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गोलमाल फिल्म का वो एक्टर, जो नक्सल समर्थक था!

हमारे देश में सिनेमा के कलाकारों पर एक तोहमत मढ़ी जाती है कि वो सिर्फ अपने ही काम से काम रखते हैं. देश के मुद्दों पर नहीं बोलते. पर ऐसा है नहीं. कुछ थे, जिनको देश के मुद्दों से उतना ही प्यार था, जितना कि किसी क्रांतिकारी को होता है. शायद हम ही वैसे लोगों को उनकी जगह देना भूल गए हैं. आज ही के दिन एक ऐसे एक्टर की मौत हुई थी, जिसने अपनी कला में देश की पॉलिटिक्स को घोल दिया था. उत्पल दत्त. पुरानी वाली गोलमाल के भवानी शंकर. जिन्हें बिना मूंछ के नौजवान बकलोल लगते थे. बंगाली फिल्मों के महान एक्टर. मार्क्सवादी क्रांतिकारी. जो आज़ाद भारत में दो बार जेल में बंद रहे.

उत्पल दत्त. एक्टर, डायरेक्टर, प्लेराइटर, पॉलिटिकल एक्टिविस्ट. जन्म:29 मार्च, 1929 मौत: 19 अगस्त, 1993

कभी लेफ्ट की राजनीति करते, कभी बम्बई जाकर गोलमाल बना डालते

लगभग 40 सालों तक उत्पल दत्त राजनीति, इतिहास और हर दौर के साथ बदलते समाज को अपने ड्रामों में पिरो-पिरोकर हिंदुस्तान को झकझोरते रहे. जब इससे पेट नहीं भरा, तो नक्सलबाड़ी आन्दोलन में भिड़ गए. एक तरफ दिमाग में बौखलाहट पैदा करने वाले नाटक होते रहे और फ़िल्में आती रहीं. दूसरी तरफ नक्सलाइट आन्दोलन की राजनीति. एक वक़्त था कि बंगाल में कोई भी मार्क्सिस्ट कैंपेन उत्पल दत्त के नाटकों के बिना अधूरा था. लेफ्ट विचारधारा वाले थिएटर एसोसिएशन IPTA के फाउंडर मेम्बर थे उत्पल दत्त.

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उत्पल दत्त और अमोल पालेकर

पर ये उनके जीवन का एक पक्ष था. दूसरे पक्ष में पैसों की जरूरत के लिए सीधा बम्बई जाकर विलेन बनने लगे. शानदार पर्सनालिटी और जानदार आवाज. ये चलता रहा. फिर तिरछा खेला. गोलमाल में कॉमेडी. उसके लिए फिल्मफेयर जीत लिए. सत्यजित रे और मृणाल सेन ने उनको अपनी फिल्मों में रखा. इन दोनों लोगों के चुने एक्टर की काबिलियत के बारे में भला कोई क्या कहेगा!

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बाएं से दूसरे उत्पल दत्त, दायें से दूसरे सत्यजित रे

पॉलिटिक्स और सरकार को लपेटा, जेल जाना पड़ा

आज़ादी के पहले से ही उत्पल दत्त थिएटर से जुड़े रहे. शशि कपूर के ससुर जैफ्री केंडल के साथ थिएटर करते रहे. बाद में लगा कि ये लोग भारत के शोषित समाज को रिप्रेजेंट नहीं कर रहे हैं. तो छोड़ दिया. अपनी थिएटर कंपनी खोल लिए. तय किया कि पॉलिटिक्स और सरकार को लपेटेंगे. देश अभी आजाद हुआ है. करना पड़ेगा.

उत्पल दत्त के नाटक जनता को बड़े पसंद आते थे. पर ऐसा क्यों होता कि ऐसी चीजें सरकार को पसंद नहीं आतीं? 1959 में उत्पल दत्त का एक नाटक आया. अंगार. इसमें कोयला मजदूरों की व्यथा और शोषण दिखाया गया था. वही जो गैंग्स ऑफ़ वासेपुर में सरदार खान के बाप के साथ होता है. 1963 में आया नाटक कल्लोल. इसमें अरब सागर में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ हिन्दुस्तानी सैनिकों के विद्रोह को दिखाया गया था. पर ये भी दिखाया गया कि कैसे कांग्रेस इन सैनिकों से नाखुश थी. 1962-65 में हिंदुस्तान चीन और पाकिस्तान से जंग लड़ रहा था. तत्कालीन कांग्रेस सरकार को उत्पल दत्त की देशभक्ति पर शक हुआ. और उनको बिना किसी ट्रायल के जेल में डाल दिया गया, Preventive Detention Act के तहत. तत्कालीन वजह थी एक आर्टिकल ‘Another side of the struggle’ जो ‘देशहितैषी’ में छपा था.

उनकी बेटी विष्णुप्रिया दत्त एक इंटरव्यू में बताती हैं कि पापा को जेल से बहुत दिक्कत नहीं थी. थोड़े दिन लगे एडजस्ट करने में. फिर वहां भी लिखना-पढ़ना और थिएटर शुरू कर दिया था. साथ के कैदियों को लेकर क्रिकेट भी खेलने लगते. कहती हैं कि उत्पल दत्त की सबसे ख़ास बात थी कि वो किसी भी क्षण में कोई खतरनाक सा जोक मार देते थे. कभी टेंशन नहीं लेते थे. जहां घूमने जाते, वहां के इतिहास के बारे में गाइड से ज्यादा पता रहता था. गांधी की पॉलिसी से ज्यादा इत्तेफाक नहीं रखते थे. जब फिल्म ‘गांधी’ लगी थी, तो इसके पोस्टर फाड़ दिए. जब IPTA से उनको बाहर किया गया, तब वो जोक मार रहे थे.

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बीच में उत्पल दत्त और हाथ जोड़े हंसते सत्यजित रे

मरने तक राजनीति की नब्ज पहचानते रहे, दिखा फिल्मों में

1966 में सात महीने बाद जेल से छूटे. लोगों को लगा कि अब सुधर जायेंगे. पर जो मान जाये, वो उत्पल दत्त कैसे हो सकता है? और बंगाल में उसी वक़्त तो लहर चल रही थी नक्सलवाद की. इसी लहर में फिर जेल गए. 1969 में जब उत्पल दत्त फिल्म The Guru की शूटिंग कर रहे थे, तब उनको सरकार ने गिरफ्तार कर लिया. फिर बाहर आये. फिर देश में इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगा दी. तो उत्पल दत्त ने तीन नाटक निकाले: Barricade,City of Nightmares, Enter the King. इंदिरा गांधी ने तीनों को बैन कर दिया. पर जहां भी चल पाया, लोगों ने पसंद किया. बाद में 1988-90 के आस-पास उत्पल दत्त ने देश की ‘राजनीति में घुसे धर्म’ और कम्युनिज्म के गिरते असर पर फ़िल्में बनाईं: Opiate of the People और The Red Goddess of Destruction.

100 से ऊपर फ़िल्में की थीं. ऋषिकेश मुखर्जी की फ़िल्में गोलमाल, नरम गरम और रंग बिरंगी तीनों के लिए कॉमेडी का फिल्मफेयर मिला. तीनों में अमोल पालेकर भी थे. फिर भुवन शोम के लिए नेशनल अवॉर्ड. बंगाली फिल्मों के लिए तो बहुत कुछ. अगर वैसी बंगाली फ़िल्में बॉलीवुड में बनी होतीं, तो हिंदी सिनेमा में कुछ और हीरे रहते.

उत्पल दत्त ने वो जिंदगी जी जिसपे फ़िल्में बन सकती हैं. एक बिंदास हंसोड़ आदमी, शानदार कलाकार, बॉलीवुड और बंगाली फ़िल्में दोनों जगह. राजनीति. वो भी नक्सलाइट. इंदिरा गांधी. इमरजेंसी. और क्या चाहिए?


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