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सिर्फ छह साल की उम्र में किससे प्रेरित होकर सिंधु ने उठाया था रैकेट?

प्रेरणा. इंस्पिरेशन या तरग़ीब. कहते हैं कि ये एक शब्द कई जिंदगियां बदलने की ताकत रखता है. दुनिया में तमाम बड़े काम प्रेरित होकर ही किए गए हैं. लोग प्रेरणा पाकर क्या कुछ नहीं कर गुजरते? सही वक्त पर मिली प्रेरणा अक्सर लोगों से इतिहास रचा देती है. टोक्यो 2020 की हमारी स्पेशल सीरीज के फिनाले में आज बात ऐसी ही एक प्रेरणा की, जिसने एक वॉलीबॉल प्लेयर जोड़े की बेटी को बैडमिंटन का सबसे बड़ा सितारा बना दिया.

# कौन हैं PV Sindhu?

बात साल 2001 की है. कई प्रयासों के बाद आखिरकार बैडमिंटन स्टार पुलेला गोपीचंद ने ऑल इंग्लैंड ओपन बैडमिंटन का खिताब जीत ही लिया. इसके साथ ही वह ऐसा करने वाले सिर्फ दूसरे भारतीय बैडमिंटन स्टार भी बन गए. कहते हैं कि उनकी इस जीत ने भारत में हजारों बच्चों को बैडमिंटन में करियर बनाने के लिए प्रेरित किया. इन्हीं बच्चों में से एक थीं छह साल की पूर्सल वेंकट सिंधु.

पहले डॉक्टर बनने का सपना देखने वाली सिंधु के पिता पीवी रमण और मां विजया, दोनों ही नेशनल लेवल के वॉलीबॉल प्लेयर्स रह चुके थे. ऐसे में उनके लिए अपने माता-पिता के रास्ते पर चलना बेहद आसान सा फैसला था. लेकिन उन्होंने बचपन में ही तय कर लिया था कि उनको डॉक्टर बनना है. लेकिन छह साल की उम्र में पुलेला गोपीचंद को ऑल इंग्लैंड चैंपियन बनते देख सिंधु ने अपना फैसला बदला और बैडमिंटन रैकेट उठा लिया.

शुरू में लोकल अकैडमी में ट्रेनिंग करने के बाद सिंधु साल 2005 में पुलेला गोपीचंद के अंडर ट्रेनिंग करने पहुंच गईं. बता दें कि अपने करियर के चरम पर ही गोपीचंद ने छोटे बच्चों को ट्रेन करना शुरू कर दिया था. और फिर जब साल 2008 में गोपीचंद ने अपनी अकैडमी शुरू की, तो सिंधु झट से वहां पहली बैच में पहुंच गईं. जल्दी ही सिंधु ने जूनियर लेवल पर मेडल्स जीतने शुरू कर दिए. सिर्फ 15 की उम्र में उन्होंने 2010 की वर्ल्ड जूनियर चैंपियनशिप के क्वॉर्टर-फाइनल तक का सफर तय किया था.

कॉमनवेल्थ यूथ गेम्स, एशियन जूनियर चैंपियनशिप जैसे इंटरनेशनल इवेंट्स में गोल्ड मेडल समेत कई मेडल्स जीतने के बाद साल 2013 में सिंधु ने खुद को वर्ल्ड लेवल पर अनाउंस कर दिया. इस साल उन्होंने वर्ल्ड चैंपियनशिप का ब्रॉन्ज़ मेडल जीता और यह करने वाली सिर्फ दूसरी भारतीय बन गईं. इस सफलता के बाद तो मानों मेडल्स की बारिश होने लगी. सिंधू घर से इवेंट के लिए निकलतीं तो घरवाले मेडल्स के लिए जगह बनाने लगते. 2011 में लखनऊ से शुरू हुआ ये सिलसिला 2021 तक जारी है.

# खास क्यों हैं Sindhu?

सिंधु भारतीय बैडमिंटन इतिहास की सबसे बड़ी प्लेयर हैं. मुझे लगता है कि पिछले एक साल में सिंधु के लिए यह लाइन हजारों बार लिखी जा चुकी होगी. अपने एक दशक के करियर में सिंधु ने लगभग हर उस इवेंट का मेडल जीता है, जिसके लिए भारतीय बैडमिंटन जगत सालों से इंतजार में था.

फिर चाहे वो ओलंपिक्स हो, वर्ल्ड चैंपियनशिप, कॉमनवेल्थ गेम्स, एशियन गेम्स, एशियन चैंपियनशिप, उबर कप… सिंधु ने हर जगह तिरंगे को शान से लहराया है. वह वर्ल्ड चैंपियनशिप में पांच मेडल जीतने वाली पहली भारतीय और विश्व की सिर्फ दूसरी महिला हैं. वर्ल्ड चैंपियनशिप में सिंधु के नाम एक गोल्ड, दो सिल्वर और दो ब्रॉन्ज़ मेडल्स हैं. हालांकि यहां तक पहुंचना आसान नहीं था और ये सफर ही सिंधु को खास बनाता है.

साल 2016 रियो ओलंपिक्स के फाइनल में मिली हार के बाद से सिंधु इतने फाइनल हार चुकी थीं कि लोग उन्हें सिल्वर सिंधु बुलाने लगे थे. उनकी तुलना सौरव गांगुली की अगुवाई वाली भारतीय क्रिकेट टीम से होती. कहा जाता कि ये फाइनल तक पहुंच गई तो बस, अब टीवी बंद कर दो. क्योंकि वहां तो इसे हारना ही है.

दरअसल 2016 के रियो ओलंपिक्स के फाइनल में सिंधु को स्पैनिश कैरोलिना मारीन ने हराया. फिर 2017 की वर्ल्ड चैंपियनशिप के फाइनल में जापान की नोज़ोमी ओकुहारा जीत गईं. साल 2018 के एशियन गेम्स फाइनल में सिंधु को ताइ ज़ु यिंग ने जबकि इसी साल के कॉमनवेल्थ गेम्स फाइनल में साइना नेहवाल ने हराया. इतना ही नहीं इस साल की वर्ल्ड चैंपियनशिप के फाइनल में भी सिंधु को मारीन से मात मिली थी. फिर आया साल 2019. BWF वर्ल्ड चैंपियनशिप का फाइनल. सिंधु के सामने थीं ओकुहारा. जनता सोच रही थी कि सिंधु ये मैच भी नहीं जीत पाएंगे. लेकिन सिंधु ने सिर्फ 38 मिनट में मैच को 21-7,21-7 से अपने नाम कर लिया. इसके साथ ही वह विमिंस सिंगल्स की वर्ल्ड चैंपियन बन गईं.

सिंधु ने इस बारे में बाद में कहा था,

‘मैं किसी भी कीमत पर वह फाइनल जीतना चाहती थी. मुझे नहीं पता था कि मैं कैसे करूंगी लेकिन मुझे ये बात पता थी कि मुझे ये करना ही है.’

# Sindhu से उम्मीद क्यों?

सिंधु से उम्मीद की सबसे बड़ी वजह है उनका हालिया प्रदर्शन. इस साल सिंधु ने अपने 62.5 परसेंट मैच जीते हैं. वहीं पिछली बार जब उन्होंने ओलंपिक्स सिल्वर जीता था तब 63.89 मैचों में उनके नाम जीत रही थी. हालांकि सिंधु ने पिछली बार की तुलना में इस बार काफी कम मैच खेले हैं. लेकिन कोविड-19 के चलते यही हाल बाकी प्लेयर्स का भी है.

साथ ही सिंधु इस बार वर्ल्ड चैंपियन की हैसियत से ओलंपिक्स में जाएंगी. लगातार दो बार फाइनल में हारने के बाद 2019 में मिली जीत से निश्चित तौर पर उनका आत्मविश्वास काफी बढ़ा होगा. सालों से सिंधु को चुनौती दे रही ओकुहारा को सिंधु ने जिस तरह से हराया था उससे साफ पता चलता है कि अब वो अपनी ताकत का बेहतर इस्तेमाल करना सीख गई हैं.

साथ ही मौजूदा ओलंपिक्स चैंपियन मारीन भी चोट के चलते टोक्यो ओलंपिक्स में नहीं खेलेंगी. ऐसे में परिस्थितियों और फॉर्म को देखते हुए सिंधु से मेडल की उम्मीद करना तो बनता है. हालांकि गोल्ड की राह आसान नहीं रहने वाली. जैसा कि एक बार आर्चर दीपिका कुमारी ने कहा था,

‘सब लोग गोल्ड के लिए लड़ते हैं, सिल्वर और ब्रॉन्ज़ के लिए कोई नहीं लड़ता.

और अगर सिंधु को ये लड़ाई जीतनी है तो उन्हें जापान की अकाने यामागुची, ताइवान की ताइ ज़ु यिंग, चाइना की चेन युफी और हि बिंग जियाओ, ओकुहारा, कोरिया की एन सेयंग, डेनमार्क की मिया ब्लिचफेल्ट और थाईलैंड की रत्चानोक इंतानोन की चुनौती से पार पाना होगा.


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