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कश्मीर में ईसा मसीह की कब्र, जिसकी देखभाल सुन्नी करते हैं!

कश्मीर में श्रीनगर के डाउनटाउन इलाके में एक इमारत है. रोज़ाबल नाम की. इस जगह के इतिहास में ऐसे लोगों की भी दिलचस्पी है, जो कश्मीर के भूगोल में कोई इंट्रेस्ट नहीं रखते. दावा किया जाता है कि ये रोज़ाबल श्राइन, ईसामसीह की कब्र है. वैसे रौज़ा का अर्थ होता है कब्र और बल का मतलब जगह होता है.


रोज़ाबल की कहानी में कई रोचक पेंच हैं. उनकी बात करने से पहले ये बता दें. ईसा मसीह के जीवन से जुड़ी तीन ऐसी घटनाए हैं जिनपर कई कॉन्सपिरेसी थ्योरीज़ हैं.

ईसा मसीह की 13 से 30 साल की उम्र के बीच की कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है. कई लोग दावा करते हैं कि इस बीच वे हिंदुस्तान आए और बुद्ध के प्रभाव में रहे. ईसा की शिक्षाओं में कई जगहों पर बुद्ध की बातों के साथ समानताओं को इसका आधार बनाया जाता है.

दूसरी थ्योरी उनके मैरी मेग्डैलिन से विवाह, उनकी एक संतान होने और उसकी रक्षा ‘प्रायरी ऑफ ज़ायान’ नाम के संगठन के द्वारा किए जाने की है. इस पर प्रसिद्ध लेखक डैन ब्राउन किताब लिख चुके हैं. द विंची कोड नाम की इस किताब पर इसी नाम से फिल्म बनी है. इसके बाद से ये थ्योरी काफी चर्चित हुई है.

तीसरी कहानी ईसा को सूली पर चढ़ाए जाने को लेकर है. ईसाई मान्यताओं के मुताबिक ईस्टर के दिन ईसा का पुनर्जन्म हुआ था. यहां तक तो कोई समस्या नहीं है. मगर ट्विस्ट इसके बाद आता है. ईसाई मानते हैं इसके बाद वो स्वर्ग चले गए और संशयवादी मानते हैं कि वो एशिया में जाकर गुमनाम ज़िंदगी बिताने लगे. इस धारणा के पीछे का तर्क है कि भारत में ईसाइयत लगभग 2,000 सालों से है. मतलब ईसा को सूली पर लटकाए जाने के तुरंत बाद से.

अब बात रोज़ाबल की. स्थानीय निवासी कहते हैं कि ये युज़ असफ की कब्र है. युज़ असफ, अहमदिया मुस्लिमों का ईसा को दिया गया नाम है. इन धारणाओं के कारण अहमदिया मुस्लिम, बाकी मुसलमानों के निशाने पर रहा है.

वैसे रोज़ाबल की इमारत में शियाओं के 8वें इमाम मूसा रज़ा के वंशज, संत मीर सैय्यद नसीरुद्दीन की भी मज़ार है और इसकी देखभाल सुन्नियों का एक बोर्ड करता है. इस इमारत में एक पत्थर भी है. इस पत्थर पर दो बीच से छेदे गए पैरों की छाप है. इसके अलावा कब्र इस्लामिक नहीं यहूदी कायदों से बनी है.

रोज़ाबल के अंदर
रोज़ाबल के अंदर

रोज़ाबल श्राइन की एक और विचित्र बात ये है कि इसका कोई भी ज़िक्र कश्मीरी बौद्ध इतिहास में नहीं मिलता है. इतिहास में पहली बार इसकी चर्चा 1747 में हुई. जब श्रीनगर के सूफी लेखक ख्वाजा मोहम्मद आज़म ने अपनी किताब ‘तारीख आज़मी’ में लिखा कि ये मज़ार एक प्राचीन विदेशी पैगम्बर और राजकुमार युज़ असफ की है.

छेद वाले पैरों की छाप
छेद वाले पैरों की छाप

इसके बाद 1770 में इसके बारे में एक मुकदमे का फैसला सुनाते हुए मुल्ला फाजिल ने कहा.

सबूतों को देखने के बाद, ये नतीजा निकलता है कि राजा गोपदत्त, जिसने सोलोमन का सिंघासन बनवाया, के समय युज़ असफ घाटी में आए थे. मर कर ज़िंदा होने वाले उस महान शहजादे ने दुनियावी चीज़ों को छोड़ दिया था. वो अपना पूरा ध्यान सिर्फ इबादत में लगाता था. कश्मीर के लोग, जो हज़रत नूह के बाद बुतपरस्त बन गए थे. उन्हें उसने ऊपर वाले की इबादत करने के लिए कहा. वो एक ही ऊपर वाला होने की बात कहते रहते थे. बाद में इस मज़ार में सैय्यद नसीरुद्दीन को भी दफनाया गया.

इस आदेश के अनुवाद के समय इसमें बुद्ध का भी ज़िक्र आ गया. बाद में कहा गया कि ये संस्कृत और फारसी के बीच पैदा हुए भ्रम के कारण हुआ था.

कहा जाता है कि1965 की जंग के दौरान इसको नष्ट करने की भी कोशिश हुई, मगर इस बात का कोई ठोस प्रमाण नहीं है.
लेखक अश्विन सांघी इस पर ‘रोज़ाबल लाइन’ के नाम से उपन्यास लिख चुके हैं. वहीं BBC चैनल 4 ने ‘हिडन स्टोरी ऑफ जीसस’ के नाम से एक डॉक्युमेंट्री भी बनाई. इसमें रोज़ाबल के अंदर की फुटेज भी दिखाई गई. डॉक्युमेंट्री में जहां युज़ असफ के ईसा होने की संभावना को खुला रखा गया, वहीं BBC के कुछ लोगों ने कहा इस कहानी में स्थानीय व्यापारी मसाला मिलाकर परोस रहे हैं ताकि विदेशी वहां घूमने आएं.

इन सबमें सच कितना है और कितना कल्पना की मिलावट है पता नहीं मगर ये इतिहास की अभी तक एक न सुलझने वाली रोचक पहेली ज़रूर है.


विडियो- किताबवाला: कश्मीर में छह सौ साल पहले संस्कृत में लिखा गया हजरत मुहम्मद पर सच

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