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क़िस्सागोई 28: जब अंग्रेज़ों की फ़ौज लखनऊ में देसी लड़ाकों से गच्चा खा गई

आज किस्सा 1857 की क्रांति के दौरान लड़ी गयी चिनहट की जंग का. आमने सामने की लड़ाई में अंग्रेजों को ऐसी हार पहली बार मिली थी. 1857 आते-आते अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ अलग-अलग वजहों से पूरे देश में गुस्सा था. लखनऊ भी उबल रहा था. देश में क्रांति की शुरुआत हुई तो लखनऊ में मोर्चा संभाला वाजिद अली शाह की बेगम हज़रत महल ने. बेगम ने अपनी वीरता और जज़्बे से इंक़लाब की ऐसी दास्तान लिखी जो हमेशा सुनाई जाएगी. बेगम का साथ दिया अवध के बहुत से तालुकेदारों और आम जनता ने. इन सब की मिली जुली फ़ौज ने अवध में अंग्रेज़ों से टक्कर लेने का इरादा बांध लिया था. लखनऊ में 1857 की क्रांति की पहली बड़ी लड़ाई 30 जून को चिनहट में हुई.

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चीफ़ कमिश्नर हेनरी लॉरेंस को ख़बर मिली कि चिनहट में विद्रोही जमे हुए हैं. वो तकरीबन 700 की फौज और गोला-बारूद लेकर सुबह-सुबह रेज़िडेंसी से चिनहट की तरफ़ बढ़े. उन्होने सोचा था कि विद्रोही ज़्यादा नहीं हैं. वो बड़े आराम से उनको क़ाबू कर लेंगे. मगर इस्माइलगंज पहुंचते ही उनके होश उड़ गए. देखा कि विद्रोही हज़ारों की तादाद में हैं. गोला-बारूद हथियारों और हौसले से भरे हुए. अंग्रेज़ों को संभलने का भी मौक़ा नहीं मिला. सामने आते ही उन पर ज़बरदस्त हमला हुआ. हेनरी लॉरेन्स को यक़ीन ही नहीं हुआ. टक्कर इतनी ज़ोरदार थी कि अंग्रेज़ बाद में पराजित हुए उनका मन पहले ही पराजित हो गया. अंग्रेज़ लगातार गोलियां बरसा रहे थे मगर विद्रोहियों का हौसला कायम था. वो अपनी जगह जमे हुए थे और जवाबी गोलाबारी कर रहे थे. कमांडर बरकत अहमद और घमण्डी सिंह विद्रोहियों को ललकार कर उन्हे सरफ़रोशी पर माइल किए हुए थे.

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम पर जारी डाक टिकट
प्रथम स्वतंत्रता संग्राम पर जारी डाक टिकट

हेनरी लॉरेंस ने भी कोशिश तो बहुत की मगर अंग्रेज़ सिपाही विद्रोहियों के सामने टिक नहीं पा रहे थे. उनकी तादाद भी कम थी, जून की गर्मी में जंग का अभ्यास भी कम था और विद्रोहियों जैसा हौसला वो कहां से लाते. अंग्रेज़ी सेना के छक्के छूट गए और आख़िरकार सारे सिपाही तितर-बितर होकर भागने लगे. काफ़ी सैनिक मर चुके थे. उनके पास गोला-बारूद की भी कमी हो गई थी. लॉरेंस समझ गया कि अब जंग से कोई फ़ायदा नहीं है इसलिए उसने सिपाहियों को पीछे हटने को कहा. भागते हुए अंग्रेज़ सिपाहियों की कई तोपों, बंदूकों और गोला-बारूद पर विद्रोहियों ने क़ब्ज़ा कर लिया. ये सामान आगे चलकर बहुत काम आने वाला था. तहज़ीब के शहर की ये अदा भी देखिए कि अंग्रेज़ी सेना जब विद्रोहियों से हारकर भाग रही थी तो लखनऊ की ग्रामीण जनता ने उनको पीने को पानी दिया.

हिमांशु बाजपेयी
हिमांशु बाजपेयी

हिमांशु बाजपेयी. क़िस्सागोई का अगर कहीं जिस्म हो, तो हिमांशु उसकी शक्ल होंगे. बेसबब भटकन की सुतवां नाक, कहन का चौड़ा माथा, चौक यूनिवर्सिटी के पके-पक्के कान और कहानियों से इश्क़ की दो डोरदार आंखें.‘क़िस्सा क़िस्सा लखनउवा’ नाम की मशहूर क़िताब के लेखक हैं. और अब The Lallantop के लिए एक ख़ास सीरीज़ लेकर आए हैं. नाम है ‘क़िस्सागोई With Himanshu Bajpai’. इसमें दुनिया जहान के वो क़िस्से होंगे जो सबके हिस्से नहीं आए. हिमांशु की इस ख़ास सीरीज़ का ये था क़िस्सा नंबर दो कम तीस, माने अट्ठाईस.


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