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क़िस्सागोई 19: जब चंद्रशेखर आज़ाद देश के लिए संन्यासी बनने चले गए थे !

लॉकडाउन के दौरान बहुत से लोगों को आर्थिक दिक़्क़त का सामना करना पड़ रहा है. हर कोई इसी सोच में लगा है कि पैसा कहाँ से आएगा? इस कैफियत से मुझे राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े क्रांतिकारियों की याद आ गयी. काकोरी कांड से पहले का वाकया है. क्रांतिकारी दल रुपये के अभाव में था. हर वक़्त इसी बात की चिंता रहती थी कि पैसा कहां से आएगा. इसी हालत में दल को एक बात पता चली. गाज़ीपुर के समीप गंगा के तट पर उदासीन साधुओं का एक डेरा था जिसकी काफ़ी आय व सम्पत्ति थी. उनमें एक महंत जिनका स्वास्थ्य बिगड़ रहा था तथा वो एक ऐसे लड़के की तलाश में थे जिसको सन्यासी बनाकर मठ की सारी ज़िम्मेवारी सौप दें. उन्होंने क्रांतिकारी रामकृष्ण खत्री से कहा- स्वामी जी आपके सम्पर्क बहुत विशाल हैं. यदि आपको कोई योग्य युवक मिल जाए तो मैं ये गद्दी उसको सौंप दूंगा. मुझे विश्वास है आप ढूंढ ही लेंगे. खत्री जो क्रांतिकारी बनने से पहले साधू थे, उनको ये कहकर भरोसा दिया मैं पूरी कोशिश करूंगा.

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जब बात की गयी तो चंद्रशेखर आज़ाद झट से उस महंत का शिष्य बनने को तैयार हो गए. बोले दल के लिए मैं सब कुछ करने को तैयार हूं, बशर्ते बड़ी रकम हाथ लगे. फिर एक दिन आज़ाद को लेकर खत्री ग़ाज़ीपुर पहुंच गए. आज़ाद मठ में शामिल हो गए.  मगर मठ में कुछ दिनो के बाद आज़ाद को लगने लगा उन्हे पार्टी ने किसी बड़ी मुसीबत में डाल दिया है क्योंकि वहां जाते ही उन्हे पहले गुरुमुखी सीखनी पड़ी. जिस पढ़ाई से वो दूर भागते थी वही फिर उनके गले आ पड़ी. साथ ही जपुजी साहब को याद करना पड़ा. कुछ दिन तो दल के लिए महान त्याग की भावना से वो ये सब करते और सहते रहे परंतु जब असह्य हो गया तो महंत से छिपा कर उन्होने रामकृष्ण खत्री को पत्र लिखा मेरा दिल यहां बिल्कुल नहीं लगता. जल्दी आओ और साथ में मन्मथ को लाकर मुझे यहां से मुक्ति दिलाओ.

प्रयागराज की कंपनी गार्डन में आज़ाद शहीद हुए थे, उनकी पिस्तौल आज भी कंपनी गार्डन म्यूज़ियम में रखी हुई है. पीछे शहादत के दिन की तस्वीर है (तस्वीर इलाहाबाद संग्रहालय साभार)
प्रयागराज की कंपनी गार्डन में आज़ाद शहीद हुए थे, उनकी पिस्तौल आज भी कंपनी गार्डन म्यूज़ियम में रखी हुई है. पीछे शहादत के दिन की तस्वीर है (तस्वीर इलाहाबाद संग्रहालय साभार)

आख़िर खत्री और मन्मथ मठ में आज़ाद से मिलने पहुँचे. महंत जी भी वहां थे. किसी तरह महंत के दूर निकल जाने पर आज़ाद ने इन दोनों से कहा- ये महंत अभी नहीं मरने वाला. डंड पेलता है और खूब दूध पीता है. गुरुमुखी पढ़ते पढ़ते मेरी आंखें फूटी जा रहीं. मैं तो यहां नहीं रहूंगा. आज़ाद को ये भरोसा देकर कि राजेन्द्र लाहिड़ी से मशविरा करने के बाद उन्हे बताया किया जाएगा. ये दोनो शाम की गाड़ी से वापस हो गए. लेकिन लाहिड़ी से विमर्श होने के बाद भी ये लोग किसी फैसले पर नहीं पहुंच सके. बात वहीं रह गयी. कुछ दिनों बाद आज़ाद अचानक बनारस में दल के ठिकाने पर आ गए. बोले मैं क्रांतिकारी ही अच्छा हूँ. मठ में नहीं रहूंगा. सारे लोग उनसे मठ के किस्से सुनकर बहुत हंसते थे.

हिमांशु बाजपेयी
हिमांशु बाजपेयी

हिमांशु बाजपेयी. क़िस्सागोई का अगर कहीं जिस्म हो, तो हिमांशु उसकी शक्ल होंगे. बेसबब भटकन की सुतवां नाक, कहन का चौड़ा माथा, चौक यूनिवर्सिटी के पके-पक्के कान और कहानियों से इश्क़ की दो डोरदार आंखें.‘क़िस्सा क़िस्सा लखनउवा’ नाम की मशहूर क़िताब के लेखक हैं. और अब The Lallantop के लिए एक ख़ास सीरीज़ लेकर आए हैं. नाम है ‘क़िस्सागोई With Himanshu Bajpai’. इसमें दुनिया जहान के वो क़िस्से होंगे जो सबके हिस्से नहीं आए. हिमांशु की इस ख़ास सीरीज़ का ये था क़िस्सा नंबर एक कम बीस, माने उन्नीस.


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