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जेएनयू के सबसे बड़े 'एंटी-नेशनल' आदमी को सलाम करने का दिन

रमाशंकर यादव 'विद्रोही'. 1957-2015. #respect.

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अनुराग अनंत.

ये आर्टिकल हमारे लिए अनुराग अनंत ने भेजा है. रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ की बरसी पर उन्होंने उनसे जुड़े अपने संस्मरणों को लिखा है. विद्रोही 1957 में यूपी के फिरोज़पुर में पैदा हुए थे. जेएनयू में ही पढ़े. लेकिन फिर वहीं के होकर रह गए. आजीवन कैंपस में ही गुजारा किया. बिना किसी आय के स्त्रोत के छात्रों से मिले सहयोग पर ही जीते रहे. कोई काम नहीं किया, सिर्फ कविताएं कीं.

कविताएं ऐसी, कि सुनने वालों के पैर ज्वालामुखी की आग जैसे नीचे से जलने लगे, ख़ून इतना तेज़ी से दौड़ रहा हो कि नसें फाड़कर बाहर आने को हो जाए और उनकी अपने समझदार होने की गलतफहमी खत्म हो जाए. आज ही के दिन 8 दिसंबर 2015 को उनका निधन हो गया था, बावजूद इसके कि विद्रोही ने बोला था – “मैं सोचता हूं कि ये मौत बिना मारे मुझे, मानेगी नहीं. और मौत सोचती है कि ये आदमी तो मरेगा नहीं.”

जेएनयू को लेकर हाल के समय में लोगों की जैसी गलत धारणा बना दी गई है, उन्हें विद्रोही के बारे में पढ़ना चाहिए और उन्हें सुनना चाहिए, उन्हें पता चलेगा कि तेज़ाबी कविताओं के मायने क्या हैं और क्रांतिकारी कैसा होता है. जेएनयू से पढ़कर जितने भी बड़े-बड़े लोग निकले हैं वो किसी मोड़ पर विद्रोही के फैनबॉय रहे होंगे. तो आज याद उन्हीं की.

अनुराग फिलहाल लखनऊ में भीमराव अंबेडकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी से मास कॉम और जर्नलिज़्म में पीएचडी कर रहे हैं. 

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जिस देश में मरने के बाद भी जाति नहीं जाती, वहां एक आदमी अपने विश्वविद्यालय का नाम अपने साथ जाति की तरह लेकर फिरता रहा. लोग विद्रोही का नाम आने पर आज भी पूछ ही बैठते हैं, जेएनयू वाले विद्रोही हैं? तो विद्रोह के अनेकों संस्करणों में खांटी जेएनयूआइट विद्रोह के ब्रांड अम्बेसडर बनकर विद्रोही ने जीवन गुज़ार दिया.

इनके कविता के बिना जेएनयू का कोई भी छात्र आंदोन संपन्न नहीं होता था.
इनकी कविता बिना जेएनयू का कोई छात्र आंदोलन शायद ही पूरा होता था.

वो कवि की तरह नहीं कर्ता की तरह लिखते थे. ‘प्रकृति’ और ‘मनुष्य’ दोनों को न्याय के कठघरे में गवाही के लिए बुला लेते. वो बीच की अदालतों को मंसूख कर देते थे. तमगों और डिग्रियों को ताक पर रख देते और मोहनजोदड़ो की सीढ़ी पर पड़ी औरत की लाश की शिनाख्त करते हुए दुनिया भर के मजदूरों को एक होकर रोम पर चढ़ाई करने को कह देते थे. उनमें इंसान होने की ऐसी ठसक थी कि ईश्वर से लड़ाई ठान बैठे थे. वो आसमान से भगवान को बेदखल करके वहां धान उगाना चाहते थे.

पर 8 दिसंबर 2015 को यूजीसी (University Grants Commission) के सामने चल रहे छात्रवृत्ति के आंदोलन में विद्रोही हम सबको छोड़ कर चले गए. यही कोई शाम 4 बजे होंगे खबर आई कि विद्रोही नहीं रहे. दिमाग सुन्न हो गया. अभी-अभी तो ये कवि मोर्चे पर कविता का आयुध थामे लड़ रहा था और अभी-अभी विदा लेकर चला गया. अभी तो बसंत ऋतु भी नहीं आई थी. दानों में दूध और आमों में बौर आना बाकी था. अभी महुए भी कहां चुए थे, वनबेला भी कहां फूली थी. विद्रोही की चिता दहक रही थी और मित्रगण दिल्लगी कर रहे थे कि ‘विद्रोही भी क्या तगड़ा कवि था’.

जेएनयू के ढ़ाबे पर कविता सुनाते विद्रोही.
जेएनयू के ढ़ाबे पर कविता सुनाते विद्रोही.

मरने को तो चे ग्वेरा भी मरे थे और चंद्रशेखर भी. लेकिन वास्तव में कोई नहीं मरा है. सब ज़िंदा हैं. तुम्हें भी क्या कम मारा गया. इस कलिकाल में अनेकों बार घोषणाएं हुई कि विद्रोही मर गया. पर तुम हर बार जिन्दा ही मिले. मोर्चे पर लड़ते हुए. गाते हुए. मुझे यकीन है तुम मौत की आंख में धूल झोंक कर किसी क्रांतिकारी की तरह फरार हो जाओगे और बरामद होगे अपनी, कविताओं में, विचारों में, आंदोलनों और जनसंघर्षों के मोर्चों पर लड़ते हुए. अभी तो तुम्हारी बहुत जरूरत है ‘मेरे कवि’.

खबर मिली कि विद्रोही का पार्थिव शरीर 9 दिसंबर, दोपहर 12 बजे जेएनयू छात्रसंघ भवन ‘टेफ्लास’ पर अंतिम दर्शन के लिए रखा जाएगा. लाल झंडे में लिपटा तुम्हारा शरीर था और चारों तरफ तुम्हारे यार तुम्हें याद करके दिल्लगी कर रहे थे. तुम्हारे विद्रोही जीवन के किस्से सुनाए जा रहे थे. पत्नी और बेटी ने भी तुम्हारे चिर विद्रोह की कहानियां सुनाईं और फिर यही कोई 2 बजे के आसपास तुम्हारे शरीर को तुम्हारे यार लोधी रोड स्थित शमशान स्थल की ओर लेकर चल दिए.

क्रांति के नारों के बीच तुम अपने यारों के साथ जेएनयू छोड़ कर चल दिए. पर ये कहां मुमकिन था कि तुमसे कोई जेएनयू छुड़ा सकता. मौत भी मजबूर थी. तुम जेएनयू का जादू थे. तुम यहां की झाड़ियों, जंगलों, पहाड़ियों, पोस्टरों, नारों और विशिष्ठ मुद्रा में शरीर को थोड़ा तिरछा करके आसमान में लहराती हुई मुट्ठियों और हाथों में घुल गए थे.

विद्रोही को जला तो दोगे लेकिन मारोगे कैसे?
विद्रोही को जला तो दोगे लेकिन मारोगे कैसे?

विद्रोही, तुम्हें मौत नहीं मार सकती थी. चिता की आग तो महज़ एक औपचारिकता भर थी. वो तुम्हें कहां जला सकती थी. तुम्हें तो पूरब के लोग बचाएंगे. जिनके सुंदर खेतों को तलवारों की नोंक से जोता गया. जिनकी फसलों को रथों के चक्कों तले रौंदा गया. तुम्हें तो पश्चिम के लोग बचाएंगे. जिनकी स्त्रियों को बाजारों में बेचा गया. जिनके बच्चों को चिमनियों में झोंका गया. तुम्हें तो उत्तर के लोग बचाएंगे. जिनके पुरखों की पीठ पर पहाड़ लाद कर तोड़े गए.

तुम्हें तो सुदूर दक्षिण के लोग बचाएंगे. जिनकी बस्तियों को दावाग्नियों में झोंका गया. जिनकी नावों को अतल जलराशियों में डुबोया गया. वो सारे लोग मिलकर तुम्हें बचाएंगे. जिनके खून के गारे से, पिरामिड बने, मीनारें बनीं, दीवारें बनीं, क्योंकि तुम्हें बचाना इंसानों को बचाना है. बच्चों को बचाना है. स्त्रियों को बचाना है. अपने पुरखों को, आने वाली नस्लों को बचाना है.

विद्रोही पूरे जेएनयू के दुलारे थे.
विद्रोही पूरे जेएनयू के दुलारे थे.

शाम यही कोई 7 बजे होंगे. मैं गंगा ढाबे पर उदास बैठा था. दो साल पुराना का और उससे भी दो साल पुराना किस्सा याद आ रहा था. विद्रोही से पहली मुलाकात लखनऊ में एक कार्यक्रम में हुई थी. साल 2011, मंच पर विद्रोही कविता पढ़ रहे थे. नाटा कद, दुबली पतली काठी, सांवला रंग, बिखरे हुए बाल, चेहरे पर तेल की परत और तन पर एक सैनिक लॉन्ग कोट. उम्र में अधेड़ से थोड़ा सा ज़्यादा, ज़ज्बे में जवान से थोड़ा ज़्यादा जवान. अपेक्षाकृत बड़े और तिकोने चेहरे को नचा नचा कर, हाथ को अजब अक्खड़ी अंदाज़ में हिला रहे थे. उनको देख कर लगा जैसे स्वयं कविता मनुष्य का रूप धारण करके खुद को पढ़ रही हो.

मैंने पहली बार कवि को कविता होते देखा था. विद्रोही से हाथ मिलाया. बाद में गुमटी पर मैंने चाय, और विद्रोही ने चाय और सिगरेट पी. विद्रोही ने मुझे दोस्त और मैंने उन्हें क्या मान लिया शब्दों में नहीं लिख पाउंगा. उसके बाद विद्रोही से साल 2013 में मुलाकात हुई. मैं एम.फ़िल के फ़ील्ड सर्वे के लिए दिल्ली में था. दिन दशहरे का था और गंगा ढाबे पर ही विद्रोही से मुलाकात हो गई. कुछ देर चर्चा हुई. देश दुनिया में चल रहे संघर्षों पर बात हुई और तब तक रावण जलाया जाने लगा.

विद्रोही टेफ्लास की तरफ चल दिए. मैं भी साथ हो लिया. विद्रोही टेफ्लास के पीछे जहां रावण जलाया जा रहा था, खड़े थे. विद्रोही को जलते हुए रावण को देख कर अग्नि परीक्षा में आग के बीच घिरी सीता की याद सी आने लगी. वो देशज भाषा में सीता की याद में कुछ कविता नुमा गुनगुनाने लगे. विद्रोही इसी तरह कविता रचते थे. मेरे पास अगर उस समय स्मार्टफोन होता तो मैं वो रिकार्ड कर पाता. इसलिए मैं उन्हें सुनता रहा. मुझे रावण में जलती हुई सीता और खुशी मनाते लोग दिख रहे थे. मेरा मन बैठा जा रहा था. मन कर रहा था चीख-चीख कर रोऊं. पर मैंने खुद को संभाला. विद्रोही भीड़ में ओझल हो गए और मैं अपने दोस्त के पास हॉस्टल लौट आया.

अपने बुजुर्ग साथियों से मैंने विद्रोही का एक और किस्सा सुना था. चंद्रशेखर की बिहार में हत्या कर दी गई थी. जेएनयू अपने अध्यक्ष की हत्या पर उबल रह था. छात्र सीबीआई जांच की मांग को लेकर सीबीआई दफ्तर घेरे हुए थे. पुलिस अफसरों ने घेरा हटाने की चेतावनी दी. तो उनसे छात्रों ने कहा बस विद्रोही जी कविता सुना लें तो छात्र हट जाएंगे. उन्हें लगा ये दुबला-पतला आदमी 2-4 मिनट में कविता सुना कर ख़त्म कर देगा. पर विद्रोही जी लगातार 45 मिनट तक कविता सुनाते रहे. बाद में पुलिस से हल्की झड़प और प्रतिरोध के बाद वहां से छात्र हटे.

विद्रोही छात्र आंदोलनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे.
विद्रोही छात्र आंदोलनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे.

असल में विद्रोही मोर्चे के कवि थे. उनकी कविताएं जूझते हुए संघर्षी चेतना की घोषणाओं और खुली योजनाओं की कविता है. इसलिए वो बिखरी हुई और बेढब शिल्प में ढली होने के बावजूद सीधे दिल में उतर जाती है. विद्रोही की कविता की काव्यशास्त्रीय विवेचना और आलोचना नहीं की जा सकती. ये उनकी कविताओं की नहीं बल्कि हमारे काव्यशास्त्र और सौन्दर्यबोध की सीमाएं हैं.

जाते जाते विद्रोही का संदेश आप तक उनके ही शब्दों में पंहुचा रहा हूं. गांठ बांध लीजिए. ये ताउम्र संघर्षों की आग के बीच बैठे हुए कविता के लोहार की गुहार है.

इस पपीहे की तरह रटना मुझे मंजूर न हो
और रटाई आदमी की जात का दस्तूर न हो
हम खुले दिल वाले हैं, खुला अपना हौसला है
ऐसे ही तो पुरखे भी थे और ऐसा ही तो सिलसिला है
ये मुकदमा है पुराना, जिसका होना फैसला है


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