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वो गायक जिसने सिगरेट पीकर संगीतकार नौशाद के मुंह पर धुआं छोड़ दिया था

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एक म्यूजिक क्रिटिक का कहना था,

“बहुत से लोग हैं जो मुहम्मद रफ़ी, मुकेश या किशोर कुमार जैसा गा सकते हैं, लेकिन ऐसा कोई बेहद मुश्किल से ही मिलेगा जो अपनी आवाज़ में तलत महमूद जैसी मधुरता और नज़ाकत पैदा कर सके.”

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में अपनी गायकी और ख़ास तौर से ग़ज़ल गायकी से एक आला मुकाम पाने वाले गायक तलत महमूद उन गायकों में से हैं जो रफ़ी, किशोर और मुकेश जैसे लिजेंडरी गायकों की तिकड़ी के साए में पनपने की कोशिश करते रहे. औनी-पौनी सफलता भी हासिल हुई उन्हें. ये वो दौर था जब मन्ना डे और तलत महमूद जैसे गायकों को हमेशा साइडलाइन किया गया. इसके बावजूद आज उनको याद करनेवालों की और उनके काम का सम्मान करने वालों की अच्छी-खासी संख्या है.

तलत महमूद. सोर्स: alchetron.com
तलत महमूद.   सोर्स: alchetron.com

छोटा सा इंट्रो:

तलत महमूद की पैदाइश शहर-ए-अदब लखनऊ में हुई. 24 फ़रवरी 1924 को. बेहद कम उम्र से ही उन्हें गाने का चस्का लग गया था. एक रुढ़िवादी मुस्लिम परिवार में जन्म लेने की वजह से गाना-बजाना वगैरह बुरा समझा जाता था. इसलिए घर से कोई प्रोत्साहन मिलने का सवाल ही नहीं था. एक वक़्त तो ऐसा भी आया, जब उन्हें फिल्मों में काम और परिवार में से एक चीज़ चुननी थी. ज़िद्दी तलत महमूद ने पहली चीज़ चुनी. जिसकी वजह से अगले दस सालों तक परिवार उनसे न्यारे-न्यारे ही रहा. जब उनका नाम मशहूर होने लगा, तब जा के परिवार ने उनको अपना लिया.

महज़ 15 साल की उम्र में उनके सिंगिंग करियर ने रफ़्तार पकड़ ली थी. ऑल इंडिया रेडियो के लखनऊ स्टेशन पर वो मीर तकी मीर, दाग़ देहलवी, जिगर मुरादाबादी की ग़ज़लें गाया करते थे. बहुत जल्द वो म्यूजिक कंपनी एचएमवी की निगाह में चढ़ गए. उन्होंने तलत को लेकर 1941 में एक गैर-फ़िल्मी एल्बम रिलीज़ किया, “सब दिन एक समान नहीं था’. एल्बम इंस्टेंट हिट रहा. महज़ 6 रुपए मिले थे तलत को अपनी पहली रिकॉर्डिंग के.

तलत का अगला पड़ाव था कलकत्ता. वहां उन्होंने ढेर सारी बंगाली फिल्मों के लिए गाने गाए. तपन कुमार के नाम से. अच्छे दिखते भी थे सो तीन बंगाली फिल्मों में एक्टिंग भी की. तीनों ही फ़िल्में चली भी. उसके बाद उन्होंने बॉम्बे का रुख किया.

हिंदी संगीत जगत में आगाज़

उनका पहला हिट सॉन्ग था ‘तस्वीर तेरा दिल मेरा बहला न सकेगी’. ये भी एक नॉन-फ़िल्मी गीत था जो फैयाज़ हाशमी ने लिखा था. ये ग़ज़ल इतनी मकबूल हुई कि भारत भर में उनका नाम पहचाना जाने लगा. हालांकि में सर्वाइवल इतना आसान मसला नहीं था. अपने आवाज़ में पाए जाने वाले ‘कंपन’ की वजह से उन्हें बार-बार रिजेक्ट किया जाता रहा. ये अलग बात है कि यही कंपन, यही लरजिश आगे चल कर उनकी गायकी की यूएसपी बनी.

उनकी भटकन तब ख़त्म हुई जब अनिल बिस्वास जैसे संगीतकार की नज़र उन पर पड़ी. जिस ‘लरजिश’ की वजह से वो ठुकराए जा रहे थे, उसी ने अनिल बिस्वास को मंत्रमुग्ध कर दिया. उस वक़्त अनिल बिस्वास दिलीप कुमार की फिल्म ‘आरज़ू’ में म्यूजिक देने का काम ख़त्म कर चुके थे. लेकिन वो तलत महमूद की आवाज़ से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने डायरेक्टर को एक और गाना ऐड करने के लिए मना लिया. मजरूह सुलतानपुरी से एक गाना लिखवाया गाया और उसे तलत से गवाया गया. दिलीप कुमार पर फिल्माया ये गीत तुरंत लोगों की ज़ुबान पर चढ़ गया. इसके बाद तलत ने अपने करियर में दिलीप साहब के लिए कई गाने गाए.

अनसुने से किस्से

1964 में एक फिल्म आई थी, ‘जहांआरा’. इस फिल्म के समय एक अजीब सूरतेहाल पैदा हो गई थी.  संगीतकार मदन मोहन इसके गाने तलत महमूद से गवाना चाहते थे. प्रोड्यूसर चाहता था कि रफ़ी का इस्तेमाल हो. मदन मोहन ज़िद पर अड़े थे. जब मामला बनता नहीं नज़र आया तो मदन मोहन ने अपने पल्ले से पैसे खर्च किए, लेकिन ये गाने तलत महमूद से ही गवाए. रफ़ी साहब इस बात से बेहद नाखुश रहे. तलत के गाए इस फिल्म के सभी गाने सुपरहिट रहे. चाहे ‘फिर वही शाम’ हो, ‘तेरी आंख के आंसू पी जाऊं’ हो या  ‘मैं तेरी नज़र का सुरूर हूं’.

एक और घटना याद आती है. संगीतकार नौशाद अपने सिंगर्स के रिकॉर्डिंग से पहले सिगरेट पीने के सख्त खिलाफ़ थे. तलत महमूद को सिगरेट की आदत थी. ‘बाबुल’ फिल्म के गाने ‘मेरा जीवनसाथी’ की रिकॉर्डिंग के ऐन पहले तलत महमूद ने नौशाद को चिढ़ाने के मकसद से जानबूझकर उनके सामने सिगरेट पी. धुआं उनके मुंह पर छोड़ा. नौशाद ने फिर कभी उनके साथ काम नहीं किया.

अपने एक्टिंग करियर से शर्मिंदा थे तलत

गायकी के अलावा उन्होंने करीब 15 हिंदी फिल्मों में एक्टिंग भी की. वो भी नूतन, माला सिन्हा, सुरैया जैसी बड़ी हीरोइंस के साथ. जब उन्हें लगा कि बात बन नहीं रही, तो उन्होंने एक्टिंग छोड़ दी. बरसों बाद, 1985 में एक इंटरव्यू में जब उनसे उनके एक्टिंग करियर के बारे में पूछा गया तो उनका जवाब था,

“जनाब, क्या आप उस ग़लती को भूल नहीं सकते? हम भी खतावार हैं. कौन है जिसकी ख्वाहिश नहीं है कि वो भी दिलीप कुमार बने?”

तलत महमूद गाने में हमेशा अच्छे शब्दों को लेकर आग्रही रहे. सस्ते बोलों से उन्हें बेहद चिढ़ थी. गीतकारों को हमेशा ये आशंका रहती थी कि क्या उनका लिखा गाना तलत की पसंद पर खरा उतरेगा?

ग़ज़ल गायकी में उंचा मुकाम

हिंदी फिल्मों में शामिल ग़ज़लों पर जब भी कभी अलग से तबसरा होगा तलत का नाम सबसे पहले लिया जाएगा. ग़ज़ल गायकी में बेहद नाम कमा चुके जगजीत सिंह और पंकज उधास जैसे गायक उन्हें अपना आदर्श मानते आए हैं. यहां तक कि पाकिस्तानी सिंगर सज्जाद अली भी उन्हें गुरु मानते हैं. तलत महमूद के साथ एक और इंटरेस्टिंग फैक्ट भी जुड़ा है. वो पहले भारतीय सिंगर हैं जिनका विदेश में कॉन्सर्ट हुआ. 1956 में ईस्ट अफ्रीका दौरे से शुरू हुआ ये सिलसिला अमेरिका, ब्रिटेन, वेस्टइंडीज जैसे मुल्कों तक फैला. तलत 1991 तक कॉन्सर्ट में गाते रहे. उन्होंने अपने जीवनकाल में 800 के करीब गाने गाए. जिनमें से कई सारे आज भी उतनी ही तन्मयता से सुने जाते हैं, जितना उनका क्रेज़ उनके रिलीज के वक़्त था.

हिट गाने

‘जाएं तो जाएं कहां’

फिल्म ‘टैक्सी ड्राईवर’ का ये गाना तो जैसे उनकी पहचान बन कर रह गया है. सचिन देव बर्मन के संगीत से सजा ये गीत साहिर लुधियानवी की कलम का करिश्मा था. आज भी ये गीत ‘सादगी में पिरोए गए दर्द का रुहानी झरना’ लगता है.

‘दिल ए नादां तुझे हुआ क्या है!’

ग़ालिब की इस ग़ज़ल को न जाने कितने फ़नकारों ने अपनी आवाज़ बख्शी है. लेकिन तलत की आवाज़ में इसे सुनने का अपना ही मज़ा है.

‘हमसे आया न गया’

1957 की फिल्म ‘देख कबीरा रोया’ का ये गीत प्रेम के शिकायती लहज़े बेहतरीन मुज़ाहिरा है. राजेंद्र कृष्ण के बोल और मदन मोहन का संगीत. बेहतरीन शब्दों के साथ तलत पूरा न्याय करते हैं.

‘जलते हैं जिसके लिए’

‘सुजाता’ फिल्म का ये गीत सॉफ्ट रोमांटिक गीतों की श्रृंखला में एक महत्वपूर्ण गीत है. तलत की गायकी की नज़ाकत हर्फ़-हर्फ़ से उजागर होती है.

‘इतना न तू मुझसे प्यार बढ़ा’

तलत महमूद ने सिर्फ सॉफ्ट रोमांटिक नंबर्स ही नहीं गाए बल्कि कुछेक हल्के-फुल्के गीतों को भी अपनी आवाज़ दी. जो बेइंतेहा पसंद किए गए. 1961 में आई फिल्म ‘छाया’ का ये गीत इसका बेहद उम्दा उदाहरण है.

‘ऐ मेरे दिल कहीं और चल’

ज़िंदगी से, दुनिया से निराश होने का लम्हा हर किसी की लाइफ में एक न एक बार ज़रूर आता है. ऐसे में उसकी दिली ख्वाहिश होती है कि वो सबकुछ छोड़छाड़ कर भाग खड़ा हो. इसी ख्वाहिश को ज़ुबां देता ये गीत 1952 की फिल्म ‘दाग़’ से है. निराशा के भंवर में गोते लगाते लोगों का जैसे एंथम है.

तलत महमूद भारतीय संगीत की दुनिया की ऐसी उपलब्धि है, जिसपर हिंदी सिनेमा को हमेशा नाज़ रहेगा.


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