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वो शायर, जो नेहरू को धोखा देकर पाकिस्तान चला गया

‘शायर-ए-इंक़लाब’ कहे जाने वाले कलमकार जोश मलीहाबादी को दुनिया छोड़े 37 साल हो गए. शब्बीर हसन खां ‘जोश’ का जन्म 5 दिसंबर 1898 को उत्तर-प्रदेश के मलीहाबाद में हुआ था. आज़ादी की जंग में उनकी नज़्मों का बोलबाला रहा. कहते हैं कि युवा उनकी नज़्में गाते-गाते जेल चले जाते थे. उनके कलाम की ताकत का इस एक शे’र से अंदाज़ा लगा लीजिए.

काम है मेरा तग़य्युर, नाम है मेरा शबाब
मेरा नारा: इंक़लाब-ओ-इंक़लाब-ओ-इंक़लाब

जोश उन चुनिंदा शायरों में थे, जो अपने कलाम में बेहद मुश्किल उर्दू अल्फाज़ का इस्तेमाल करते हैं. उर्दू पर उनकी बेमिसाल पकड़ थी.

‘जोश’ उन लोगों में से हैं जो आज़ादी के बहुत बाद में पाकिस्तान गए. लगभग 10 साल बाद. इस बारे में एक किस्सा मशहूर है कि उन्हें पंडित नेहरू ने मना किया था पाकिस्तान जाने से. लेकिन परिवार के दबाव में जोश साहब बिना बताये चले गए पाकिस्तान. ये बहाना बनाकर कि रिश्तेदारों से मिलकर वापस आ जाऊंगा. लेकिन कभी नहीं लौटे.

आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू.
आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू.

मौलाना आज़ाद जोश साहब की इस हरकत से बहुत नाराज़ हुए थे. उन्होंने जोश से कहा था कि तुम मेरे जीते जी हिंदुस्तान में कदम मत रखना. हुआ भी ऐसा ही. पाकिस्तान जाने के बाद जब ‘जोश’ साहब ने पहली बार भारत भेंट की, तब तक मौलाना आज़ाद की मौत हो चुकी थी.

जोश के पाकिस्तान शिफ्ट कर जाने के पीछे असल चिंता उर्दू को लेकर थी. उन्हें लगता था कि आज़ाद भारत की हिंदू मेजॉरिटी हिंदी को उर्दू पर तरजीह देगी. कमोबेश ऐसा हुआ भी. पाकिस्तान शिफ्ट होने के बाद जोश कराची में सेटल हुए और अंजुमन-ए-तरक्की-ए-उर्दू के लिए काम किया. पाकिस्तान के एक और उम्दा शायर फैज़ अहमद फैज़ उनके गहरे दोस्तों में से एक थे. 2012 में पाकिस्तान सरकार ने उन्हें ‘हिलाल-ए-इम्तियाज़’ पुरस्कार से नवाज़ा, जो पाकिस्तान का दूसरा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार है. उनकी आत्मकथा ‘यादों की बारात’ को उर्दू साहित्य में क्लासिक का दर्जा प्राप्त है.

जोश मलीहाबादी की ऑटोबायोग्राफी.

जोश मलीहाबादी भाषा की शुद्धता के लिए सनक की हद तक गंभीर थे. उन्होंने ज़िंदगी भर भाषा को ठीक ढंग से बोले जाने की वकालत की. जोश को 1954 में पद्मभूषण से भी नवाज़ा गया था. इस तरह वो दोनों मुल्कों में आला नागरिक सम्मान पाने वाले दुर्लभ व्यक्ति बनें.

आज़ादी के फ़ौरन बाद हुए दंगों में जब लाखों जानें गईं तब उन्होंने बेहद दुखी होकर एक नज़्म लिखी थी. उस लम्बी नज़्म ‘हिंदू-मुस्लिम मुत्तहद नारा’ का एक हिस्सा पढ़ाते हैं आपको. पढ़िए उन्होंने कैसे दोनों मजहबों को ज़लील करने की हद तक लताड़ा है.

जोश लिखते हैं,

किस-किस मज़े से हमने उछाली हैं औरतें
सांचे में बेहयाई के ढाली हैं औरतें
शहबत की भट्टियों में उबाली हैं औरतें
घर से बिरहना करके निकाली हैं औरतें

यह भी मज़े किए हैं हविस परवरी के बाद
फाड़ा है शर्मगाहों को इस्मतदरी के बाद

चुन-चुन के हमने खाए हैं कितने ही नौजवां
बच्चों के जिस्म में भी दर आई है यह सितां
बूढों को भी मिली है न उस गुर्ज़ से अमां
गुलचेहरा औरतों की भी काटी है छातियां

दो कर दिया है चीरकर हमने यकीन कर
बच्चों को उनकी मांओं की गोदी से छीन कर

बूजहलकी शराब से छलका के जाम को
बट्टा लगा दिया है मुहम्मद के नाम को
बख्शा है ताज राबने-दोज़ख मक़ाम को
ज़िल्लत की घाटियों में गिराया है राम को

हक़ का जिगर है ख़ून, तो दिल चाक-चाक है
क़ुरआन पे है धूल, तो गीता पै खाक़ है

जब तक कि दम में दम है चलाएंगे हम सितां
घंटा इधर बजेगा तो होगी उधर अज़ां
रक्खेगी मुल्को-कौम को बेअम्नो-बेअमां
यह चोटियां सरों की, यह चेहरों की दाढ़ियां

काबू में ये फ़साद का भंगी न आएगा
जब तक के लौट कर के फिरंगी न आएगा

22 फ़रवरी 1982 को उन्होंने धरती को अलविदा बोल दिया था. आइए उनके चुनिंदा शे’र पढ़े जाएं.


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