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जब 11 नौसिखियों के बूते सौ करोड़ से भी ज़्यादा लोग वर्ल्ड कप जीत गए

24 सितंबर. 2007. वांडरर्स. साउथ अफ्रीका.

इंडिया वर्सेज़ पाकिस्तान. वर्ल्ड टी-20 फाइनल. क्रिकेट के सबसे छोटे फॉर्मेट का पहला वर्ल्ड कप. इंडिया और पाकिस्तान के बीच मैच के लिए इससे बेहतर प्लेटफ़ॉर्म नहीं हो सकता था. हो सकता था क्या? खैर, यूसुफ़ पठान टूर्नामेंट का पहला मैच खेल रहा था. यूसुफ़ पठान. कौन यूसुफ़ पठान? ये सवाल हर किसी के ज़हन में था. सिवाय इस बात के कि ये इरफ़ान पठान का भाई है, किसी को और कुछ नहीं मालूम था. ये वो वक़्त था जब इंडिया के डोमेस्टिक सर्किट के क्रिकेट मैच किसी भी चैनल पर नहीं दिखाये जाते थे. दिखाये जाते भी थे तो कोई खास इन्ट्रेस्ट नहीं लेता था. ऐसे में यूसुफ़ पठान के बारे में न मालूम होना कोई आश्चर्य नहीं था.

इंडिया टॉस जीत कर पहले बैटिंग करती है. पहला ओवर. मोहम्मद आसिफ़. वो जो गेंद को अपनी शर्तों पर स्विंग करवाता था. वो जो एक सधे हुए रनअप से आता था, क्रीज़ पर एक बेहद स्मूथ ऐक्शन के साथ हाथ घुमाता था और गेंद अंदर या बाहर दोनों ओर तैरा देता था. ये वही मोहम्मद आसिफ़ था जिसने एक ही टेस्ट मैच में लक्ष्मण, द्रविड़ और सचिन को बोल्ड किया था. अपनी पेस और स्विंग के मिक्स से. हर किसी को मालूम था कि ये किस हद तक शातिर किस्म का बॉलर था. लेकिन यूसुफ़ पठान, जो उसकी गेंदें झेलने को खड़ा था, के बारे में शायद ही कोई जानता था. पहले ओवर की चौथी गेंद. गुड लेंथ से आगे फेंकी हुई गेंद. बल्ले से कुछ पहले. अगर वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया का मैदान होता तो गेंद में बहुत हल्की ही सही, कुछ उछाल होती. यहां गेंद सीधे बल्ले पे चढ़ी. सीधे हाथ के बल्लेबाज यूसुफ़ पठान ने बल्ला हौंक दिया. गेंद आसिफ़ के सर के ऊपर से होती हुई सीधा बाउंड्री पार गिरी. श्री गणेश हो चुका था. डंके पर पहली चोट की जा चुकी थी. पाकिस्तान को पहला लव लेटर लिखा जा चुका था. उन्हें ये बताया जा चुका था कि गेंद को हवा में तैराना भले ही उनका फन हो लेकिन आदमी हमारे पास भी काम के थे.

India vs Pakistan 2007 T-20 World Cup Final 7
पहला मैच खेल रहे यूसुफ़ पठान.

यूसुफ़ पठान ज़्यादा देर तो नहीं टिके. 15 रन बनाये. और चलते बने. टी-20, जो उस वक़्त तक नया था, की ये ख़ास बात है. संदेसे आते हैं की तर्ज पर खिलाड़ी आते रहते हैं. वो जाते हैं तो आपके पास शोक मनाने का भी वक़्त नहीं होता. क्यूंकि अगला पहलवान आने को होता है. दूसरे एंड पर गौतम गंभीर टिके हुए थे. दिमाग लगाकर खेल रहे थे. गौतम गंभीर. लॉन्ग रन में इंडिया या किसी भी टीम के लिए बड़े मैचों का प्लेयर बनने वाला उलटे हाथ का बैट्समैन.

किसी को इल्म भी नहीं था कि 24 सितंबर 2007 का दिन इंडिया में ही नहीं दुनिया भर के क्रिकेट को बदल के रख देगा. ये मैच शायद दुनिया के सबसे ऐतिहासिक मैचों में से एक गिना जाएगा. आईपीएल की नींव इसी मैच से पड़ी. आईपीएल के बारे में भले ही क्रिकेट के जानकों और मानकों के बीच एक डिबेट छिड़ी हुई हो, लेकिन सच तो यही है कि कमरे में मौजूद एक बड़े हाथी की तरह आईपीएल भी इंडियन क्रिकेट में मौजूद था. है. और इंशाल्लाह रहेगा.


आईपीएल सलमान खान की फ़िल्मों जैसा है. आप कितना भी चीखें, चिल्लायें, उसे घटिया कहें, आप चाहकर भी उसे घेर नहीं सकते.


गौतम गंभीर. सोहेल तनवीर की उलटे पैर पर कूद के फेंकी गई स्विंग होती गेंदों को बाउंड्री का रास्ता दिखा रहा था. लंबी फेंकी गेंदों को फ्लिक कर रहा था. गेंद को उनकी मेरिट पर खेल रहा था. लंबी फेंकी गेंदों को मारने में कोई संकोच नहीं. यूसुफ़ के बाद उथप्पा आया जो ज़्यादा नहीं टिका. दहाई का भी आंकड़ा नहीं छुआ. टूर्नामेंट का हीरो, युवराज सिंह मैदान में चलता हुआ आया. करोड़ों की आशा लगी हुई थी. पंजाब के एक महा शैतान लड़के पर उन्हें भरोसा था. वो जिसने अपने बाप के सैकड़ों तमाचे खाकर क्रिकेट सीखा था. वो जिसने हफ़्ते भर पहले ही दुनिया को बताया था कि ये दुनिया काफी नहीं है उसकी मारी गई गेंदों को पनाह देने के लिए.

लेकिन वो 24 सितम्बर का वो दिन दूसरा था. शुरुआत धीमी रही. 10 गेंदों में 4 रन. गंभीर और युवराज. लेफ़्टी बैट्समैन. गौतम यानी बड़े मैचों में चलने वाला और युवराज यानी बड़े मैचों का प्रेशर न झेल पाने वाला बैट्समैन. ये बात साबित भी हुई. 2011 वर्ल्ड कप में पाकिस्तान के खिलाफ़ युवराज गोल्डन डक लेकर बैठे थे. 2014 टी-20 वर्ल्ड कप फाइनल में युवराज की जो छीछालेदर हुई थी, वो हम सभी को आज भी याद है. 19 गेंद पर 14 रन. उमर गुल ने युवराज का खाता बंद किया. धोनी को भी उमर गुल ने साफ़ किया. 10 गेंद पर 6 रन. लोगों ने टीवी चैनल बदलने शुरू कर दिए. इस आस में कि शायद यही टोटका काम कर जाए. और विकेटों का गिरना बंद हो.

India vs Pakistan 2007 T-20 World Cup Final 5

लेकिन गौतम गंभीर डटा हुआ था. अफरीदी को उतना ही मार रहा था जितना किसी और को. कानपुर में हुई गाली-गलौज आज भी याद्दाश्त में उतनी ही ताज़ा है. 18वें ओवर में एक छक्के के बाद उमर गुल ने गंभीर को भी वापस भेज दिया. अगले दो ओवरों में 27 रन आये. इंडिया का फाइनल स्कोर 157. बात 180 के आस पास हुई थी. 20-25 रन कम लग रहे थे.

इंडिया ने पहले ओवर में ही पहला विकेट उड़ाया. श्रीसंत के अगले ओवर में 21 रन आये. पलड़ा बार-बार इधर से उधर झुकता रहा. पूरी इनिंग्स में कभी मामला इधर डोले तो कभी उधर. यूनिस खान ने श्रीसंत को दो चौके मारे तो अगली गेंद पर इमरान नज़ीर आउट हो गया. यूसुफ़ पठान कामचलाऊ स्पिन फेंक रहे थे. जोगिन्दर शर्मा अपनी तिलिस्मी स्लो पेस गेंदें फेंक रहे थे. हरभजन की यॉर्कर अड्डे पर नहीं पड़ रही थीं. इरफ़ान पठान. पहले ओवर में 5 रन. दूसरे ओवर में शोएब मलिक और अफरीदी का विकेट. अफरीदी यानी पाकिस्तान का खेवनहार. वो जो हमेशा से ही 16 साल का लड़का रहा है. वो जो अपने दम पर दुनिया तो उसकी धुरी पर नचा सकता है. वो जो गेंद को ऐसे मारता है जैसे सर पे खून सवार हो. पाकिस्तान 12 ओवर के बाद 78 पर 6. मुसीबत में. इंडिया में जश्न की तैयारियां शुरू हो चुकी थीं. बस एक आखिरी रोड़ा था. मिस्बाह!

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*कट टु लास्ट ओवर*

17वें ओवर में तीन छक्के मारकर मैच का चेहरा बदल देने वाला मिस्बाह क्रीज़ पर था. हरभजन का एक ओवर बचा था. मिस्बाह के 35 गेंदों पर 37 रन. एक-एक रन कैल्कुलेट करके बना रहा था. दिमाग में मशीन फिट थी. अपने सामने आधी टीम को जाता देख चुका था. लेकिन टी-20 हमेशा से ही आखिरी वक़्त का खेल रहा है. और वो आख़िरी वक़्त शुरू हो चुका था.

आखिरी ओवर. पाकिस्तान को जीत के लिए 13 रन चाहिए थे. गेंद जोगिंदर शर्मा के हाथ में. हाल के वक़्त में जोगिंदर पंजाब पुलिस में भर्ती हैं. उस वक़्त क्रिकेट खेलते थे. गुपचुप. किसी को मालूम नहीं था. धोनी पर सवाल उठाये जाने लगे थे. लोगों ने अपने अपने घरों, दफ्तरों, सड़क के किनारे से धोनी को गालियां देनी शुरू कीं. पहली गेंद. वाइड. लम्बी वाइड. लोगों ने सर पकड़ लिए. उनका धीरज जवाब दे रहा था. लेकिन धोनी का नहीं. वो अपनी कहानी मैच के पहले ही ड्रेसिंग रूम में लिख कर आया था. रांची की सड़कों पर, झारखंड-बिहार के मैदानों में उसने तमाम बातें सुनीं थीं. सभी का जवाब अब तक उसने अपने खेल से दिया था. तो आज क्यूं कुछ अलग हो? आज भी उसे इन सभी बातों ने कतई परेशान नहीं किया.


बड़े इंसान की ये पहचान होती है. वो कभी भी मूर्खों से बात करने के लिए उनके लेवल तक नहीं जाता. उससे बात करने के लिए आपको अपना लेवल उठाना पड़ता है.


धोनी भागकर जोगिन्दर के पास पहुंचे. उसे आराम से अपना गेम खेलने को कहा. और सच, ये महज़ एक गेम था. बस हालातों ने इसे जंग बना दिया था. और ये जंग किसी को तो जीतनी ही थी. पहली गेंद, फिर से. शॉर्ट ऑफ़ गुड लेंथ. ऑफ स्टंप के बाहर. मिस्बाह बल्ला भी न लगा सका. धोनी की शाबाशी. जोगिन्दर को यही लाइन पकड़े रहने को कहा गया था. वो वैसा ही कर रहा था. बस पांच गेंदें शेष.

दूसरी गेंद. फ़ुल टॉस. यॉर्कर के चक्कर में फुल-टॉस. मिस्बाह को इसी का तो इंतज़ार था. एक भूखे बिल्ले की तरह गेंद पर चोट की. सीधी बाउंड्री के पार. साइट स्क्रीन पर पड़े काले कपड़े पर. मैदान में शोर ही शोर. पाकिस्तानी झंडे आसमान में घुस जाना चाहते थे. आसमान हरा हो जाना चाहता था. जीत के लिए सिर्फ 6 रन. 6 रन जो एक शॉट से बन सकते हैं. जिनके लिए महज़ एक गेंद काफ़ी होती है. यहां 4 गेंदें बची हुई थीं. मिस्बाह स्ट्राइक पर.

करोड़ों हाथ बंध चुके थे. प्रार्थना कर रहे थे. मुसीबत ये थी कि प्रार्थनाएं दोनों मुल्कों की जीत के लिए हो रही थीं. उस दिन भगवान भी अजीब असमंजस में होगा. न जाने उस पर क्या बीत रही होगी. लखनऊ शहर के एक कोने में बने अपार्टमेंट में कुछ छह-सात लोगों के बीच मैं अपना सर नीचे किये कुछ सोच रहा था. सच कहूं तो मैं जीत की आशा छोड़ चुका था.

तीसरी गेंद. जोगिंदर दौड़ा. कमरे में एक गाली गूंजी. जोगिंदर के लिये. मैं उस गाली देने वाले को दोष नहीं देता. न दे सकता हूं. न देना चाहिए. फ़ुल लेंथ की गेंद. स्टंप्स पर. मिस्बाह ने तिरछा शॉट खेला. घुटनों पर बैठकर. पीछे की ओर. गेंद हवा में.  मेरा सर मेरे हाथों में. कमरे में शोर. टीवी पर एक आवाज़ चीखी, “In the air. Sreesanth takes it!”

जब तक मैं सर उठा पाता, मुझपर इस दुनिया का सबसे ईमानदार प्यार उड़ेला जा रहा था. मैं नीचे दबा हुआ था. और बाकी लोग एक पर एक चढ़े हुए थे. मुझे नहीं मालूम कि कब किसी ने हम सबको कोल्डड्रिंक से नहला दिया. हम वर्ल्ड कप जीत गए थे. सौ करोड़ से भी ज़्यादा लोग वर्ल्ड कप जीते थे. ग्यारह नौसिखियों के बूते पर. नौसिखिये इसलिए क्यूंकि इस वर्ल्ड कप में आने से पहले इंडिया की टीम ने मात्र एक टी-20 मैच खेला था. उसके बाद सीधे वर्ल्ड कप. एक नया कप्तान. सभी सवाल उठा रहे थे. उन्हें जवाब मिल चुका था.

मैदान में धोनी नंगे बदन टहल रहा था. उस दिन थालियां पीटने का मन कर रहा था. सड़कों पर लोग थे. उस दिन गले मिलने के लिए लोगों से जान पहचान होने की ज़रुरत नहीं थी. हम सभी एक ही वजह से खुश थे. हमारी ख़ुशी के लिए हमें किसी जात या धर्म का वास्ता नहीं दिया गया था. वजह था एक खेल. सच, एक खेल ही हमें एक कर सकता है. हम सभी को.

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