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क़िस्सागोई 23: सनकी नवाब की ज़लालत से कैसे बचीं जद्दनबाई?

क़िस्सा मशहूर तबलानवाज़ अहमद जान थिरकवा साहब का है, जिनका घर नक्ख़ास में बदहाल पड़ा है. अंग्रेज़ों के ज़माने में एक नवाब साहब ने अपने दरबार में मशहूर गायिका जद्दनबाई की महफ़िल रखी. तबले पर संगत के लिए थिरकवा साहब को मदऊ किया. ये नवाब साहब थे तो कला प्रेमी पर ज़रा सनकी क़िस्म के थे. सनक का ये आलम था कि अगर किसी फनकार पर ख़ुश हो गए तो जागीरें लुटा दें और रंग बिगड़ गए तो भरी महफ़िल में रुसवा कर दें. थिरकवा साहब ने इनके बारे में सुन रखा था. सो बड़ी एहतियात के साथ नवाब साहब के यहां  गए. महफ़िल से पहले जब जद्दनबाई उन्हे मिलीं तो उन्होने पूछा- कहिए  बाई, आज क्या सुना रही हैं ? जद्दनबाई ने जवाब दिया- वो चीज़ सुना रही हूं कि नवाब साहब मतवाले हो जाएंगें. थिरकवा साहब ने इश्तेयाक़ के साथ पूछा- कौन सी बन्दिश ?

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जद्दनबाई ने फरमाया- पापी नवाब ! तूने जुलम किए…नइहर मोरा छुड़ाय दियो रे… सुनते ही थिरकवा साहब के हवास फ़ाख़्ता हो गए. जद्दनबाई से बोले- क्यों ज़लील होना चाहती हैं ? जद्दनबाई की समझ ही में नहीं आया कि हुआ क्या. उन्होने बड़ी लगन से ख़ास नवाब साहब के लिए ये बंदिश तैयार की थी. बेचारी ने घबराते हुए थिरकवा साहब से पूछा कि माजरा क्या है ?  तब थिरकवा साहब ने उन्हे नवाब की सनक के बारे में बताया और कहा कि पापी नवाब तूने जुलम किए…को नवाब साहब ख़ुद पर चोट समझ लेगें और उसके बाद हम दोनो का अल्लाह ही मालिक है. जद्दनबाई ने मौक़े की नज़ाक़त भांपते हुए पूछा कि अब क्या किया जाए ? थिरकवा साहब बोले कि कुछ और गा दीजिए. जद्दनबाई बोलीं- नवाब साहब की महफ़िल के लिए मैं पिछले कई रोज़ से इसी बंदिश का रियाज़ कर रही थी. और कोई चीज़ छुई ही नहीं. गाने को तो कुछ भी गा दूं. मगर तैयारी के साथ गाने में और बिना तैयारी के गाने में जो फर्क़ होता है उसे समझने वाले फौरन समझ लेते हैं…और अगर नवाब साहब को गाना न पसंद आया तो ख़ुदा जाने क्या हो. अब थिरकवा साहब सोच में पड़ गए. चंद लम्हों बाद उन्होने जद्दनबाई से कहा- आप बंदिश उसी तरह गाएं जैसे आपने रियाज़ किया था, बस उसके चंद अल्फ़ाज़ बदल दें.

मशहूर तबलानवाज़ अहमद जान थिरकवा
मशहूर तबलानवाज़ अहमद जान थिरकवा

पापी नवाब को मोरे अच्छे नवाब में तब्दील कर दें, तूने जुलम किए की जगह कहें तोरी उमर बढ़े. जद्दनबाई को ये तद्बीर पसंद आयी. महफ़िल में जैसे ही उन्होने गाना शुरू किया- मोरे अच्छे नवाब तोरी उमर बढ़े, नइहर मोरा छुड़ाय दियो रे… नवाब साहब सुनते ही लहकने लगे गोया के बंदिश में उन्ही की तारीफ़ हो रही हो. जद्दनबाई और थिरकवा साहब एक दूसरे की तरफ़ देखकर मुस्कुराए और आंखों ही आंखों में एक-दूसरे से बोले कि तरक़ीब काम कर गयी…और फिर तरकीब के काम कर जाने की मस्ती में मस्त होकर दोनों फ़नकारों ने अपने फ़न का वो मुज़ाहिरा किया कि नवाब साहब ही नहीं वहां मौजूद सभी लोग मतवाले हो गए. महफ़िल के इख़्तेताम पर नवाब ने जद्दनबाई और थिरकवा साहब दोनो की बहुत तारीफ़ की और इनाम-ओ-इक़राम से नवाज़कर वहां से रुख़सत किया. वापसी में जद्दनबाई ने मुस्कुराते हुए थिरकवा साहब से कहा- बचा लिया आपने. जवाब में थिरकवा साहब ने भी अपनी पुरख़ुलूस मुस्कुराहट के साथ सिर्फ इतना कहा- आदाब !!!

बेटी नरगिस के साथ जद्दनबाई
बेटी नरगिस के साथ जद्दनबाई

यही थिरकवा साहब एक बार आकाशवाणी गए अपना चेक लेने. ड्यूटी ऑफिसर जो कि एक मगरूर नौजवान था उसने उनसे चेक रिसीव करने के बाद साइन करने को कहा. थिरकवा साहब पढ़े लिखे नहीं थे. उन्होने ड्यूटी ऑफिसर से कहा कि मैं अगूंठा लगाऊंगा आप इंकपैड मंगवाइए. ये सुनकर वो नौजवान हंस पड़ा. थिरकवा साहब को उसकी ये हंसी अखर गई. उन्होने तेवर कड़े करके पूछा- क्यों हंसे ? वो नौजवान कुछ नहीं बोला. थिरकवा साहब फिर गरजे- मैं अनपढ़ हूं इसलिए हंसे ? वो नौजवान फिर कुछ नहीं बोला. फिर थिरकवा साहब बोले- तुम कितना पढ़े हो. अब उस आदमी ने घमंड भरे लहजे में कहा- मैं ग्रेजुएट हूं. थिरकवा साहब ने तुर्की-ब-तुर्की जवाब दिया- ग्रेजुएट इस मुल्क में हज़ारों हैं, अहमद जान थिरकवा सिर्फ एक है.. ये कहके थिरकवा साहब आगे बढ़ गए और फिर पलट कर बोले- और एक ही रहेगा.

हिमांशु बाजपेयी
हिमांशु बाजपेयी

हिमांशु बाजपेयी. क़िस्सागोई का अगर कहीं जिस्म हो, तो हिमांशु उसकी शक्ल होंगे. बेसबब भटकन की सुतवां नाक, कहन का चौड़ा माथा, चौक यूनिवर्सिटी के पके-पक्के कान और कहानियों से इश्क़ की दो डोरदार आंखें.‘क़िस्सा क़िस्सा लखनउवा’ नाम की मशहूर क़िताब के लेखक हैं. और अब The Lallantop के लिए एक ख़ास सीरीज़ लेकर आए हैं. नाम है ‘क़िस्सागोई With Himanshu Bajpai’. इसमें दुनिया जहान के वो क़िस्से होंगे जो सबके हिस्से नहीं आए. हिमांशु की इस ख़ास सीरीज़ का ये था क़िस्सा नंबर तेईस.


ये क़िस्सा भी सुनते जाइए –

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