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जब लता मंगेशकर चित्रगुप्त से बोलीं,'आपको मेरी आवाज़ पर नहीं, चप्पल पर भरोसा है.'

MUNNA SIRये आर्टिकल मुन्ना के पाण्डेय ने लिखा है. तारीख के जिस्म पर गुदा है कि वह परम हैं. लीला कुछ ऐसी है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी में प्रोफेसरी करते पाए जाते हैं. हिंदी साहित्य को कृतार्थ कर रहे हैं. असल में क्या कर रहे हैं, ये वह नहीं जानते. विदेह भाव से सृष्टि में छेड़छाड़ किए जाते हैं. इस दौरान अपनी निब जब तब डुबाते हैं स्याही में. और जो छींटे पढ़े जाते हैं, तो तमाम लोगों को अमरौती मिल जाती है. इस दफा चित्रगुप्त बातें बता रहे हैं. म्यूज़िक डायरेक्टर चित्रगुप्त की.


1963 के फरवरी माह में देश के पहले राष्ट्रपति बाबू राजेंद्र प्रसाद की प्रेरणा से भोजपुरी की पहली फ़िल्म ‘गंगा मईया तोहे पियरी चढईबो’ रिलीज हुई. इस फ़िल्म के संगीतकार थे – चित्रगुप्त (16 नवंबर, 1917 – 14 जनवरी, 1991).

16 जनवरी, 1916 को बिहार के गोपालगंज जिले के एक छोटे से गांव संवरेजी में जन्मे, चित्रगुप्त श्रीवास्तव पटना के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर थे. इन्होंने जर्नलिज्म में भी एमए की डिग्री ली थी. दो-दो डिग्रियों के साथ प्रफेसरी करते हुए चित्रगुप्त ने पंडित शिवप्रसाद त्रिपाठी से संगीत की दीक्षा ली थी और भातखंडे संगीत विद्यालय, लखनऊ से नोट्स लेकर रियाज़ भी किया करते थे.

संगीत के धुनों में विचरते प्रफेसर का पढ़ाने में मन न रमा तो वो जमी-जमाई नौकरी छोड़ मायानगरी मुम्बई को रवाना हो गया.

यूं चित्रगुप्त भोजपुरी सिनेमा की संगीत यात्रा के पहले यात्री बने. मुम्बई में उन्होंने एस एन त्रिपाठी के सहायक के तौर पर अपना करियर शुरू किया. एक स्वंतंत्र संगीतकार की हैसियत से उनकी पहली फ़िल्म थी – ‘फाइटिंग मास्टर’ (1946).

मुम्बई में जाने के बाद पहले डेढ़ दशकों के दरम्यान चित्रगुप्त ने हिंदी सिनेमा की दूसरे-तीसरे दर्जे की फिल्मों को संगीत देना शुरू किया. जिनमें कई फिल्मों के नाम तो खुर्राट सिनेमचियों तक को याद न होंगे. चित्रगुप्त की हिंदी फिल्मों पर नज़र डालने के लिए सिनेमाई वेबसाइट्स का ही सहारा हो सकता है. ‘तूफान क्वीन’, ‘सिंदबाद द सेलर’, ‘अपलम चपलम’, ‘लेवन ओ क्लॉक’, ‘साक्षी गोपाल’, ‘कल हमारा है’, ‘भक्त पुंडलिक’, ‘रामू दादा’ आदि ऐसी ही फिल्में हैं.

पर ऐसा नहीं है कि इन फिल्मों की तरह उनका संगीत भी गुमनाम रहा बल्कि संगीत अध्येता यतीन्द्र मिश्र की मानें तो-

वे शायद अकेले ऐसे संगीतकार रहे हैं, जो बैनर या निर्देशक के छोटे-बड़े होने से सर्वथा निरपेक्ष रहते आए हैं. उनके पूरे करियर में केवल एक बड़े बैनर, एवीएम प्रोडक्शन, मद्रास ने ही उन्हें बतौर संगीतकार साईन किया था. जिनके लिए चित्रगुप्त ने ‘शिवभक्त’, ‘मैं चुप रहूंगी’ और ‘भाभी’ का संगीत रचा.

उनको लोकप्रियता ‘भाभी’ से मिली. एवीएम दक्षिण का बड़ा बैनर था. चित्रगुप्त जैसे संगीतकार जो उस समय तक भक्ति और तथाकथित बी, सी ग्रेड फिल्मों का संगीत कर रहे थे, उनको फ़िल्म ‘शिवभक्त’ के मिलने का किस्सा एस डी बर्मन से जुड़ता है. एवीएम के मयप्पन, ‘शिवभक्त’ का प्रस्ताव लेकर सीनियर बर्मन के पास आए थे. पर बर्मन ने चित्रगुप्त का नाम आगे कर दिया. फिर इसी बैनर की ‘भाभी’ मूवी ने बतौर संगीतकार चित्रगुप्त को स्थापित कर दिया. चित्रगुप्त के संगीतबद्ध किये गीतों ने वो ऊंचाइयां छुईं, जो उन फिल्मों ने नहीं छुईं, जिनमें वो गीत थे.

यानी गाने लोकप्रिय हुए, कालजयी हुए. मन्ना डे, तलत महमूद, मोहम्मद रफी, लता मंगेशकर, मुकेश, आशा भोंसले, महेंद्र कपूर, उषा मंगेशकर, सुमन कल्याणपुर जैसे गायकी के कई नाम चित्रगुप्त के संगीत के हिस्से में दर्ज हैं.

‘लागी छूटे ना’, ‘अब तो सनम चाहे जाए जिया’, ‘तेरी दुनिया से होके मजबूर’, ‘उठेगी तुम्हारी नज़र धीरे-धीरे’, ‘चली- चली रे पतंग मेरी’, ‘दिल का दिया जला के, ये कौन मेरी तन्हाई में’, आदि कुछ ऐसे गीत हैं जिन्होंने अपनी फिल्मों की लकीर को लांघ कर हिंदी सिनेमा सुर यात्रा में अपनी खास पहचान बनाई और आज तक सुनने वालों की ज़ुबान पर हैं. हिंदी के बड़े नाम गोपाल सिंह नेपाली के गीतों को भी चित्रगुप्त ने संगीतबद्ध किया. इतना ही नहीं, इनकी संगीत यात्रा पर लिखने वाले अनुराग भारद्वाज की माने तो चित्रगुप्त ने प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की पत्नी के लिखे दो गीतों को भी संगीतबद्ध किया था.

# भोजपुरी और चित्रगुप्त-

भोजपुरी की पहली फ़िल्म बनने की प्रक्रिया राष्ट्रपति राजेन्द्र बाबू के प्रेरणा से शुरू हुई थी.

चित्रगुप्त, नज़ीर हुसैन, शैलेन्द्र, विश्वनाथ शाहाबादी जैसे नाम एक साथ आए तो इतिहास रच दिया गया. चित्रगुप्त ने इस फ़िल्म में सुमन कल्याणपुर से ‘अब तो लागत मोरा सोलहवां’, उषा मंगेशकर से ‘है गंगा मईया तोहे’, लता मंगेशकर से ‘काहे बंसुरिया बजईले/लुक छिप बदरा’, और मोहम्मद रफी से, ‘सोनवा के पिंजरा में बंद’ – गवाकर एक नई फ़िल्म इंडस्ट्री के शुरू होने के इतिहास के पहले पन्ने पर सोने के अक्षरों से अपने संगीत को दर्ज करवा दिया.

बाद में चित्रगुप्त का संगीत भोजपुरी सिनेमा के लिए अनिवार्य जरूरत बन गया. ‘बलम परदेसिया’ के गोरकी पतरकी रे मारे गुलेलवा, ‘भैया दूज’ के सारे गाने, ‘गंगा जइसन भौजी हमार’, ‘लागी नाही छूटे राम’, ‘गंगा किनारे मोरा गांव’ जैसी अनेक कालजयी शानदार भोजपुरी फिल्में इस भूतपूर्व संगीतकार प्रोफेसर की अभूतपूर्व कृतियां हैं. जिनके गीतों के सहारे भोजपुरी में व्याप्त अश्लीलता से लड़ने वाले अपने तीर-तरकश-तर्क लेते हैं.

इनके कुछ बेहद चर्चित गीतों में ‘मेला में सैयां भुलाइल हमार’, ‘रहिहा होसियार बलमू’, ‘कहे के त सब केहू आपन’, ‘अरे रे रे ई का तू करे ल सांवरिया हो मारे ल कंकरिया’, ‘ऐ डॉक्टर बाबू बताइ दवाई’, ‘कहवां गईल लरिकइयां हो’ – भी हैं जो आज तक लोकप्रिय है और ‘भैया दूज’ फ़िल्म के गीत- ‘राम भैया के लाली घोड़िया’, ‘ससुरिया जइहा भैया धीरे-धीरे’, ‘अबरा कुटिले भंवरा कुटिले जम के दुआर’, ‘कुटिले भईया के दुश्मन’- तो लोक परंपरा का खाद पानी लेकर भोजपुरिया लोक संस्कृति में इस कदर समा गए हैं कि वह संस्कार गीतों का रूप धर लोकजीवन में शामिल हो गए हैं. संभवतः दुनिया में वो अपने किस्म का अकेले संगीतकार हैं.

चित्रगुप्त में हिंदुस्तानी संगीत की शास्त्रीयता और लोक की पारंपरिक धुन का अद्भुत समन्वय रहा. ये उनके सांगीतिक प्रयोग को खास बनाता है. भोजपुरी फ़िल्म संगीत के पितामह चित्रगुप्त की सांगीतिक विरासत अस्सी के दशक में उनके बेटों आनंद-मिलिंद ने संभाली और ‘कयामत से कयामत तक’ से हिंदी सिनेमा के संगीत ने एक नई रंगत पायी.

पर अर्थशास्त्र का यह प्रोफेसर अर्थोपार्जन में इतना संकोची था कि जिस दौर में उनके समकक्ष संगीतकारों ने अपनी फीस लाखों में रखी थी वहीं वो बीसेक हजार में भी एक गीत तैयार करके दे देते थे. शायद यह भी एक कारण था कि बी, सी, या क्षेत्रीय कहे जाने वाले सिनेमा के निर्माता भी उनसे सहजता से मिलकर काम करवाने का साहस कर लेते थे. चित्रगुप्त के हिस्से हिंदी, भोजपुरी के अलावा गुजराती, पंजाबी फिल्में भी रहीं. वह शख्स भोजपुरी फ़िल्म संगीत का पितामह है, जहां से भोजपुरी फ़िल्म संगीत ने अपना आकार गढ़ा.

अंत में, चित्रगुप्त का एक किस्सा बरास्ते ‘लता सुरगाथा’ (यतीन्द्र मिश्र)-

चित्रगुप्त एक दिन लंगड़ा के चल रहे थे. लता जी ने उनसे पूछा,’क्या उनके पैर में दिक्कत है?’

तो उन्होंने कहा,’मैं टूटी हुई चप्पल पहनकर आया हूं.’

इस पर लता जी बोलीं,’चलिए आपके लिए नई चप्पल ले आते हैं.’

चित्रगुप्त झेंपते हुए बोले,’ये चप्पल मेरे लिए शुभ है, जिस दिन इसे पहनकर आते हैं, रिकार्डिंग अच्छी होती है.’

लता जी जोर से हंसने लगीं, उन्होंने कहा,’चित्रगुप्त जी को अपनी चप्पल पर यकीन है हमारे गाने पर नहीं.’

आज इन्हीं चित्रगुप्त की पुण्यतिथि है.


 

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