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हिंदू मुस्लिम भाई-भाई, प्यार के दुश्मन दोनों कसाई

प्रेम में बड़ी ताकत है. प्रेम जो चाहे वो करा दें. क्या-क्या करा दें इस डिटेल में नहीं जाते हैं. इस वक़्त हम उन तमाम रूपकों का ज़िक्र नहीं करेंगे जो प्रेम की महिमा का बखान करने के लिए अक्सर इस्तेमाल होते हैं. ना ही काव्यात्मक लहजे में बताएंगे कि कैसे प्रेम हर आजमाइश पर खरा उतर कर दिखाता है. हम तो बस एक सिंपल फैक्ट बताएंगे कि प्रेम का समर्थन ना सही, लेकिन विरोध ज़रूर दो धुर-विरोधी विचारधाराओं को एक ज़मीन पर ला खड़ा कर सकता है.

बरसों पहले एक फिल्म आई थी ‘दिल’. आमिर ख़ान और माधुरी की. उसका एक गाना याद आता है – ‘हम प्यार करने वाले, दुनिया से ना डरने वाले’. इस गाने की ख़ूबी ये थी कि इसमें हीरो-हीरोइन दोनों के पिता आपसी वैमनस्य भुला कर दोनों को अलग करने के लिए युति (गठबंधन) किए हुए होते हैं. ड्रामैटिक लुक देते हुए, दोनों प्रेमियों को एक-दूसरे से दूर घसीटते हुए उन दोनों में इतनी इत्तेफ़ाकी होती है कि कोई भूल कर यकीन ना करें कि इनकी आपस में दुश्मनी है.

खुद देख लीजिए..

इसी तरह कई बॉलीवुड फिल्मों में हमने देखा कि प्रेम की मुंडी मरोड़ने के लिए दुश्मनों ने हाथ मिला लिए. इंद्र कुमार की ‘इश्क़’ हो या हबीब फैज़ल की ‘इशकज़ादे’, इश्क़ को नेस्तनाबूद करने के लिए विरोधी पार्टियां एक ही मंच पर आईं और उन्होंने फरसे उठा लिए. राजनीति के बाद यही दूसरा क्षेत्र होगा जहां ऐसी अनहोनी की गुंजाइश हो. प्रेम से, प्रेमी जनों से खफ़ा रहने की हमारे भारत में महान परंपरा रही है. और इस मामले में सब में अभूतपूर्व एकमत है. वैलेंटाइन्स डे को ही ले लीजिए. क्या हिंदू, क्या मुस्लिम, तमाम संस्कृति, सभ्यता और शरीयत के पैरोकार इसके खिलाफ़ आग उगलते नज़र आएंगे.

वैसे तो भारत महान में ऐसा दौर चल रहा है कि जनता की अक्सरियत धार्मिक अहंकार से चिपटी हुई नज़र आती है. अपनी-अपनी धार्मिक पहचान पर आत्ममुग्ध होने की रुत उतरी है भारतवर्ष में. दूसरे धर्म की, उनके अनुयायियों की खामियां ढूंढ-ढूंढ कर निकालने में ज़्यादातर वक़्त सर्फ़ हो रहा है लोगों का. लेकिन वैलेंटाइन्स डे ने दोनों धर्मों के खलीफाओं को एक कर दिया. दोनों ही इसके खिलाफ़ ताल ठोकते नज़र आते हैं. जहां एक तरफ ‘मातृ-पितृ पूजन दिवस’ मनाने का आग्रह है तो दूसरी तरफ ये दिन ‘हराम’ होने की चेतावनी! कहीं संस्कृति नष्ट हो रही है तो कहीं पर अल्लाह से नाफ़रमानी हुई जा रही. कुल मिलाकर अखंड मूर्खता का आर्यावर्ती संस्करण जोर-शोर से चल रहा है.

आसाराम बापू जैसे सो कॉल्ड  संतों ने भी इसका निषेध करने का फतवा जारी किया था. फिर उसके बाद बलात्कार के आरोप में जेल चले गए. प्रेम गुनाह है, बलात्कार नहीं. वहीं कई सारे मुस्लिम धर्मगुरु शरीयत की रोशनी में इस दिन को अज़ाब की वजह घोषित करने पर तुले नज़र आते हैं.

एक वीडियो सर्कुलेशन में आया था जिसमें आसाराम बापू आंकड़ों के साथ बताते हैं कि कैसे इस दिन को मनाने भर से स्कूली बच्चियों के प्रेग्नेंट होने की संभावनाओं में शेयर मार्केट से ज़्यादा उछाल आ जाता है. इसके अलावा भी कई सारी ऐसी बातें जो सुनने भर से घिन आए. आसाराम साहब पूरी बेशर्मी से पूछते नज़र आते हैं, “अपनी बच्चियों को गर्भवती करना चाहते क्या? वैलेंटाइन डे मनाकर?” इस बेतुकी, वाहियात बात को भी पूरे भक्तिभाव से सुनने वाला समाज हमारे यहां है, ये हमारा दुर्भाग्य है.

बजरंग दल तो खैर विख्यात है ही अपने वैलेंटाइन्स डे विरोध को लेकर. ओह सॉरी ‘कुख्यात’ है. ‘वैलेंटाइन्स डे’ उनका सालाना त्यौहार है. साल में यही तो एक दिन होता है जब उनको अपनी दुकान चमकाने का मौका मिलता है. साल भर ख़ाली रहते खलिहर लट्ठबाजों का लाठियां भांजने का एनुअल कंपीटिशन करवाया जाता है इस दिन. पार्कों में, गिफ्ट गैलरीज़ में आतंक फैलाने का जैसे ठेका छूटता है. प्रेमी युगलों को घेर कर मारने में, सबके सामने बेइज्जत करने में ही सारी बहादुरी खर्च हो जाती है.  

देखिये इस बेरहमी को जिसके दम पर ये सभ्यता बचाने निकले हैं.

पिछले कुछ सालों से तो इसमें राष्ट्रवादी भी कूद पड़े हैं. पहले उन्होंने 14 फ़रवरी को भगतसिंह, सुखदेव आदि का शहीदी दिवस बताया. इसे जब इस सिंपल फैक्ट से काउंटर किया गया कि वो तो 23 मार्च को होता है, तो वो इसका संशोधित संस्करण ले आए. कहने लगे कि 14 फ़रवरी को उनको फांसी की सज़ा सुनाई गई थी, फांसी बाद में हुई. गूगल के ज़माने में ऐसी हवाई फेंका-फांकी चलनी तो थी नहीं, सो इसे भी सही डेट से काउंटर किया गया. लेकिन संस्कृति-रक्षकों का हौसला डगमगाया हो ऐसा नहीं है. वो आज भी पूरे कॉन्फिडेंस से आपके इनबॉक्स में ये चरस बोए रहते हैं.

अगर आप ये समझ रहे हैं कि सिर्फ एक ही तरफ ऐसा हाल है तो आप गलत हैं. इस्लाम की आसमानी पुकार भी अछूती नहीं है वैलेंटाइन्स डे के आतंक से. फ़रवरी आते ही तमाम ईमान वाले व्हाट्सएप्प ग्रुप में और फेसबुक की दीवारों पर इसके ‘हराम’ होने की घोषणाएं होने लगती है. तमाम शरई हवालों से समझाया जाता है कि इसे मनाना इस्लाम की मुखालफ़त करना है. समझाया क्या जाता है, धमकाया जाता है. अज़ाब नाज़िल होने का डर दिखाया जाता है और ईमान से ख़ारिज होने की पेशनगोई की जाती है.

ये एक वीडियो देखिये जिसमें एक मुस्लिम स्कॉलर बाकायदा ऐतिहासिक रेफरेंस के साथ बता रहे हैं कि कैसे इस दिन को मनाना गलत है. एक फर्जी कहानी सुना कर बताते हैं कि ये दिन बेहयाई का इश्तेहार है. साथ ही सफाई भी देते हैं कि इस्लाम मुहब्बत के खिलाफ़ नहीं है, मुहब्बत के इस तरीके के खिलाफ़ है. जैसे एक दूसरे से मुलाक़ात करना, तोहफे देना कोई गैर-मामूली तरीका हो. एक फूहड़ चुटकुला भी सुनाते हैं कि 14 फ़रवरी वैलेंटाइन्स डे और 14 नवंबर चिल्ड्रेन्स डे में एग्जैक्टली नौ महीनों का अंतर है.

दरअसल इन सबके दिमाग में वैलेंटाइन्स डे को लेकर यही पिक्चर चलती है कि इस दिन तमाम प्रेमी-जनों ने होटल में कमरे बुक कर लिए होते हैं. ‘हरामकारी’ जैसे शब्द ये ऐसे इस्तेमाल करते हैं जैसे शुचिता का, पाकीज़गी का ठेका इन्हीं के नाम खुला हो. इनकी समझ में कभी आएगा ही नहीं कि दो लोग अपनी मर्ज़ी से जो चाहे करें, किसी को उसपर तनक़ीद करने का कोई हक़ नहीं. जब तक वो मुल्क के क़ानून का उल्लंघन नहीं करते, तब तक उनको अपने इस धार्मिक रडार से परे रखें प्लीज़.

तमाम धर्म प्रेम की महिमा का बखान करते नहीं थकते और उसी प्रेम की हड्डी-पसली एक करने के लिए पूरी ताकत झोंक देते हैं. विडंबना की ऐसी पराकाष्ठा हमारे भारत में ही पाई जा सकती है. प्रेम का कोई एक दिन निर्धारित नहीं किया जा सकता ये तर्क कबूल है, लेकिन किसी एक दिन प्रेम का उत्सव मनाने भर से अगर धर्म का जहाज़ डगमगाने लगता है, संस्कृति को मिर्गी के झटके आने लगते हैं तो ऐसी तमाम मान्यताएं दया की पात्र हैं.

काश भारत के दोनों प्रमुख धर्म एक दूसरे से राहत इंदौरी के साहब के अंदाज़ में कुछ यूं गुफ्तगू करें…

आज हम दोंनों को फुरसत है, चलो इश्क करें
इश्क दोंनों की ज़रूरत है, चलो इश्क करें

इसमें नुकसान का खतरा ही नहीं रहता है
ये मुनाफे की तिजारत है, चलो इश्क करे

आप हिंदू, मैं मुसलमान, ये ईसाई, वो सिख
यार छोड़ो ये सियासत है, चलो इश्क करें

हैप्पी वैलेंटाइन्स डे टू ऑल!


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