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क़िस्सागोई 25: हर बार हज के बाद मथुरा में कृष्ण दर्शन को जाने वाले मौलाना

लखनऊ में रकाबगंज से मेडिकल कालेज वाले रास्ते पर मौलवी अनवार का बाग़ पड़ता है. मान्यता है कि मानसिक रूप से बीमार लोग यहाँ आकर ठीक हो जाते हैं. मरीजों और खैरख्वाहों की आमदो-रफ्त यहाँ बराबर बनी रहती है. मगर इनमें से कोई नहीं जानता कि यहाँ मज़ार मौलाना हसरत मोहानी का है. जी हाँ, वही ‘चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है’ का शायर. मगर वो सिर्फ शायर नहीं था, हिन्दुस्तानी आज़ादी के सबसे बड़े लड़ाकों में से एक था.

1903 में अलीगढ से बीए करने के तुरंत बाद हसरत ने उर्दू-ए-मुअल्ला नाम का रिसाला शुरू किया. इसमें शुरुआत से ही राजनैतिक लेखों की प्रमुखता रही. 1904 में हसरत ने इसके माध्यम से स्वदेशी का ज़ोरदार समर्थन किया. जब स्वदेशी आन्दोलन का माहोल बनना शुरू ही हुआ था. हसरत ने स्वदेशी को सिर्फ लिखा ही नहीं, इसे जीवन में सख्ती से अपनाया. एक बार एक कडकडाती सर्दी में एक दोस्त के घर रुके. उसने लापरवाही से इन्हें जो कम्बल ओढने को दिया वो इंग्लैंड का बना हुआ था. हसरत ने रात भर सर्दी खाना मंज़ूर किया मगर वो कम्बल नहीं ओढा. इसके बाद अलीगढ में हसरत ने मोहानी स्वदेशी स्टोर शुरू किया जिसमें कम दामों पर हिन्दुस्तान के बने कपडे और कम्बल वगैरह मिलते थे. इसके बाद हसरत जब अलीगढ से कानपुर गए तो वहां भी उन्होंने खिलाफत स्वदेशी स्टोर लिमिटेड स्थापित किया. शिबली नोमानी ने उनसे कहा था- तुम आदमी हो या जिन्न. पहले शायर थे, फिर सियासतदान बने और अब बनिया बन गए हो.

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1907 में हसरत ने उर्दू ए मुअल्ला के ज़रिये सविनय अवज्ञा की बात उठायी. इसके बहुत बाद में 1930 में जब महात्मा गाँधी ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन छेड़ा तो ये माना कि ये रास्ता हसरत का दिखाया है. 1908 में अंग्रेजों के खिलाफ एक लेख लिखने के आरोप में हसरत को गिरफ्तार किया गया. 2 साल कैद और 500 रूपए जुरमाना लगाया गया. जेल में उन्हें एक मन अनाज रोज़ चक्की से पीसना पड़ता था. मगर ये मशक्कत भी हसरत का हौसला न तोड़ सकी. जेल में उन्होंने ये कहते हुए शायरी जारी रखी कि

है मश्क-ए-सुखन जारी, चक्की की अज़ीयत भी, 

एक तुरफा तमाशा है, हसरत की तबीयत भी.   

1909 में सजा काट के जब हसरत रिहा हुए तो उनके तेवर पहले से ज्यादा उग्र थे. उर्दू ए मुअल्ला उन्होंने फिर शुरू किया और एक लेख में पूर्ण स्वराज की हिमायत कर दी..और 1921 में तो उन्होंने कांग्रेस अधिवेशन में बाकायदा इसके लिए प्रस्ताव रखा और बहस की. उस वक़्त तो प्रस्ताव खारिज हो गया. क्यूंकि पूर्ण स्वराज के बारे में उस वक़्त तक कांग्रेस नेतृत्व सोच ही नहीं रहा था. लेकिन आखिरकार 1929 में कांग्रेस ने भी इसको अपनाया.

बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर के साथ हसरत मोहानी
बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर के साथ हसरत मोहानी

हसरत ने ज़िन्दगी मे बहुत बार हज किया. जितनी बार वो हज पे जाते थे, वापस आकर मथुरा वृन्दावन भी जाते थे कृष्ण के दर्शन को. क्योंकि उनके मुताबिक उनका हज इसके बिना मुकम्मल नहीं होता. कृष्ण के भक्त थे मौलाना। कॄष्ण भक्ति की शायरी भी ख़ूब की.

1951 में लखनऊ में हसरत का इंतकाल हुआ. मौलवी अनवार बाग़ स्थित उनके मज़ार पर उन्ही का एक शेर लिखा हुआ है-

जहान-ए-शौक़ में मातम बपा है मर्गे हसरत का

वो वजहे पारसा उसकी, वो इश्क पाकबाज़ उसका

हिमांशु बाजपेयी
हिमांशु बाजपेयी

हिमांशु बाजपेयी. क़िस्सागोई का अगर कहीं जिस्म हो, तो हिमांशु उसकी शक्ल होंगे. बेसबब भटकन की सुतवां नाक, कहन का चौड़ा माथा, चौक यूनिवर्सिटी के पके-पक्के कान और कहानियों से इश्क़ की दो डोरदार आंखें.‘क़िस्सा क़िस्सा लखनउवा’ नाम की मशहूर क़िताब के लेखक हैं. और अब The Lallantop के लिए एक ख़ास सीरीज़ लेकर आए हैं. नाम है ‘क़िस्सागोई With Himanshu Bajpai’. इसमें दुनिया जहान के वो क़िस्से होंगे जो सबके हिस्से नहीं आए. हिमांशु की इस ख़ास सीरीज़ का ये था क़िस्सा नंबर पच्चीस.


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