकर रहने की है. भाईचारे से रहने की है. हमारे यहां तो प्राचीन घटना ये मिलती है. कि पानी को लेकर दो गांवों के बीच झगड़ा हुआ, तो तथागत बुद्ध ने जाकर उन दोनों को समझाया. और वो सारे झगड़े समाप्त कर दिए. हमारी परम्परा तो ये है.

मोहन भागवत ने जिस घटना का जिक्र किया अपने भाषण में. वो बाइबल में पढ़ने को मिलती ज़रूर है. गॉस्पेल ऑफ जॉन, वर्सेज 7.53 से 8.11 तक. इसमें बताया गया है कि व्यभिचार यानि एडल्ट्री के आरोप में एक महिला को घसीटते हुए लाया गया था. उसे पत्थरों से मार डालने की बात कही गई. ईसा मसीह ने उसे बचाया था. और उससे ये भी कहा था कि वो उसे माफ़ करते हैं और उसे पाप से बचना चाहिए. हालांकि सबसे पुराने दस्तावेजों में, जो ग्रीक में लिखे गए थे और जहां से बाइबल शुरू हुई, उनमें इसका उल्लेख नहीं मिलता. ऐसा स्कॉलर्स का कहना है. बाइबल भी समय के साथ कई लोगों के योगदान से बना ग्रन्थ है.

मोहन भागवत के इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर लिंचिंग शब्द पर बहस शुरू हो गई है.(तस्वीर: डीडी न्यूज वीडियो स्क्रीनग्रैब)
मोहन भागवत के इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर लिंचिंग शब्द पर बहस शुरू हो गई है.(तस्वीर: डीडी न्यूज वीडियो स्क्रीनग्रैब)

भाषण का ये हिस्सा तो ठीक था. लेकिन जब मोहन भागवत ये कहते हैं, कि हमारे यहां ऐसा कुछ हुआ नहीं. लिंचिंग हमारे यहां नहीं होती थी. तो क्या वो सच कहते हैं?

यूनियन मिनिस्टर राजीव महर्षि ने भी लिंचिंग के बारे में कहा था,

मुझे नहीं लगता कि ये भारत के लिए नया है. आज ये हमारी आत्मा झिंझोड़ देते हैं. आप ते नहीं कह सकते कि लिंचिंग या नफरती अपराध कोई नई चीज़ हैं. मेरा मानना है कि वो बढ़ा-चढ़ाकर रिपोर्ट किए जाते हैं.

पहला सवाल. क्या लिंचिंग शब्द विदेशी है?

जवाब. हां. ये शब्द ज़रूर बाहर से आया है. साल 1780. वर्जीनिया के पिट्सिलवेनिया शहर में घोड़ा चुराने वालों और नक्कालों ने नाक में दम कर दिया था. उनकी प्लैनिंग और चालाकी कानून को धता बता रही थी. अपनी चोरियों को धोखेबाज़ी से वो इतने आश्वस्त हो गए थे कि दिन दहाड़े लूट ले जाते थे. वहां के कुछ नागरिकों ने मिलकर एक समझौता किया. कर्नल विलियम लिंच ने उसका संविधान बनाया. और इसे ‘लिंच लॉ’ का नाम दिया गया. इसमें सजा देने वाले लोग सरकार का हिस्सा नहीं होते थे, प्राइवेट नागरिक होते थे. और उन्हें किसी भी प्रकार की सजा देने का कानूनी हक़ नहीं होता था. फिर भी वो सज़ा देते थे. लिंच करते थे.

इसका एक और वर्जन है. जो काफी लोग जानते हैं. इसमें ये कहा जाता है कि लिंच लॉ शुरू तो वर्जिनिया में ही हुआ. लेकिन इसका नाम पड़ा चार्ल्स लिंच के ऊपर. 1782 में चार्ल्स लिंच ने अमेरिकन रिवल्यूशन (अमेरिका की आजादी के लिए हुई क्रांति) में भाग लिया था. उसमें जो लोग ब्रिटेन के समर्थक थे, उनका दमन करने के लिए कई तरीके इस्तेमाल किए चार्ल्स लिंच ने. एक अनौपचारिक अदालत बनाई गई थी जिसमें तुरत-फुरत ऐसे लोगों के केस निपटा दिए जाते थे. इस अदालत का मुखिया था चार्ल्स लिंच. सज़ा बेहद सख्त होती थी. जैसे कोड़े खाना, जायदाद से हाथ धो बैठना, ज़बरदस्ती वफदारी की कसमें खाना, सेना में जबरन भेज दिया जाना. ये एक्शन कानूनी मान्यता प्राप्त नहीं थे. लेकिन 1782 में वर्जिनिया की जनरल असेम्बली ने चार्ल लिंच की सज़ाओं को मान्यता दे दी. 1811 में कैप्टन विलियम लिंच ने कहा कि हमने तो 1780 में ही ये समझौता बनाया था. लेकिन चार्ल्स लिंच की हरकतें और उसकी अनौपचारिक अदालत द्वारा दी गई सजाएं इतनी मशहूर हो चुकी थीं कि लिंच शब्द को चार्ल्स लिंच से ही जोड़कर देखा गया.

1900 में लिंच किया गया एक अश्वेत व्यक्ति.
1900 में लिंच किया गया एक अश्वेत व्यक्ति. इसे टिकाए रखने के लिए  एक तरफ से डंडा लगाया गया है ताकि इसकी फोटो खींची जा सके. 

भारत में ‘लिंचिंग’ शब्द घर-घर तब पहुंचा जब 28 सितंबर 2015 को अख़लाक़ का मामला सामने आया. दादरी में रहने वाले अख़लाक़ को भीड़ ने मार डाला. क्योंकि उसके ऊपर आरोप लगा था कि उसने अपने पड़ोसी के बछड़े को मार डाला था. उसके मांस को पकाकर खा लिया था. इसके बाद भीड़ ने घर में घुसकर अख़लाक़ और उसके बेटे को घसीट कर बाहर निकाला और पीटना शुरू कर दिया. इसमें अख़लाक़ की मौत हो गई. पहले भी लिंचिंग के मामले हुए थे. ऐसा नहीं था कि पहले ऐसा नहीं हुआ. लेकिन ये मामला आम लोगों से जुड़ा हुआ था. मीडिया ने भी इसे जोर-शोर से उठाया. टीवी से लेकर प्रिंट और डिजिटल मीडिया में भी इस मामले पर डिस्कशन हुआ. उसके बाद से लिंचिंग शब्द आम इस्तेमाल में शामिल हुआ. किसी भी सभ्य समाज के लिए ये सिर पीट लेने वाला क्षण होना चाहिए.

क्या लिंचिंग का कॉन्सेप्ट भी बाहर से आया है? 

इसका जवाब है, नहीं. ये बात यहां समझनी ज़रूरी है कि लिंचिंग का अर्थ सिर्फ किसी दूसरे धर्म या जाति के व्यक्ति को पीटकर मार डालना नहीं होता.  भारत में लिंचिंग सिर्फ धार्मिक मामलों से जुड़ी हुई नहीं है. बच्चा चोरी के आरोप लगाकर लगाकर भी लोगों को मार देने की घटनाएं सामने आई हैं. यूपी में सिर्फ इस साल के जुलाई महीने में बच्चा चोरी के शक में पिटाई की 51 घटनाएं सामने आईं. इन सारी घटनाओं में पीटे गए लोग निर्दोष थे. इनमें फेरी वाले, रिश्तेदार, मानसिक रुप से विक्षिप्त लोग भी शामिल हैं. ये घटनाएं तेजी से बढ़ती ही जा रही हैं. और इन सारी घटनाओं के पीछे है केवल शक. शक कि गली में घूम रहा व्यक्ति बच्चा चोर है. डायन बताकर महिलाओं को मार डालने की खबरें सामने आई हैं. भारत के लिए लिंचिंग की हरकत नई नहीं है. ये शब्द भले ही नया कह दिया जाए.

औरतों को डायन बताकर भीड़ के द्वारा मार दिए जाने का लिखित उदाहरण साल 1792 में ही मिलता है (डब्लू जी आर्चर की संथाली समाज पर लिखी एक किताब में) . जिसका मतलब है कि ये ‘परंपरा’ उससे भी कई साल पुरानी है.

लिंच शब्द आम जनता की साइकि में पिछले चार पांच सालों में पैठा है. उससे पहले कई लोगों ने इस शब्द के बारे में नहीं सुना था. ये सच है. लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि लिंचिंग की घटनाएं तब घट नहीं रही थीं.
लिंच शब्द आम जनता की साइकी में पिछले चार-पांच सालों में पैठा है. उससे पहले कई लोगों ने इस शब्द के बारे में नहीं सुना था. ये सच है. लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि लिंचिंग की घटनाएं तब घट नहीं रही थीं. ये तस्वीर झारखंड के दुमका की है जहां लिंचिंग का मामला सामने आया था. (तस्वीर: पीटीआई)

असदुद्दीन ओवैसी ने मोहन भागवत के बयान के जवाब में ट्वीट किया है.

(लिंचिंग के) विक्टिम भारतीय थे. अपराधियों को माला किसने पहनाई? किसने उन्हें तिरंगे में लपेटा? हमारे पास एक गोडसे –प्रेमी बीजेपी एमपी है. भारत के लिए ऐसी विचारधारा से बड़ी डिफेमेशन (मानहानि) की बात कोई नहीं हो सकती जिसने गांधी और तबरेज़ को मारा. भागवत ये नहीं कह रहे कि लिंचिंग रोकनी चाहिए, वो ये कह रहे हैं कि इसे लिंचिंग मत कहो.

उपिंदर सिंह यूनिवर्सिटी ऑफ दिल्ली में हिस्ट्री की प्रफेसर हैं. इनकी किताबें भी आ चुकी हैं. अपनी किताब पॉलिटिकल वायलेंस इन एन्शियंट इंडिया (Political Violence in Ancient India) में वो लिखती हैं,

शान्ति प्रेमी, अहिंसक भारत का विचार एक चुनकर बनाई गई, परिश्रम के साथ उगाई हुई आत्मछवि के हिस्से के तौर पर अस्तित्व में लाया गया है. एक ऐसे समाज के बीच, जोकि सामाजिक और राजनैतिक हिंसा से अटा पड़ा है. ये पुरातन भारत में अहिंसा के तीन सबसे बड़े विचारकों की याद के साथ आगे बढ़ता है- महावीर, बुद्ध, और अशोक. लेकिन तीव्र सामाजिक और राजनैतिक टकराव और हिंसा की उन प्रासंगिकताओं को नज़रअंदाज़ करना, जिनमें ये विचारक उपजे और जिनसे अक्सर ही उनका आदान-प्रदान होता रहा, उन्हें एक स्टीरियोटाइप बना देता है. जिनका इस्तेमाल समय समय पर राजनैतिक लाभ और आत्मप्रशंसा के लिए किया जाता है.

आंकड़े झूठ नहीं बोलते

द क्विंट के अनुसार 2015 से लेकर अभी तक 111 लोगों की लिंचिंग की रिपोर्ट की गई. इसमें गोरक्षकों द्वारा की गई हिंसा, धर्म के नाम पर की गई हिंसा, और बच्चा चोरी के नाम पर मार दिए गए लोगों के नाम शामिल हैं. इंडियास्पेंड में छपी रिपोर्ट के अनुसार 2010 से लेकर 2017 तक 25 लोगों की हत्या हुई, बीफ और गोकशी के नाम पर हुए 60 मामलों में. इन 25 लोगों में से 21 मुस्लिम थे. 139 लोग घायल हुए इन सभी केसेज में.  इनमें से 97 फीसद हमले 2014 के बाद हुए, और 60 में से 30 मामले ऐसे राज्यों से रिपोर्ट हुए जिनमें बीजेपी का शासन था. यही नहीं, जनवरी 2017 से लेकर जुलाई 2018 तक बच्चाचोरी के शक में 33 लोगों की हत्या की गई, और 99 लोग घायल हुए. इन सभी मामलों में अफवाह की बिनाह पर ही हमले किए गए.

इसलिए ऐसे मामलों को इक्कादुक्का लोगों या छोटे समूहों द्वारा की गई हरकतें कहकर परे करना एक बहुत बड़े मुद्दे को हल्के में उड़ाने की कोशिश ही कही जा सकती है.


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