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क़िस्सागोई 21: जब क़ुरान पढ़ाने वाले इस हिंदू की कहानी बेहद सुकून देती है

जिस दौर में हर चीज़ हिन्दू मुस्लिम की बहस में शामिल हो. ऐसी बहस में जो मन को अशांत कर दे, उसमे आप एक सुखद किस्सा सुनिए. वाक़या मशहूर फिल्मकार कमाल अमरोही साहब ने अपने एक इंटरव्यू में बयान किया था. कमाल साहब के बम्बई वाले घर के नीचे से रोज़ एक साहब गुज़रते थे. चेहरे पर नूरानी दाढ़ी, बदन पे लखनवी अचकन, सर पे दोपल्ली सजाए रहने वाले ये हज़रत कमाल साहब को देखते ही लखनवी तर्ज़ का आदाब बजा लाते थे. कमाल साहब को इनकी शख़्सियत बड़ी दिलआवेज़ लगती थी. फिर हुआ ये कि कमाल साहब के घर के किसी बच्चे को कुरआन पढ़ानी थी. लिहाज़ा एक अदद मौलवी की तलाश शुरू हुई जो बच्चे को कुरआन पढ़ा सके.  मगर कोई ढंग का आदमी नहीं मिल रहा था. फिर एक दिन कमाल साहब को ये हज़रत मिले. कमाल साहब को ख़याल आया कि ये मुहज़्ज़ब शख़्स हैं, कुरआन पढ़ाने के लिए इनसे बात करके देखी जाए. सो आदाब के बाद कमाल साहब ने अर्ज़ किया कि घर के बच्चे को कुरआन पढ़ानी है. बहुत परेशान हूं कोई मिल नहीं रहा. क्या आप बराय मेहरबानी घर आकर उसे पढ़ा सकते हैं ? वो साहब ख़ुलूस के साथ राज़ी हो गए.

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कमाल साहब ने उनका शुक्रिया अदा किया और बोले आप जो नज़राना चाहें मैं हाज़िर कर दूंगा. इस पर वो साहब बोले कि ये तो कार-ए-सबाब है, नज़राना कैसा. कमाल साहब उनकी ख़ुश-अख़लाक़ी से बेहद मुतासिर हुए. ग़रज़ के अगले ही दिन से वो रोज़ कमाल साहब के घर बच्चे को कुरआन पढ़ाने आने लगे. बेहद संजीदगी और गहराई से पढ़ाते थे वो. कमाल साहब चूंकि ज़्यादातर वक़्त फ़िल्मों में ही मसरूफ़ रहते थे इसलिए उनसे इन साहब की मुलाक़ात कम ही हो पाती थी. आख़िरकार जब कुरआन पढ़ाना मुकम्मल हुआ तो कमाल साहब ने उनसे कहा कि आज बड़ा मौक़ा है इसलिए हम आपकी दावत करना चाहते हैं. आप बताइए कि आपको क्या पसंद है, वही पकेगा. चिकन, मटन, बिरयानी…जो आप चाहें. इस पर वो साहब बोले कि मैं तो शाकाहारी हूं… कमाल साहब को थोड़ी हैरत तो हुई मगर चूंकि खाना पीना एक ज़ाती मामला है लिहाज़ा उन्होने इसपर कोई टिप्पणी नहीं की और शाकाहार की तैयारी होने लगी.

कमाल अमरोही और मीना कुमारी
कमाल अमरोही और मीना कुमारी

फिर कमाल साहब बोले कि मैं माफ़ी चाहता हूं कि अपनी मसरूफ़ियत के चलते आपके साथ इत्मीनान से नहीं बैठ पाया, मगर आपका बहुत बहुत शुक्रिया कि आपने इतनी जिम्मेदारी से बच्चे को कुरआन की तालीम दी. आप घर आते रहिएगा. किसी दिन मैं भी आपके साथ फुर्सत से बैठकर कुछ सीखूंगा. इस पर उन साहब ने शुक्रिया अदा करते हुए फरमाया कि मैं ज़रूर आता मगर मैं कल लखनऊ वापस जा रहा हूं. यहां अपने बेटे के पास आया था जो पास वाली बिल्डिंग में रहता है, मुझे पहले ही जाना था मगर चूंकि बच्चे को कुरआन पढ़ानी थी इसलिए मैं रूक गया. कमाल साहब इस रवादारी पर निसार हो गए. उन्होने पूछा कि आपका बेटे का क्या नाम है, जो हमारे पड़ोस में रहता है ?  जवाब में उन साहब ने कोई हिन्दू नाम बताया जिसे सुनते ही कमाल साहब के तोते उड़ गए. पल भर को उन्हे यक़ीन ही नहीं हुआ. जिसे आज तक वो मुसलमान समझते रहे, जो रोज़ आकर उनके घर के बच्चे को बकायदा कुरआन पढ़ाता रहा वो शख़्स एक हिन्दू है.

शॉट की तैयारी करते कमाल अमरोही
शॉट की तैयारी करते कमाल अमरोही

कमाल साहब ने जवाब में कहा कि मैं अमरोहा के उस ख़ानदान से ताल्लुक रखता हूं जिसमें बड़े बड़े आलिम हुए हैं, मगर मैं आपको नहीं पहचान पाया. यक़ीनन ऐसा हिन्दुस्तान में ही हो सकता है कि एक हिन्दू एक मुसलमान को पूरे वुसूक के साथ कुरआन पढ़ाए…मगर आपने मुझे बताया क्यों नहीं ? इस पर वो साहब बोले कि आपने इतनी अपनाइयत से मुझसे बच्चे को पढ़ाने की इल्तेजा की, फिर मैं पढ़ा भी सकता था सो राज़ी हो गया. उस वक़्त मज़हब का ज़िक्र ग़ैर-ज़रूरी था…इस वाक़ए से कमाल साहब बहुत मुतासिर हुए. यहां तक कि उन्होने 1977 में ‘शंकर-हुसैन’ नाम से एक फ़िल्म भी बनाई जिसका मुख्य किरदार डॉक्टर इन्ही ‘हिन्दू मौलवी’ साहब से प्रेरित था.

हिमांशु बाजपेयी
हिमांशु बाजपेयी

हिमांशु बाजपेयी. क़िस्सागोई का अगर कहीं जिस्म हो, तो हिमांशु उसकी शक्ल होंगे. बेसबब भटकन की सुतवां नाक, कहन का चौड़ा माथा, चौक यूनिवर्सिटी के पके-पक्के कान और कहानियों से इश्क़ की दो डोरदार आंखें.‘क़िस्सा क़िस्सा लखनउवा’ नाम की मशहूर क़िताब के लेखक हैं. और अब The Lallantop के लिए एक ख़ास सीरीज़ लेकर आए हैं. नाम है ‘क़िस्सागोई With Himanshu Bajpai’. इसमें दुनिया जहान के वो क़िस्से होंगे जो सबके हिस्से नहीं आए. हिमांशु की इस ख़ास सीरीज़ का ये था क़िस्सा नंबर इक्कीस.


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