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चीनी घुसपैठ पर सुब्रमण्यन स्वामी का सवाल राज्यसभा ने 'राष्ट्रहित' के नाम पर क्यों रिजेक्ट कर दिया?

राज्यसभा का शीतकालीन सत्र चल रहा है. सवाल जवाब का सिलसिला जारी है. लेकिन भाजपा नेता और राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यन स्वामी का एक सवाल राज्यसभा में रिजेक्ट कर दिया गया. उन्होंने सवाल पूछना चाहा था कि क्या चीन ने लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा को पार किया था?

आज अपने ट्विटर हैंडल पर स्वामी ने लिखा,

”राज्यसभा सचिवालय ने आज मुझे जानकारी दी कि मेरे सवाल को स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि ये जानकारी राष्ट्रहित से जुड़ी है. ये हास्यास्पद है.”

लोकसभा और राज्यसभा का काम विधायी काम के साथ साथ सरकार की जवाबदेही तय करना भी है. इसीलिए दोनों सदनों में सांसद सरकार से सवाल पूछ सकते हैं. इन सवालों को पहले लोकसभा और राज्यसभा के सचिवालय में देखा जाता है. ताकि फॉर्मेट का ध्यान रखा जा सके. मिसाल के लिए राज्यसभा में रूल 47 से लेकर रूल 50 और  Conduct of Council of States में बताया गया है कि सवालों के माध्यम से कैसी और कितनी जानकारी मांगी जा सकती है.

सचिवालय में इन नियमों के आधार पर सवालों की जांच होती है. अगर सवाल ठीक पाया गया, तब उसे संबंधित मंत्रालय में भेजा जाता है. तब सवाल को कहा जाता है Provisionally Admitted Question. मंत्रालय से जानकारी आने के बाद सचिवालय एक बार फिर सवाल पर गौर करता है. हो सकता है कि सवाल के जवाब की तिथी भी बता दी जाए.

लेकिन कई बार Provisionally Admitted Question को लेकर सरकार सहज नहीं रहती. और इसके अलग-अलग कारण हो सकते हैं. तब सरकार लोकसभा या राज्यसभा के सचिवालय को लिखकर बताती है कि वो क्यों अमुक सवाल का जवाब सदन के पटल पर नहीं रख सकती. अगर सचिवालय को सरकार की बात तकनीकि रूप से सही लगती है तो सवाल ड्रॉप कर दिया जाता है. तब सरकार जवाब नहीं देती.

एक Provisionally Admitted Question को जब ड्रॉप किया जाता है, तो सांसद को इसकी विधिवत सूचना दी जाती है. साथ में एक कारण भी नत्थी होता है. वैसे कई बार सांसद शिकायत करते हैं कि सवाल ड्रॉप करने का कारण स्पष्ट नहीं था. मिसाल के लिए कांग्रेस के राज्यसभा सांसद केसी वेणुगोपाल ने सरकार से पूछा था कि क्या NRI’s को एयरपोर्ट पर प्रताड़ित किया गया या वापिस भेजा गया? और क्या NRI’s को किसान आंदोलन का समर्थन न करने को कहा गया था?

ये भी एक Provisionally Admitted Question था. 2 दिसंबर 2021 को जवाब दिया जाना था. लेकिन प्रश्नों की अंतिम सूचि में इसे जगह नहीं मिली. वेणुगोपाल ने इस मामले में शिकायत की थी कि पहले विधिवत कारण दिया जाता था, लेकिन इस बार सिर्फ मौखिक रूप से बता दिया गया कि सवाल ड्रॉप हुआ है.

इसी तरह मॉनसून सत्र में भाकपा सांसद बिनॉय विस्वम ने पूछा था कि क्या भारत सरकार ने आतंकरोधी कार्रवाई के लिए NSO ग्रुप के साथ कोई एमओयू साइन किया है? इज़रायल की कंपनी NSO ग्रुप पेगसस स्पाइवेयर बनाता है, जिसका इस्तेमाल भारत में कथित रूप से विपक्षी नेताओं और पत्रकारों की अवैध जासूसी के लिए हुआ. ये एक Provisionally Admitted Question था. लेकिन विदेश मंत्रालय ने ये कहते हुए जवाब देने से इनकार कर दिया था, कि ये मामला न्यायलय में विचाराधीन है.

वेणुगोपाल की तरह बिनॉय विस्वम ने भी कहा था कि उन्हें मौखिक रूप से बताया गया कि सवाल ड्रॉप किया जा रहा है. विधिवत जानकारी का इंतज़ार है. दर्शक जानते ही हैं कि मॉनसून सत्र के आखिरी दिन बलवे के आरोप में बिनॉय विस्वम पूरे शीत सत्र के लिए निलंबित कर दिए गए हैं.

खैर, लौटते हैं स्वामी के सवाल पर. ये सवाल लद्दाख में चीन के अतिक्रमण से संबंधित था. इसीलिए संभवतः स्वामी के सवाल के साथ भी यही हुआ कि सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रहित का हवाला देकर सचिवालय से कहा होगा कि इस सवाल को कार्यवाही में शामिल न किया जाए. इसी के बाद स्वामी को बताया गया कि सवाल ड्रॉप किया जा रहा है.

वैसे हमें ठीक-ठीक समझ नहीं आ रहा कि स्वामी ने ये सवाल पूछा क्यों? क्या उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के इस बयान पर गौर नहीं किया? नहीं किया, तो हम आपको बता देते हैं कि पीएम मोदी ने चीन भारत की झड़प के मौके पर कहा था कि हमारी सीमा में कोई नहीं घुसा है.

राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोपरि है. लेकिन क्या राष्ट्रीय सुरक्षा का बहाना बनाकर उस सच को भी नकारा जा सकता है जो सबके सामने है? प्रधानमंत्री की बात पर उनकी ही पार्टी के राज्यसभा सांसद गौर करें न करें.

इसी साल 23 नवंबर को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने वीर नारी बी संतोषी और वीर माता बी मंजुला को 16 बिहार रेजिमेंट के कमान अधिकारी कर्नल बिकुमाला संतोष बाबू का महावीर चक्र (मरणोपरांत) सौंपा. ये कर्नल बी संतोष बाबू की पत्नी और माता हैं. कर्नल बाबू समेत 20 सैनिकों ने ऑपरेशन स्नो लेपर्ड के दौरान 15 जून 2020 को गलवान घाटी से चीनी सेना को खदेड़ते हुए अंतिम बलिदान दिया था.

महावीर चक्र मिलने के दौरान कर्नल बी संतोष बाबू के सम्मान में ये शब्द कहे गए.

ओपरेशन स्नो लेपर्ड के दौरान पूर्वी लड्डाख की गलवान घाटी में कर्नल बी संतोष बाबू को शत्रु का सामना करने के लिए एक चौकी स्थापित करने का चुनौतीपूर्ण कार्य सौंपा गया. उन्होंने एक सशक्त योजना से दुश्मन के द्वारा बाधा उत्पन्न करने के बावजूद अपनी सैन्य टुकड़ी को संगठित किया और इस कार्य को सफलतापूर्वक अंजाम दिया. इस चौकी पर मोर्चा सम्भालते समय उनके सैनिकों को नज़दीकी उंचाई से भारी मात्रा में पत्थर फेंकेने के साथ साथ शत्रु द्वारा नुकीले हथियारों से किए गये आक्रमण का भी कड़ा मुक़ाबला करना पड़ा. भारी संख्या में मौजूद शत्रु सैनिकों की हिंसक और आक्रामक कार्यवाही का मुंह तोड़ जवाब देते हुए इस शूरवीर अधिकारी ने भारतीय सैन्य टुकड़ियों को वापस भेजने के शत्रु के निरंतर प्रयासों को विफल कर दिया.


अगर कोई नहीं घुसा था, या फिर घुसने की जानकारी राज्यसभा में देने से राष्ट्रीय सुरक्षा के हित प्रभावित होते हैं, तो फिर कर्नल बाबू को किस चीज़ के लिए अलंकृत किया गया?

भारत के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और तमाम गणमान्य नागरिकों के सामने कहा गया कि कर्नल बाबू की टुकड़ी एक चौकी स्थापित करने जा रही थी. और इसमें शत्रु द्वारा बाधा उत्पन्न की गई थी. इसके बाद कर्नल बाबू ने अपनी टुकड़ी के साथ प्राण त्यागने तक संघर्ष किया. क्या कर्नल बाबू LAC के पार चौकी स्थापित करने जा रहे थे?

अगर वो अपनी ही ज़मीन पर चौकी स्थापित करने जा रहे थे, तो फिर शत्रु से सामना कैसे हुआ? ज़ाहिर है, शत्रु माने चीनी फौज वास्तविक नियंत्रण रेखा के इस पार आ गई थी. तभी बात इतनी आगे चली गई.

फिर किस आधार पर चीनी अतिक्रमण पर सरकार बगलें झांकती रहती है, सवाल खारिज करवाती रहती है? चीन ने लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा को पार किया या नहीं किया, ये वैसा ही सवाल है, कि भारत में कोरोना महामारी कम्यूनिटी ट्रांसमिशन फेज़ में गई कि नहीं. इस सवाल का अब कोई मतलब नहीं रह गया है. क्योंकि जवाब सबको मालूम है. बस सरकार अपने मुंह से सच कबूल नहीं करेगी.

कोरोना और चीनी अतिक्रमण के समय भारत सरकार ने एलिमेंट ऑफ सरप्राइज़ का बहाना बनाया. कि सबकुछ अचानक हुआ. लेकिन अब जो जानकारी छिपाई जा रही है, वो एक सोची समझी रणनीति है. कि देश को अंधेरे में रखकर जवाबदेही से बचा जा सके.


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