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सईद जाफरी: जो कहते थे, "मैं अपनी बीवी का गुनाहगार हूं, मैं खुदगर्ज़ था"

सपने प्राइस टैग के साथ आते हैं. ढेर सारा स्ट्रगल, बेशुमार वक़्त की इनवेस्टमेंट, कदम-कदम कुर्बानियां, ये सब हिस्सा हैं कामयाबी की उस जद्दोजहद का, जिससे गुज़र कर आप अपने सपनों की मंजिल तक पहुंचते हैं. कई बार कीमत इससे बड़ी होती है. कई बार आप अपनी आत्मा से समझौता कर जाते हैं. कई बार आप किसी का हक़ छीन लेते हैं. महज़ इसलिए कि आपका सिर्फ खुद के सपनों पर ध्यान है और उसके आगे किसी व्यक्ति की कोई अहमियत नहीं दिखती आपको.

आप अपनी ज़ात में इतने व्यस्त होते हैं कि खुद के अलावा और किसी के बारे में सोच ही नहीं पाते. आप सफल हो जाते हैं, फिर किसी सुहानी शाम पलट कर देखते हैं तो पाते हैं कि आपका सफ़र बेदाग़ नहीं है. अपनी जर्नी में गुनाह भी हुए हैं आपसे. आप सेल्फिश थे, खुदपसंद थे. ऐसे वक़्त आपको जो फीलिंग आती है उसे दुनिया के साथ शेयर करना हर किसी के बस की बात नहीं. जहांवालों के आगे मौजूद अपनी नायक की छवि को ध्वस्त करने का साहस सबमें नहीं होता. आप उस भावना को दबा देते हैं और बेशर्मी से जिए चले जाते हैं. महज़ कुछ लोग ही होते हैं जो अपनी कमियों को, ज्यादतियों को, बेहिसी को क़बूलने का हौसला रखते हैं.

सईद जाफरी उन हौसलामंद लोगों में से एक हैं. अपनी बीवी महरुनिमा के साथ उनके हाथों हुई नाइंसाफी को उन्होंने फराख़दिली से क़बूला.

शुरुआती दिन

सईद जाफरी 8 जनवरी 1929 को पंजाब के मलेरकोटला में पैदा हुए. प्राथमिक शिक्षा उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के मिन्टो सर्कल स्कूल से की. एएमयू का उनकी उर्दू भाषा पर पकड़ बनाने में बहुत बड़ा हाथ रहा. जब वो दस साल के थे तब उन्होंने स्कूल के एक प्ले में दारा शिकोह का किरदार किया. एक्टिंग का कीड़ा उन्हें तभी काट गया था. 12 साल की उम्र में उन्हें मसूरी के विनबर्ग एलन स्कूल में दाखिल करवा दिया गया. इसी स्कूल से उन्होंने ब्रिटिश-एक्सेंट वाली अंग्रेजी में महारत हासिल की. इस स्कूल के एनुअल प्लेज में उन्होंने लगातार एक्टिंग की और अपने हुनर को निखारते रहे. उसके बाद उन्होंने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से अपना ग्रेजुएशन पूरा किया.

आज़ादी के बाद जाफरी दिल्ली इस उम्मीद में आए कि कार्टूनिस्ट, लेखक या रेडियो ब्रॉडकास्टर में से कुछ तो बन ही जाएंगे. ऑल इंडिया रेडियो में अनाउंसर का ऑडिशन भी कामयाब रहा उनका. इंग्लिश अनाउंसर के तौर पर उन्होंने अपना करियर शुरू किया. उस वक़्त उनकी सैलरी बेहद कम थी और वो दिल्ली जैसी जगह में एक कमरा तक अफोर्ड नहीं कर पाते थे. कई रातें उन्होंने ऑफिस के पीछे बेंच पर गुज़ारीं. कुछ महीनों बाद उन्होंने फ्रैंक ठाकुरदास और बेंजी बेनेगल के साथ मिलकर यूनिटी थिएटर की नींव रखी. इसी थिएटर में उनकी मुलाक़ात मधुर बहादुर से हुई, जो आगे चलके उनकी वाइफ और फिर एक्स वाइफ बनीं.

किरदार को जीते जाफरी

सईद जाफरी के एक्टिंग टैलेंट से मेरा पहली बार साबका पड़ा था सत्यजित रे की एकमात्र हिंदी फिल्म ‘शतरंज के खिलाड़ी’ में. अपने पुरखों की बहादुरी के किस्से सुना-सुना कर खुद बहादुर होने का पाखंड करते मीर साहब भुलाये नहीं भूलते. संजीव कुमार जैसे एक्टर के साथ एक ही फ्रेम में रहते हुए, खुद को नोटिस करवाना एक उपलब्धि ही है.

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मीर रोशन अली का वो किरदार सईद साहब के लिए जैसे टेलर-मेड था. अपने शानदार उर्दू तलफ़्फ़ुज़ से उन्होंने संवाद अदायगी को एक नया स्तर बख्शा था. अपनी बीवी पर हद से ज़्यादा भरोसा करते मीर साहब को देख कर गुस्सा और तरस दोनों आता था. इस किरदार के लिए उन्हें बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का फिल्मफेयर अवॉर्ड भी मिला.

रिचर्ड एटनबरो की फिल्म गांधी में सरदार पटेल के किरदार में वो बहुत जमे. दूरदर्शन पर ये फिल्म देखी थी. कई दिनों तक जब इतिहास में गांधी, नेहरु, पटेल पढ़ते थे तो बेन किंग्सले, रोशन सेठ और सईद जाफरी की शक्ल आखों के आगे घूमती थी. ‘हीना’, ‘दिल’, ‘चश्मे-बद्दूर’, ‘मासूम’ जैसी फिल्मों में उनके किरदारों को हमेशा याद किया जाएगा.

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थिएटर और हॉलीवुड में महत्वपूर्ण योगदान

थिएटर की दुनिया में वो बेहद सम्मानित नाम थे. उन्होंने टेनिसी, इलियट, ऑस्कर वाइल्ड और शेक्सपियर की कृतियों में काम किया. वो पहले एशियाई अभिनेता थे जो शेक्सपियर के नाटकों का मंचन करने अमेरिका के टूर पर गए थे. सईद जाफरी ने हॉलीवुड की कई फिल्मों में भी काम किया. जिनमे ‘दी विल्बी कांस्पीरेसी’, ‘दी मैन हू वुड बी किंग’, ‘स्फिंक्स’, ‘अ पैसेज टू इंडिया’ जैसी फ़िल्में प्रमुख रही.

सीन कॉनेरी, माइकल कैन और पिअर्स ब्रॉसनन जैसे हॉलीवुड दिग्गजों के साथ उन्होंने काम किया. बीबीसी के कार्यक्रम ‘वर्ल्ड सर्विस सीरीज’ में विक्रम सेठ के उपन्यास ‘अ सुटेबल बॉय’ के सभी 86 किरदारों को अकेले आवाज़ देकर सईद जाफरी ने एक कीर्तिमान बनाया था. 15 नवंबर 2015 को उनकी अपने लन्दन वाले घर में ब्रेन-हैमरेज से मौत हो गई.

सईद की डायरी का वो पन्ना जो सियाह है

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मधुर जाफरी उर्फ़ महरुनिमा

उनकी ज़िंदगी का सबसे उजला पहलू तब दिखा, जब उन्होंने अपने जीवन के काले पहलू पर से खुद ही पर्दा उठाया. दुनिया को अपनी उन कोताहियों, नादानियों से आगाह किया जिनके बारे में उनके बताये बिना कोई नहीं जान पाता. अपनी एक डायरी-एंट्री में उन्होंने अपनी पत्नी महरुनिमा उर्फ़ मधुर जाफरी के साथ उनके हाथों हुई ज़्यादतियों के बारे में खुल के लिखा. उन्होंने कबूला कि कैसे वो अपनी पहली बीवी महरुनिमा के केयरिंग, होमली होने से वो नाखुश थे.

सईद को ब्रिटिश कल्चर बेहद पसंद था. उन्होंने महरुनिमा को उस सांचे में ढालने की कोशिश की, जिसमें उन्हें नाकामी ही हाथ लगी. उसी वक़्त वो अपनी एक को-एक्टर के साथ इन्वॉल्व हो गए. दस साल तक शादी को खींचने के बाद उन्होंने महरुनिमा को तलाक़ दे दिया. और फिर बरसों तक पलट कर नहीं देखा. जेनिफ़र से शादी कर के वो अपनी लाइफ में मस्त हो गए. 

जेनिफर और सईद जाफरी
जेनिफर और सईद जाफरी

कई सालों बाद एक दिन उन्हें महरुनिमा का चेहरा एक मैगज़ीन में छपे आर्टिकल में नज़र आया. उस आर्टिकल में लिखा था फेमस शेफ मधुर जाफरी ने अपनी रेसिपी की किताब लॉन्च की. सईद हैरान रह गए. दब्बू सी, घरेलु महरुनिमा का ये ट्रांसफॉर्मेशन उनके लिए किसी अजूबे से कम नहीं था. वो उनसे मिलने गए. उनके बच्चों ने उन्हें बताया कि उनके नए पिता ने ही महरुनिमा में ऊर्जा भरी है. अपनी पसंद के मुताबिक़ ज़िन्दगी जीने की जो आज़ादी सईद कभी नहीं दे पाए महरुनिमा को, वो उस शख्स ने सहजता से देकर महरुनिमा को मधुर बना दिया. प्यार का ये रूप सईद के लिए अनोखा था. खुद के प्रति बेहद निराशा में वो लिखते हैं,

“उसने उससे कभी प्यार नहीं किया, उसने हमेशा खुद से प्यार किया. और वो जो सिर्फ खुद से प्यार करते हैं, औरों को प्यार नहीं कर सकते.”

एक सशक्त अभिनेता, एक महान कलाकार से हम इतनी सीख तो ले ही सकते हैं.


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