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एक 'औरंगज़ेब' ऐसा भी, जिसे सब पसंद करते हैं

“मुफ़लिस के बदन को भी है चादर की ज़रूरत
अब खुल के मज़ारों पे ये ऐलान किया जाए”

इससे आसान लफ़्ज़ों में और कोई क्या समझाएगा कि इबादत और कुछ नहीं, इंसान के काम आना भर है. यही आसानियत तो ख़ासियत है क़तील शिफ़ाई साहब की. आम आदमी का आम सा शायर. आम से लहजे में आम सी बातें समझाता आम आदमी. लेकिन फिर भी ख़ास. बहुत ख़ास. आखिर कितनों को ये फ़न मयस्सर होता है कि वो ज़िंदगी की गहरी बातों को इस अदा से रख सकें कि हर ख़ासो-आम उसे आसानी से समझ पाएं! क़तील साहब के यूं आसान होने ने ही उनको सालों साल शायरी के कद्रदानों के दिलों पर राज करवाया. ज़रा बानगी तो देखिये,

अब जिसके जी में आए वही पाए रौशनी
हमने तो दिया जला के सरेआम रख दिया

ग़ज़ल हो, नज़्म हो या फ़िल्मी गीत. उनका काम हर विधा में शानदार रहा है. फिर तेरी कहानी का गीत याद कीजिये,

तेरे दर पर सनम, चले आए
तू ना आया तो हम, चले आए

कितना सादगी भरा शिकवा! इंस्टेंट कनेक्शन टाला ही नहीं जा सकता. कितनी ही ग़ज़लें हैं उनकी जो एक बार ज़ुबां पर चढ़ गई, तो उतरी ही नहीं. मुहब्बत में पड़ने वाला हर इक शख्स उनकी इस ग़ज़ल को गुनगुनाए बगैर रह ही नहीं सकता.

अपने होठों पर सजाना चाहता हूं
आ तुझे मैं गुनगुनाना चाहता हूं

करन जौहर की फिल्म से अरसा पहले उनकी लिखी ये ग़ज़ल, किसी भी ब्रेक-अप-सॉंग से ज़्यादा प्रभावशाली है. क्यों कि इसमें ‘जज़्बात’ हैं.

सदमा तो है मुझे भी कि तुझसे जुदा हूं मैं
लेकिन ये सोचता हूं कि अब तेरा क्या हूं मैं

24 दिसंबर 1919 को जन्मे क़तील साहब का असली नाम मुहम्मद औरंगज़ेब था. उन्नीस साल की उम्र में उन्होंने क़तील तख़ल्लुस अपनाया. शिफाई अपने उस्ताद याहया ख़ान शिफ़ा के सम्मान में चुना. और इस तरह ताज़िंदगी दुनिया उन्हें क़तील शिफ़ाई के नाम से जानती रही. क़तील साहब भी उन नगीनों में से हैं जो पार्टीशन के बाद पाकिस्तान के हिस्से आए. उन्होंने भारतीय और पाकिस्तानी फिल्मों के लिए लगभग 2500 गाने लिखें.

जगजीत और लता की आवाज़ में जब आप उनकी ईश्वर से लगाई गुहार सुनते हैं, तो बस खो जाते हैं

दर्द से मेरा दामन भर दे, या अल्लाह
फिर चाहे दीवाना कर दे, या अल्लाह

‘परेशां रात सारी है’, ‘अपने हाथों की लकीरों में’, ‘किया है प्यार जिसे’, ‘तुम पूछो और मैं ना बताऊं’ जैसी तमाम ग़ज़लें अदब के मुरीदों की ज़िन्दगी का हिस्सा है.

आइये उनके कुछ चुनिंदा अशआर का मज़ा लिया जाए.

अभी तो बात करो हमसे दोस्तों की तरह
फिर इख्तिलाफ़ के पहलू निकालते रहना

अपनी ज़बां तो बंद है तुम ख़ुद ही सोच लो
पड़ता नहीं है यूं ही सितमगर किसी का नाम

चलो अच्छा हुआ काम आ गई दीवानगी अपनी
वगरना हम ज़माने को समझाने कहां जाते

गिरते हैं समंदर में बड़े शौक से दरिया
लेकिन किसी दरिया में समंदर नहीं गिरता

जब भी आता है मिरा नाम तेरे नाम के साथ
जाने क्यों लोग मिरे नाम से जल जाते हैं

क्यों शरीक-ए-ग़म बनाते हो किसी को ऐ ‘क़तील’
अपनी सूली अपने कांधे पर उठाओ, चुप रहो

तर्क-ए-वफ़ा के बाद ये उसकी अदा क़तील
मुझको सताए कोई तो उसको बुरा लगे

तुम आ सको तो शब को बढ़ा दूं कुछ और भी
अपने कहे में सुब्ह का तारा है इन दिनों

तुम्हारी बेरुख़ी ने लाज रख ली बादा-खाने की
तुम आंखों से पिला देते तो पैमाने कहां जाते

क्या मसलहत-शनास था वो आदमी क़तील
मजबूरियों का जिसने वफ़ा नाम रख दिया

दूर तक छाए थे बादल और कहीं साया न था
इस तरह बरसात का मौसम कभी आया न था

जो भी आता है बताता है नया कोई इलाज
बंट ना जाए तेरा बीमार मसीहाओं में

न जाने कौन सी मंज़िल पे आ पहुंचा है प्यार अपना
न हमको ऐतबार अपना, न उनको ऐतबार अपना

वो मेरा दोस्त है सारे जहां को है मालूम
दगा करे वो किसी से तो शर्म आए मुझे

सदा जिए ये मेरा शहर-ए-बेमिसाल जहां 
हज़ार झोंपड़े गिरते हैं इक महल के लिए

ज़िन्दगानी के तवील सफ़र के तमाम मुसाफिरों के लिए उनका ये शेर एक उम्दा नसीहत ही तो है…

राब्ता लाख सही काफ़िला-सालार के साथ
हमको चलना है मगर वक़्त की रफ़्तार के साथ


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