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धोरों पर नाचते-गाते लोक कलाकार राजस्थान की पहचान थे, कोरोना में ये बुरा हाल हुआ

सुमेर सिंह राठौर
सुमेर सिंह राठौड़ 

सुमेर सिंह राठौड़, दी लल्लनटॉप के पुराने साथी. जैसलमेर से आते हैं, तस्वीरों, कविताओं और लिखने में खोए सुमेर ने राजस्थान के लोक कलाकारों की कोरोना के समय में दुर्दशा देखी. कुछ कलाकारों तक पहुंचे बात की और जानकारी हम तक भेजी, जिन्हें हम आपको पढ़ा रहे हैं. उम्मीद है कि हालात अब बेहतर होंगे.

अगर आप जैसलमेर के बारे में इंटरनेट पर ढूंढ़ेगें तो आपको शुरूआती तस्वीरों में रंगीन चमकदार कपड़े पहने धोरों पर मनमोहक नृत्य करती औरतों की तस्वीरें दिखाई देंगी. ये कालबेलिया नृत्य है. जैसलमेर घूमने आने वाले पर्यटकों के सबसे पसंदीदा क्रियाकलापों में से एक यहां का कालबेलिया नृत्य भी होता है. कालबेलिया नृत्य करने वाली औरतें जोगी जनजाति से आती हैं. पर्यटन के सीजन में वे यहां के होटलों व रिजॉर्ट्स में तथा धोरों पर आने वाले पर्यटकों को कालबेलिया नृत्य दिखाकर अपने परिवार का गुजारा करती हैं. बाकी समय उनका गुजारा घर-घर मांगकर खाने से होता हैं. लेकिन दो साल से पर्यटन ठप है. कोविड के कारण वे दूसरे घरों में मांगने जा नहीं सकते हैं. जैसलमेर से पचास किलोमीटर दूर प्रसिद्ध सम को धोरों में अपनी प्रस्तुतियां देने वाली कालबेलिया नृत्यांगना अकलां कहती है “यहां पर हमारे बीस से ज्यादा परिवार रहते थे. हम लोग जैसलमेर की अलग-अलग जगहों से यहां आते हैं काम के लिए. अब हमारे पास कोई काम-धंधा नहीं है. खाने के भी लाले पड़ गए हैं. जिन होटलों या रिजॉर्ट में काम करते थे वे भी पिछले दो साल में ज्यादातर समय बंद ही रहे हैं. वहां से कोई मदद नहीं मिल रही है. सरकार की तरफ से कोई मदद नहीं मिल रही है. और कुछ नहीं तो हमारे लिए राशन की व्यवस्था हो जाए तो वो भी बहुत है. इस वक्त में मांगने के लिए भी घर से बाहर नहीं निकल सकते.”

राजस्थान के लोक कलाकार (तस्वीर: सुमेर सिंह राठौर)
राजस्थान के लोक कलाकार (तस्वीर: सुमेर सिंह राठौड़)

“म्हारे रे बाबोसा रे जाळकड़े
जाळकियां रे लागा मीठा पीलूड़ा मां डइअम डो”
(मेरे घर के पास जो जाळ के पेड़ है उन पर इन दिनों मीठे पीलू उग आए होंगे)
मांड राग में गाए जा रहे गीत डईअम डो की पंक्तियां हैं ये. अपने घर को याद करने का गीत. थार के रेगिस्तान में जाल के पेड़ खूब होते हैं. मई के महीने में जब रेगिस्तान तप रहा होता है उसी वक्त यहां के पेड़ खिल रहे होते हैं. ये दिन इन पेड़ों के फलों से लदने के दिन होते हैं. जालों पर इन दिनों में खूब लाल-पीले पीलू उग आते हैं.

एक छोटा सा कमरा है. एक सत्तर साल की उम्र के बुजुर्ग पचरंगी साफा, सफेद कुर्ता व टेवटा पहने सारंगी बजाते हुए बच्चों को यही डइअम डों गीत सिखा रहे हैं. बच्चे अटकते हैं तो वे फिर से दोहराते हैं सारंगी बजाते हुए. ये बुजुर्ग अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त लोक कलाकार लाखा खान हैं जिन्हें हाल ही में पद्मश्री सम्मान मिला है. जोधपुर शहर से जैसलमेर की ओर चलते हैं तो आगे एक गांव आता है राणेरी इसी गांव में रहते हैं लाखा खान. यहां तक पहुंचने के लिए फलोदी के बाद एक टूटी हुई पतली सी सड़क पार करनी पड़ती है. अगर स्थितियां ठीक होंती तो लाखा खान अभी विदेश में किसी मंच पर अपनी सारंगी की धुनें बिखेर रहे होते. अभी लाखा खान का परिवार बहुत मुश्किल स्थिति में है. लगभग दो सालों से कोरोना व लॉकडाउन की वजह से वे कोई इक्का-दुक्का कार्यक्रम ही कर पाए हैं.

संगीत सिखाते लाखा खान (तस्वीर : सुमेर सिंह राठौर)
संगीत सिखाते लाखा खान (तस्वीर : सुमेर सिंह राठौड़)

लाखा खान के बेटे दाने खान जो खुद भी सारंगी व ढ़ोलक बजाते हैं उनका कहना है “दिसंबर 2020 के बाद से कोई शो नहीं हुआ है. बीच में एक लाइव शो हुआ था जिससे थोड़ी मदद मिली थी. हमारा काफ़ी बड़ा परिवार है. जजमानों के यहां कोविड के कारण जा नहीं सकते. कमाई का और कोई जरिया है नहीं. अस्पताल के चक्कर में भी काफ़ी खर्चा हुआ जिसके कारण कर्जा हो गया है. अभी तक सरकार की तरफ से भी कोई मदद नहीं प्राप्त नहीं हुई है. सरकार और जजमानों से एक ही निवेदन है कि हमारा एरिया बाकी जगहों से कटा हुआ होने के कारण कोई ध्यान नहीं दे पा रहा है अगर हो सके तो हमारी मदद कीजिए इस मुश्किल परिस्थिति से पार पाने में.”

पिछले दो साल से लगातार कोरोना महामारी की वजह से पूरी दुनिया आफत में है. पश्चिमी राजस्थान के जैसलमेर, बाड़मेर व जोधपुर जिलों में रहने वाले ज्यादातर लोक कलाकारों की स्थिति बदतर है. इन जिलों में लोक संगीत व अन्य लोक कलाओं से जुड़ी जातियां मांगणियार, मिरासी, कालबेलिया, भाट व भोपा रहते हैं. इन कलाकारों की जिंदगी शुरू में जजमानी पर आश्रित थी. बाद में स्थितियां बदली तो ये पूरी दुनिया में अपने कार्यक्रम करने लगे. जैसलमेर आने वाले पर्यटकों से भी इन्हें रोजगार मिला. लेकिन दो साल से यहां पर्यटकों का आना बंद है. इसके अलावा स्थानीय स्तर पर शादियां तथा अन्य तरह के कार्यक्रम इनकी कमाई का जरिया थे. लेकिन पिछले दो सालों से लगाकार कोरोना की वजह से न तो कोई फेस्टिवल हो रहा है ना ही किसी और तरह के कार्यक्रम. वैशाख के महीने में अक्षय तृतीया होती है. इन दिनों यहां पर सबसे ज्यादा शादियां होती हैं लेकिन इस बार होने वाली ज्यादातर शादियां लॉकडाउन के कारण रद्द हो गई हैं. अगर छोटे स्तर पर कोई आयोजन हो रहा है तो उनमें जाना भी किसी खतरे से कम नहीं है. कोरोना की इस दूसरी लहर में कई कलाकरों ने अपना जीवन खोया है.

इस महामारी की वजह से कई लोक कलाकरों ने अपनी जान गंवाई है. इनमें से कई ऐसे थे जिनकी वजह से परिवार का पेट पलता था. जैसलमेर से 45 किलोमीटर आगे पूनमनगर गांव के रहने वाले तालब खां की पिछली 10 मई की कोविड की वजह से मौत हो गई. उनकी तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हुई तो प्रशासन ने जिम्मेदारी लेने के बजाय भ्रामक व आधारहीन फोटो बताकर पल्ला झाड़ लिया. उनके भाई ने बताया कि वे करीब तीन घंटे अस्पतालों के चक्कर लगाते रहे और कई मिन्नतों के बाद जब अस्पताल में भर्ती किया गया तब तक काफ़ी देर हो चुकी थी. अगर समय रहते उन्हें अस्पताल में जगह मिलती तो आज वे जिंदा होते. तालब खान के भाई से जब फोन पर बात हुई तो वे फफक-फफक कर रोने लगे. उन्होंने बताया कि लोगों ने चंदा करके उनकी काफी मदद की लेकिन सरकार की तरफ़ से उन्हें किसी भी प्रकार की मदद नहीं मिली.

कई ऐसे संगठन हैं जो इस मुश्किल वक्त में कलाकारों की मदद कर रहे हैं. मदद कर रहे एक संगठन लोकायन संस्थान जो राजस्थान कबीर यात्रा का भी आयोजन करता है उससे जुड़े गोपाल सिंह कहते हैं “पिछले कुछ समय से चल रही इस महामारी के कारण कलाकरों को मिलने वाला हर काम बंद है इसके कारण सारे लोक कलाकार अभी वित्तीय संकट में हैं. लेकिन अब लोक कलाकारों को कुछ और रास्ते भी खोजने होंगे सिर्फ फेस्टिवल्स और टूरिज्म के भरोसे लंबे समय तक सर्वाइव नहीं कर सकते हैं. ये महामारी पता नहीं कितनी लंबी खिंचेगी. कलाकारों को खुद भी और सरकार को भी इनके लिए अब दूसरे विकल्प खोजने होंगे जिससे वे अपना जीवनयापन कर सकें.”

लोक कलाकार कहते हैं कि दूसरों की सहायता से हम कुछ दिन तो निकाल लेंगे लेकिन इस तरह लगातार कैसे जीवनयापन कर पाएंगे और जैसलमेर-बाड़मेर के करीब 150-200 गांवों में हजारों घर हैं सब किसी और के भरोसे कब तक समय निकाल सकते हैं. करीब दो साल से ये कलाकार बस एक ही बाट जोह रहे हैं कि कब यह महामारी खत्म हो और दुनिया इस डर के साये से निकले. फिर से फेस्टिवल और शादियां हों. पर्यटक आएं. उनके कमायचे और मोरचंग की धुनें फिर से फिज़ाओं में घुले. उनकी कला फिर से कद्रदानों तक पहुंचे. वह चक्र जिससे जीवनयापन संभव है. जिससे घर चलता है. जिससे पेट भरता है वो फिर से शुरू हो.

राजस्थान में कला व संस्कृति सचिव मुग्धा सिन्हा से हमने कलाकारों के लिए बनी योजनाओं व उनके लिए बने हुए वेलफेयर फंड के बारे में जानकारी लेने के लिए सवाल भेजे थे लेकिन यह लिखने तक उनका कोई जवाब नहीं आया.

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