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मासूमियत भरी संजीदा मोहब्बत की बात हो तो ये आदमी चैंपियन है

1973 में एक फिल्म रिलीज़ हुई थी, ‘गर्म हवा’. 3 फिल्म फेयर और 1 नेशनल अवॉर्ड जीतने वाली इस फिल्म को हिंदी आर्ट सिनेमा की शुरुआत करने वाली फिल्म भी माना जाता है. फिल्म भारत-पाकिस्तान बंटवारे पर बनी थी और लेजेंडरी ऐक्टर बलराज साहनी की आखिरी फिल्म थी. फिल्म में सलीम मिर्ज़ा बने बलराज साहनी का एक लड़का होता है. सिकंदर मिर्ज़ा. सिकंदर को अपनी तमाम काबिलियत के बाद भी नौकरी नहीं मिलती. बंटवारे के बाद के माहौल में लोग सलाह देते हैं कि पाकिस्तान चले जाओ. सिकंदर मिर्ज़ा का किरदार मुंबई में एलएलबी फाइनल इयर की पढ़ाई कर रहे एक लड़के ने निभाया था. लड़के को इस रोल के लिए कुल 750 रुपए नगद मिले थे, वो भी 15 साल बाद. मगर इस फिल्म के साथ इस लड़के, फारुख शेख ने बलराज साहनी की नैचुरल ऐक्टिंग की विरासत को अपने अंदर जज़्ब कर लिया.

25 मार्च 1948 को पैदा हुए फारुख शेख अक्सर हिंदी सिनेमा के राहुल द्रविड़ की तरह लगते हैं. न सिर्फ काम के मामलों में भरोसेमंद बल्कि अक्सर सितारों और दूसरों की कलात्मक पारियों के बीच में थोड़ा धुंधला गए परफॉर्मर की तरह. उनके टीवी शो ‘जीना इसी का नाम है’ को ही ले लीजिए.  टीवी पर नफासत, विनम्रता के साथ बात करने वाले बच्चन साहब ‘कौन बनेगा करोड़पति’ के साथ सारी लाइमलाइट लूटकर ले जाते हैं. जो खान अपने तमाम स्टारडम के बाद भी नहीं चल पाए उनकी भी बात होती है. मगर अनजाने में ही फारुख इग्नोर कर दिए जाते हैं. एक एंकर के तौर पर उनका ज़िक्र हमारे ज़ेहन में तब आता है जब हम उस शो में फारुख से बतियाने की कल्पना करते हैं.

वैसे फारुख शेख के बारे में सोचते हुए सबसे पहले जगजीत सिंह की आवाज़ याद आती हैं. बड़ी साफगोई से कहती हुई, “आज फिर दिल ने एक तमन्ना की, आज फिर दिल को हमने समझाया.” पर्दे पर इसी साफगोई को फारुख बड़ी शिद्दत से जी रहे होते हैं. एक सामान्य सा मध्यमवर्गीय लड़का जिसकी सफलता और संघर्षों की कहानी हमारे जैसी ही है. ‘गमन’ में सुरेश वाडेकर की आवाज़ में, बड़े शहर में परेशान टैक्सी ड्राइवर, शिकायत भरे लहजे में सवाल पूछते हुए. “सीने में जलन, आंखों में तूफान सा क्यों हैं?”

फारुख शेख की अदाकारी की रेंज ऐसी है कि किसी को भी रश्क हो जाए. ‘चश्मेबद्दूर’ का सीधा-सीधा चश्मेवाला सिद्धार्थ, जो चमको वॉशिंग पाउडर खरीदते-खरीदते दिल हार बैठता है. वहीं ‘कथा’ में इसका ठीक उल्टा शातिर बासू. जो हर बात में पुरुषोत्तम जोशी बने नसीरुद्दीन शाह की बत्ती लगाता रहता है. सत्यजीत रे की ‘शतरंज के खिलाड़ी’ का लंपट शकील या ‘उमराव जान’ में नफासत पसंद ‘नवाब सुल्तान’.

इन तमाम फिल्मों में कभी रेखा की अदा सबकुछ पीछे छोड़ गई, कभी पैरलल और मेन स्ट्रीम सिनेमा के नाम पर फारुख को मिस हो गए. इसका मलाल भी उनकी बातों में दिखाई पढ़ा. मगर इन सबके बाद भी उनकी मासूम सी मगर पुख्ता ऐक्टिंग सब पर भारी पड़ती.

2002 में टाइम्स ऑफ इंडिया को दिए गए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा,

“मैं कभी कॉमर्शियल पसंद नहीं रहा. लोग मुझे पहचानते हैं, देख कर मुस्कुराते हैं, हाथ हिलाते हैं. मगर मुझे कभी खून से लिखा कोई मैरिज प्रपोज़ल नहीं मिला. जब राजेश खन्ना सड़क से गुज़रते थे तो ट्रैफिक रुक जाता था. मुझे ये सब न मिलने से फर्क नहीं पड़ता. मगर मुझे जब अपनी मर्ज़ी का काम नहीं मिलता है तो फर्क पड़ता है. मुझे 100 प्रतिशत कॉमर्शियल न होने से फर्क पड़ता है.”

इसके अलावा उनकी एक शिकायत फिल्मों से उस मासूमियत भरे रोमांस के खत्म होने की भी थी. फारुख ने दीप्ति नवल के साथ एक टीवी चैनल को दिए गए इंटरव्यू में कहा था कि

उस ज़माने की फिल्मों में पहले क्या पकेगा. कैसे पकेगा सब प्लान होता था. आप देखकर, महक लेकर अहसास करके फिर खाना खाते थे. अब तो फिल्में में प्यार ऐसे होता है कि दस्तरखान लगा हो और उसमें जाकर गिर जाओ. ये हिंदी सिनेमा का सबसे बड़ा नुकसान है.

उसी मासूम मोहब्बत से भरा ये गाना सुनिए.

इन्हीं वजहों से शायद फारुख 90 के दशक में फिल्मों से दूर हो गए. किसी फिल्म में विलन या फूहड़ कॉमेडी करने वाले सपोर्टिंग ऐक्टर की जगह टीवी पर ‘जी मंत्री जी’ और थिएटर में ‘तुम्हारी अमृता’ जैसे खूबसूरत प्ले करने लगे. 2010 के बाद बीच-बीच में ‘यंगिस्तान’ और ‘ये जवानी है दीवानी’ जैसी फिल्मों में आए और तफ्सील से छोटे-छोटे किरदारों में अपनी छाप छोड़कर चले गए. ठीक ऐसे ही वो दुनिया भी छोड़कर चले गए. खामोशी के साथ. बस उनके जाने के बाद अहसास हुआ, “तुम चले जाओगे तो सोचेंगे, हमने क्या खोया, हमने क्या पाया.”


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