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मज़दूरों को घर ले जाने वाली ट्रेन के भाड़े पर अलग-अलग आदेश में अलग-अलग बात क्यों लिखी है?

मज़दूरों, श्रद्धालुओं. छात्रों और देश में तितरबितर होकर फ़ंसे लोगों को उनके घरों तक पहुंचाने वाली श्रमिक स्पेशल ट्रेनें चलने तो लगी हैं, लेकिन इनके भाड़े पर बवाल हो रहा है. कई राज्यों की सरकारें कह रही हैं कि केंद्र इन मज़दूरों की समस्या की ओर ध्यान दे. उनके ट्रेन से सफ़र करने का भाड़ा ख़ुद उठाए. उधर भारतीय रेल का कहना है कि टिकट के दाम का एक हिस्सा केंद्र सरकार उठा रही है, तो बचा हुआ राज्य की सरकार दे. मज़दूरों से टिकट के पैसे नहीं लिये जाएंगे. कांग्रेस कूद पड़ी है. भाजपा बयान दे रही है. और इस कनफ़्यूजन में कई राज्य घर लौटने की जुगत में लगे इन लोगों से ही पैसा ले ले रहे हैं. 

क्या है पूरा मामला?

केंद्र सरकार ने देश के कई हिस्सों में फ़ंसे लोगों को उनके घरों तक पहुंचाने की योजना बनाई रेलवे के साथ मिलकर. ‘श्रमिक स्पेशल’ रेलगाड़ियां प्रकाश में आईं. इन रेलगाड़ियों के चलने की बारी आई तो ख़बरें आने लगीं कि राज्यों ने ट्रेन से मज़दूरों, छात्रों को घर पहुंचाने वास्ते पैसा लिया गया है. ख़बरों के सैम्पल देखिए : 

# केरल के तिरुवनंतपुरम से छतीसगढ़ के हटिया आने के लिए मज़दूरों से पैसे लिए गए. प्रति व्यक्ति लगभग 850 रुपए.

# महाराष्ट्र में मंत्री नितिन राउत ने बताया कि वहां भी मज़दूरों से प्रति व्यक्ति 740-800 रुपये लिए गए. उद्धव ठाकरे से ये आग्रह किया कि इन प्रवासियों के टिकट का ख़र्च भी राज्य सरकार उठाए. 

# राजस्थान से ख़बर आई कि रेलवे ने आख़िरी मौक़े पर प्रवासियों को बिठाने से इनकार कर दिया. आननफ़ानन में पैसे की व्यवस्था की गयी. तब जाकर ट्रेन निकली. 

# बिहार में भी ट्रेन चलने के पहले श्रमिकों से पैसे लिए गए. लेकिन नीतीश कुमार सरकार ने बाद में ऐलान किया कि जिन्होंने टिकट के पैसे चुकाए हैं, उन्हें उनके पैसे राज्य सरकार वापिस करेगी. 

# झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार ने कहा कि वे मज़दूरों से पैसा नहीं लेंगे. 

# कर्नाटक में भाजपा की सरकार है. वहां कांग्रेस के संकटमोचक कहे जाने वाले डीके शिवकुमार ने कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमिटी की ओर से 1 करोड़ रुपए का चेक कर्नाटक सरकार को दिया. कहा कि प्रवासी मज़दूरों के आवागमन का ख़र्च उठाने में कांग्रेस मदद करेगी.

# गुजरात के बारे में ख़बर आई. सूत्रों ने बताया कि किसी NGO से सांठगांठ करके गुजरात सरकार लोगों के रेल टिकटों का भुगतान कर रही है. बाद में ये भी ख़बर चली कि श्रमिकों ने ख़ुद अपने आने-जाने का ख़र्च उठाया.

ऊपर लिखी ख़बरें बानगी भर हैं. आप जब पढ़ते हैं तो एक ‘कंफ़्यूजन’ की महक आती है. लगता है कि रेलवे की नोडल ईकाईयों, राज्य सरकारों, केंद्र सरकार और इसमें बैठे यात्रियों को ये तो पता है कि उन्हें घर जाना है, लेकिन उन्हें ये नहीं पता है कि उन्हें घर ले जाने का ख़र्च कौन देगा. 

जिस समय ये सब कंफ़्यूजन चल रहा था, उसी दिन 4 मई को शाम को पत्रकारों को सम्बोधित करते हुए स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव लव अग्रवाल ने पत्रकारों को जानकारी दी थी,

“केंद्र सरकार या रेलवे ने प्रवासियों से टिकट का पैसा लेने के बारे में कुछ नहीं कहा था. हमने कहा था कि हम टिकट का 85 प्रतिशत मूल्य उठाएंगे. शेष 15 प्रतिशत राज्यों से लिया जाएगा. और ये क़दम इसलिए उठाए गए क्योंकि राज्यों ने ही मांग की थी कि उनके यहां फ़ंसे हुए प्रवासी मज़दूरों को वापिस उनके घर भेजा जाए. एकाध राज्यों को छोड़कर बाक़ी राज्य इस प्रक्रिया में हमारा सहयोग भी कर रहे हैं.”

प्रवास की राजनीति

लेकिन लव अग्रवाल का ये बयान दिन भर चली नूराकुश्ती के बाद आता है. कैसे आता है? जब ये ख़बरें फ़्लैश हो जाती हैं कि कुछ राज्यों ने ट्रेन का भाड़ा चुकाने के लिए श्रमिकों से पैसे लिए, तो कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी का एक ऐलान सामने आता है. साथ में एक पत्र में. कहा जाता है कि देशभर में जो प्रवासी मज़दूर फ़ंसे हुए हैं, उन्हें उनके गंतव्य तक पहुंचाने का ख़र्च कांग्रेस पार्टी वहन करेगी. 

हमला राहुल गांधी ने भी किया. कहा कि प्रधानमंत्री मोदी द्वारा गठित PM CARES में दान के रूप में रेलवे ने 151 करोड़ रुपए दे दिए, लेकिन प्रवासी मज़दूरों के टिकट का ख़र्च रेलवे नहीं उठा पा रही है. भाजपा के संबित पात्रा एक्टिव हो गए. उन्होंने ट्विटर पर ही राहुल गांधी और सोनिया गांधी को आड़े हाथों लिया. गृह मंत्रालय का नोटिफ़िकेशन दिखाया. यहां लिखा था कि प्रवासियों से लिए चली ट्रेन के लिए किसी स्टेशन पर कोई भी पैसा नहीं लिया जाएगा. न ही टिकट की बिक्री होगी.

लेकिन देश के तमाम राज्यों से आ रही ख़बरों की मानें तो यहां थोड़ा पेच है. रेलवे ने कहा है कि टिकट की बिक्री नहीं होगी. लेकिन ये नहीं कहा है कि राज्यों सरकारों को टिकट नहीं बेचे जाएंगे. ख़बर है कि रेलवे स्टेशनों पर टिकट की बिक्री नहीं हो रही, लेकिन एक बार में ट्रेन में सफ़र कर रहे 1200 लोगों के टिकट छापकर राज्य सरकारों को दे दिए जा रहे हैं. रेलवे ने अपने 2 मई के आदेश में साफ़ भी किया कि रेलवे राज्य सरकारों को टिकट छापकर दे देगी, और राज्य सरकारें भाड़ा कलेक्ट करके रेलवे को देंगी.

11c Order
रेलवे ने पुराना नोटिफ़िकेशन, जहां कहा गया कि राज्य सरकारें टिकट का पैसा कलेक्ट करके रेलवे को सौंपेंगी.

अब कहा जा रहा है कि सवाल उठे तो बयान आया कि  रेलवे 85 प्रतिशत का ही ख़र्च उठा रही है, तो शेष राशि की देनदारी राज्यों पर बनती है. इसलिए ये राज्यों की स्थिति और विवेक पर निर्भर है कि वे बचे हुए 15 प्रतिशत का ख़र्च ख़ुद की जेब से देते हैं, या इसलिए श्रमिकों से पैसा लेते हैं. यानी केंद्र सरकार ने अपने हिस्से का हिसाब चुकता कर दिया. राज्यों के हवाले बाक़ी कुछ.

अंतिम बात

राज्यों ने केंद्र सरकार से मांग की है कि केंद्र सरकार श्रमिकों को उनके घरों तक पहुँचाने का पूरा ख़र्च उठाए. तर्क ये कि केंद्र सरकार द्वारा औचक तरीक़े से लगाए गए लॉकडाउन की वजह से लाखों की संख्या में मज़दूर देश के कई हिस्सों में उलझ गए. लेकिन सूत्रों के हवालों से आ रही ख़बरों की मानें तो केंद्र सरकार ने भी राज्यों पर ठीकरा फोड़ा है. कहा है कि राज्य ही चाहते थे कि प्रवासी मज़दूरों को उनके घर भेजा जाए. और सिस्टम में जवाबदेही बनी रहे, इसके लिए ज़रूरी है कि राज्य भी अपने हिस्से का ख़र्च ज़रूर उठाएं.

लेकिन अगर रेलवे 85 प्रतिशत ख़र्च वहन कर रही है, तब भी राज्यों को प्रवासी मज़दूरों से 750-900 रुपयों के बीच पैसे क्यों लेने पड़ रहे हैं? वो भी तब जब सफ़र स्लीपर क्लास का ही है? इसका जवाब कोरोना में है. असल में सोशल डिस्टेंसिग का पालन करने के लिए हर ट्रेन को उसकी क्षमता से आधे पर ही चलाया जा रहा है. साथ ही एक बार यात्रियों को गंतव्य तक पहुंचाने के बाद ट्रेनों को ख़ाली लौटना पड़ रहा है. कहा जा रहा है कि इन ट्रेनों में सफ़र के लिए 30 रुपए सुपरफ़ास्ट के चार्ज के तौर पर जोड़ा जा रहा है. हरेक रन के पहले और बाद में ट्रेनों के हरेक हिस्से को सैनिटायज़ किया जा रहा है. साथ ही यात्रियों को ट्रेन में खाना देने की सुविधा भी है. इस तरह मिलाजलाकर ट्रेन का भाड़ा थोड़ा ज़्यादा की तरफ़ है. और ये भी एक वजह बताई जा रही है कि ट्रेनों का ख़र्च रेलवे अकेले नहीं उठा सकती, राज्य सरकारों के सहयोग की भी ज़रूरत है. 

चर्चा है कि केंद्र ने आदेश पलटकर अपना बचाव कर लिया. ट्रेन तो चल रही है. केंद्र ने भी कहा है कि हमारी तैयारी पूरी है. अब गेंद राज्यों के पाले में है.


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