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RBI की सालाना रिपोर्ट की वो बातें, जो आपको जरूर जाननी चाहिए

कोरोना महामारी को देखते हुए लॉकडाउन लगाया गया. जो जहां था, वहीं रुक गया. इससे अर्थव्यवस्था को नुकसान होगा, ये सभी जानते थे. लेकिन ‘जान है तो जहान है’ वाला लॉजिक दिया गया. हम आपको 17 अप्रैल, 2020 को दिया गया एक बयान याद दिलाना चाहते हैं. बयान देने वाले रिज़र्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास. वो अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के एक अनुमान की बात कर रहे थे. दास ने IMF के हवाले से कहा कि 2021-22 में भारत की जीडीपी ग्रोथ रेट 7.4 फीसदी रहेगी.

दास वी शेप रिकवरी की बात कर रहे थे. वी शेप माने क्या? अंग्रेज़ी का अक्षर V बनाने के लिए एक लाइन अचानक नीचे लाकर ऊपर उठा देते हैं. तो वी शेप रिकवरी का मतलब था कि अर्थव्यवस्था जिस गति से नीचे जाएगी, उसी गति से ऊपर भी उठ जाएगी. और इसमें बहुत लंबा वक्त नहीं लगेगा. 18 अप्रैल को देशभर के अखबारों में ये बयान छपा. दास ने तो ये भी कहा था कि भारत स्लोडाउन से भी पहले की स्थिति में लौट जाएगा. याद कीजिए जब कोविड की मार नहीं पड़ी थी, तब भी लगातार अर्थव्यवस्था के धीमे पड़ने की खबरें थी.

Shaktikanta Das
RBI के गवर्नर शक्तिकांत दास एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में. फोटो क्रेडिट- PTI.

सिर्फ चार महीने में ये आत्मविश्वास धुआं हो चुका है. भारतीय रिज़र्व बैंक ने 26 अगस्त को 2019-20 के लिए अपनी सालाना रिपोर्ट जारी कर दी है. हर साल आरबीआई, भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 53 (2) के तहत अपने कामकाज के संदर्भ में, केंद्र सरकार को केंद्रीय निदेशक मंडल की रिपोर्ट प्रस्तुत करता है. ये रिपोर्ट 1 जुलाई 2019 से 30 जून 2020 की है. इस रिपोर्ट में भारतीय अर्थव्यस्था की सेहत, जीडीपी पर कोरोना का असर, आने वाले समय में भारतीय अर्थव्यस्था की चुनौतियों पर बात की गई है.

खपत प्रभावित 

रिपोर्ट के मुताबिक, सिकुड़ रही अर्थव्यवस्था को कोविड 19 से पहले वाली स्थिति में पहुंचने के लिए काफी वक्त लग सकता है. इस रिपोर्ट के एक वाक्य को आपने तकरीबन हर बड़े अखबार के पहले पन्ने पर छपा देखा होगा- “Shock to consumption is severe”. माने खपत बुरी तरह प्रभावित हुई है. रिपोर्ट उस बात पर भी मुहर लगाती है, जो आम लोग कहते आ रहे थे- इस सब का सबसे बुरा असर गरीब तबके पर पड़ा है. ये सब तब है, जब आरबीआई मार्च से अब तक तकरीबन 10 लाख करोड़ रुपए बाज़ार में डाल चुका है. रेपो रेट, माने वो दर जिस पर बैंक RBI से कर्ज़ लेते हैं, उसमें 1.15 फीसदी की कटौती की गई. ये ऐतिहासिक था. बावजूद इसके हालात काबू में नहीं आ रहे.

सांकेतिक फोटो
सांकेतिक फोटो

लॉकडाउन से परेशानी बढ़ी

RBI की रिपोर्ट पर ‘इंडियन एक्सप्रेस’ अखबार में जॉर्ज मैथ्यू का लेख छपा है. जॉर्ज ने रिपोर्ट के अहम पहलुओं के बारे में बताया है. इस लेख को पढ़ने के बाद अर्थव्यवस्था के ताज़ा हालात और उस पर RBI के रुख को लेकर समझ पैदा होती है. RBI की ये रिपोर्ट जाने-अनजाने में भारत सरकारी की कोविड 19 स्ट्रैटेजी को कठघरे में खड़ा करती है. शक्तिकांत दास जब V शेप्ड रिकवरी की बात कर रहे थे, तब लॉकडाउन को कोरोना संक्रमण से लड़ने का सबसे कारगर तरीका बताया जा रहा था. आम राय यही थी कि लॉकडाउन के बाद संक्रमण कुछ काबू में आएगा. बाज़ार जैसे बंद हुआ, वैसे ही खुलकर सामान्य हो जाएगा. लेकिन न संक्रमण काबू में आया, और न लॉकडाउन पूरी तरह हटा.

कोरोना महामारी को देखते हुए लॉकडाउन लगाया गया. जो जहां था, वहीं रुक गया. (फाइल फोटो)
कोरोना महामारी को देखते हुए लॉकडाउन लगाया गया. जो जहां था, वहीं रुक गया. (फाइल फोटो)

कोरोना के खत्म होने पर बहुत कुछ निर्भर 

अब RBI अपनी रिपोर्ट में कह रहा है कि मई और जून में जब लॉकडाउन में ढील दी गई, तो कुछ सुधार हुआ. लेकिन इस पर जुलाई और अगस्त में रुकावट पैदा हो गई, जब देश के अलग-अलग राज्यों में लॉकडाउन किस्तों में लौटने लगा. ये लॉकडाउन क्यों लौट रहा है, एक अलग ललित निबंध का विषय हो सकता है. लेकिन इतना तय है कि सरकार की कोविड स्ट्रैटेजी अपेक्षित परिणाम लाने में विफल रही है. आरबीआई ने आशंका जताई है कि अर्थव्यवस्था का सिकुड़ना 2021 की दूसरी तिमाही में भी जारी रह सकता है. अब तक सिर्फ पहली तिमाही को लेकर ही अनुमान लगाया गया था.

जीडीपी की गणना हर तिमाही होती है. जीडीपी किसी देश के आर्थिक विकास का सबसे बड़ा पैमाना है.
जीडीपी की गणना हर तिमाही होती है. जीडीपी किसी देश के आर्थिक विकास का सबसे बड़ा पैमाना है.

अर्थव्यवस्था सिकुड़ रही है

GDP जितनी पिछले साल थी, उतनी इस साल न रहे. किसी देश का पूरा उत्पादन और सेवाएं वगैरह से आने वाले पैसे को इकट्ठा करने पर बनता है जीडीपी का आंकड़ा. तो अर्थव्यवस्था के सिकुड़ने का मतलब होगा कि 2020-21 में अर्थव्यवस्था में 2019-20 से कम कमाई होगी. कई रेटिंग एजेंसियां आशंका जता चुकी हैं कि 2020-21 की पहली तिमाही में अर्थव्यवस्ता 20 फीसदी तक सिकुड़ सकती है. माने हम 100 कमाते थे, तो सिर्फ 80 कमा पाएंगे. इससे पहले ऐसा चार बार हो चुका है. 1957-58, 1965-66, 1972-73, 1979-80.

रिकवरी की धीमी रफ्तार पर प्रकाश डालने के लिए RBI ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि किस तरह जून से जुलाई आते आते ई-वे बिल की ग्रोथ रेट कम हुई. ई-वे बिल का पूरा नाम है इलेक्ट्रॉनिक वे बिल. जीएसटी में रजिस्टर्ड व्यापारी जब 50 हज़ार से ज़्यादा मूल्य का सामान एक जगह से दूसरी जगह भेजते हैं, तो जीएसटी पोर्टल से एक ई-वे बिल निकालते हैं. कम ईवे बिल निकाले गए, इसका मतलब कम सामान की सप्लाई हुई. कम व्यापार हुआ.

 जीएसटी में रजिस्टर्ड व्यापारी जब 50 हज़ार से ज़्यादा मूल्य का सामान एक जगह से दूसरी जगह भेजते हैं, तो जीएसटी पोर्टल से एक ईवे बिल निकालते हैं.
जीएसटी में रजिस्टर्ड व्यापारी जब 50 हज़ार से ज़्यादा मूल्य का सामान एक जगह से दूसरी जगह भेजते हैं, तो जीएसटी पोर्टल से एक ईवे बिल निकालते हैं.

RBI ने गूगल मोबिलिटी ट्रेंड का हवाला भी दिया है. गूगल ने कोविड 19 का असर मापने के लिए कम्यूनिटी मोबिलिटी रिपोर्ट जारी करना शुरू किया है. इसमें ये बताया जाता है कि लोग कहां कहां गए. जहां पहले जाते थे, क्या अब भी जा रहे हैं? RBI ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि किराने और मेडिकल स्टोर के आसपास मोबिलिटी लगभग पहले जितनी हो गई है. लेकिन रीटेल, मनोरंजन और यातायात के मामले में ये 40-60 फीसदी कम है. ये बात आपको एक अंदाज़ा देगी, कि किन सेक्टर्स पर कोविड 19 की सबसे ज़्यादा मार पड़ी है. और क्यों?

हॉस्पिटैलिटी पर सबसे ज्यादा असर

सबसे बुरा असर पड़ा है हॉस्पिटैलिटी – माने होटल, रेस्त्रां, रिज़ॉर्ट वगैरह, एयरलाइन्स और टूरिज़म सेक्टर पर. पैसा दो तरह से खर्च किया जाता है -पहला होता है नॉन डिस्क्रीश्नरी स्पेंडिंग. माने ऐसे खर्च, जिन्हें टाला नहीं जा सकता. मिसाल के लिए मकान का किराया, किराना या दवाओं पर खर्च. दूसरा होता है डिस्क्रीश्नरी स्पेंडिंग. माने मनमाफिक किया खर्च. पैसे बचे तो टीवी ले लिया, घूमने चले गए या फिर फिल्म देख ली. आरबीआई की रिपोर्ट साफ कहती है कि हर जगह डिस्क्रीश्नरी स्पेंडिंग कम हुई है. इसका मतलब ये हुआ कि लोगों के पास गुज़ारे भर के पैसे हैं, वो इतने पैसे बचा नहीं पा रहे कि कहीं और खर्च करें. RBI का जुलाई 2020 वाला सर्वे कहता है कि उपभोक्ता का आत्मविश्वास टूट चुका है.

कोरोनो की वजह से लोगों का घर से निकलना कम हुआ है.
कोरोनो की वजह से लोगों का घर से निकलना कम हुआ है.

मोदी सरकार उद्योगों को महामारी से राहत देने के लिए सस्ती दरों पर लोन देना चाहती है. एक दूसरा तरीका होता है टैक्स में छूट देना. जैसे पिछले साल सितंबर में वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने कॉर्पोरेट टैक्स में कटौती की थी. तब इसे 30 फीसदी से 22 फीसदी पर लाया गया था. ये पहले से चल रही कंपनियों के लिए था. नई खुलने वाली कंपनियों के लिए कॉर्पोरेट टैक्स 25 से 15 फीसदी कर दिया गया था. इससे सरकार को 1.45 लाख करोड़ का नुकसान हुआ था. सरकार को लगता था कि इस बचत को कंपनियां बाज़ार में लगाएंगी और इससे अर्थव्यवस्था की सुस्ती कम होगी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. RBI की रिपोर्ट कहती है कि इस छूट का इस्तेमाल कंपनियों ने कर्ज चुकाने और बैंक बैलेंस बनाने में किया. इसका मतलब उद्योगों को छूट देने भर से अर्थव्यवस्था की सुस्ती हटाने का विचार ज़्यादा कारगर नहीं है.

क्या सुझाव दिए हैं RBI ने?

अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए RBI ने टार्गेटेड पब्लिक इंवेस्टमेंट की बात की है. माने सरकार अपनी जेब से पैसा लगाए. इसके लिए ”असेट मॉनेटाइज़ेशन” की बात की गई है. सादी भाषा में अपनी संपत्ति को किराए पर देना या बेच देना. इसके लिए जिन सेक्टर्स को चिह्नित किया गया है, उनके नाम भी सुन लीजिए-

इस्पात (स्टील), कोयला, भूमि, रेलवे, केंद्र तथा राज्यों के बंदरगाह.

एक के बाद एक सरकारी कंपनियां बेची जा रही हैं. फिलहाल कंटेनर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया, शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया, भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड और IDBI बैंक में अपनी हिस्सेदारी बेच रही है.

आरबीआई का एक और सुझाव है. GST काउंसिल की तरह एक संस्था भूमि, श्रम और पावर सेक्टर में भी बना दी जाए. इसके तहत संस्थागत सुधार हों. माने काम करने का तौर तरीका बदले. इसके अलावा सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को तेज़ी से पूरा करे. मिसाल के लिए हाइवे, रेल लाइन, वगैरह. RBI ने ये भी कहा है कि अर्थव्यवस्था तभी पटरी पर लौटेगी, जब डिस्क्रीश्नरी स्पेंडिंग वापस आएगी. लगातार जा रही नौकरियों के बीच ये कैसे होगा, साफ साफ बताना बहुत मुश्किल है.


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