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सिद्धू और अमरिंदर के झगड़े में क्या पंजाब कांग्रेस ने अपने पैर पर ही कुल्हाड़ी मार ली है?

पंजाब में कांग्रेस को लेकर एक किस्सा चलता है. एक बार कांग्रेस के किसी नेता ने कैप्टन अमरिंदर सिंह को सुझाव दिया कि उन्हें राहुल गांधी को ‘राहुल जी’ कहना चाहिए, जैसा पार्टी के बाकी नेता करते हैं. कैप्टन अमरिंदर को इस सुझाव पर हंसी आई. और उनका जवाब था कि राहुल गांधी के पिता राजीव गांधी स्कूल के दिनों से मेरे दोस्त थे. इसलिए राहुल गांधी को मुझे अंकलजी कहना चाहिए.’

ये किस्सा कितना सच है, कितनी मिलावट है, ये तो हम नहीं जानते. लेकिन कांग्रेस की चेन ऑफ कमांड में कैप्टन अमरिंदर सिंह बिल्कुल अलग दिखते हैं. ऐसे कितने ही वाकये बताए जाते हैं, जब कैप्टन अमरिंदर ने आला कमान या राहुल गांधी के निर्देश ना मानकर अपनी चलाई.

कांग्रेस को करीब से जानने वाले कहते हैं कि 2015 में भी राहुल गांधी कैप्टन अमरिंदर सिंह को पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष बनाने के पक्ष में नहीं थे. लेकिन पंजाब में संगठन पर मजबूत पकड़ से कैप्टन अमरिंदर सिंह ने अपना रास्ता बना लिया. उनकी अगुवाई में 2017 में पंजाब में कांग्रेस ने विधानसभा का चुनाव जीता. कैप्टन अमरिंदर सिंह मुख्यमंत्री बने. मुख्यमंत्री बनने के बाद भी कैप्टन अमरिंदर की हाई कमान के साथ हमेशा एक असहजता दिखती रही. और इस असहजता का फायदा मिला बीजेपी छोड़कर 2017 में ही कांग्रेस में शामिल हुए नेता नवजोत सिंह सिद्धू को.

Amarinder And Rahul
पंजाब के सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह और राहुल गांधी. फाइल फोटो

नवजोत सिंह सिद्धू ने हाई कमान की सिफारिश के साथ डिप्टी सीएम बनने का दावा पेश किया. लेकिन कैप्टन अमरिंदर नहीं माने. कैबिनेट मंत्री बने, लेकिन बाद में वहां से भी इस्तीफा दे दिया. और कैप्टन अमरिंदर के विरोध का मोर्चा संभाल लिया. नवजोत सिंह सिद्धू अपने ही मुख्यमंत्री पर सवाल उठाते हैं, कांग्रेस सरकार के कामों पर सवाल उठाते हैं. उसके बावजूद गांधी परिवार के भरोसेमंद बने रहते हैं. दोनों के झगड़े के दौरान जब कैप्टन अमरिंदर सिंह दिल्ली आते हैं तो गांधी परिवार से मिलने का वक्त नहीं दिया जाता. लेकिन सिद्धू की मुलाकातों वाली तस्वीरें आती हैं. और ऐसा लग रहा है सिद्धू और कैप्टन वाले झगड़ें में एक बार फिर दिल्ली वाली कांग्रेस की हाईकमान का फैसला सिद्धू के पक्ष में जा रहा है.

सिद्धू और कैप्टन अमरिंदर का 4 साल से चल रहा झगड़ा कैसे सुलझाया जाए, इस पर हाईकमान में कई दिनों से माथा पच्ची चल रही थी. एक तीन सदस्यों की कमेटी बनाई गई, सुलह का फॉर्मूला तैयार करने के लिए. फॉर्मूला तैयार भी किया गया. लेकिन अब फॉर्मूला लागू होने की आहट भर से ही पंजाब वाला झगड़ा सुलझने के बजाय और उलझता दिख रहा है. दोनों तरफ से संकेत मिल रहे हैं कि बड़ी तैयारियां के. तैयारी कि अगर फैसला उनके खिलाफ गया तो बगावत कर देंगे.

सुलह का फॉर्मूला क्या तय हुआ है, इस बारे में कांग्रेस का कोई आधिकारिक ऐलान नहीं हुआ. लेकिन गुरुवार से ही मीडिया में एक थ्योरी चल रही है. कि नवजोत सिंह सिद्धू को पंजाब कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया जा सकता है. और अगला विधानसभा चुनाव पंजाब में कांग्रेस नवजोत सिंह सिद्धू की अगुवाई में ही लड़ेगी. आज नवजोत सिंह सिद्धू ने दिल्ली आकर कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात की. सूत्रों के मुताबिक इस मुलाकात के दौरान राहुल गांधी और पंजाब कांग्रेस के प्रभारी हरीश रावत भी मौजूद रहे. तो इस मुलाकात को भी इसी क्रम में देखा गया कि संगठन में सिद्धू को बड़ा रोल मिलेगा. हालांकि पंजाब प्रभारी हरीश रावत ने सिद्धू को अध्यक्ष बनाए जाने वाली अटकलों को सही नहीं बताया.

आज वाली बैठक के बाद क्या कहा उन्होंने, सुनिए –

कौन कहता है. कृपा करके आप मेरे बयान को बहुत केयरफूली पढ़िए जो मैंने कहा और शब्दों को समझिए. जबतक कांग्रेस प्रेसिडेंट बात को क्लियर नहीं करती हैं तब तक मुझे भी इस बात की जानकारी नहीं हो सकती है. उनका लास्ट डिसिजन क्या होने जा रहा है.

सिद्धू की सोनिया गांधी से क्या बात हुई इस बारे में उन्होंने कहा,

कोई स्टेट का लीडर मिलता है, उनके बीच में क्या बातचीत हुई, उसकी जानकारी मुझ तक नहीं पहुंची है. मैं कांग्रेस प्रेसिडेंट को अपना नोट सब्मिट करने आया था और पंजाब के विषय में उनका जो डिसिजन होगा, वो मुझे मिल जाएगा तो सीधे मैं आपके पास आउंगा और उसकी जानकारी दूंगा.

तो अभी कांग्रेस हाईकमान अंतिम ऐलान को कुछ और वक्त देना चाहती है. लेकिन अगर सिद्धू को पंजाब का अध्यक्ष बनाया जाता है तो ये उनके लिए विन विन सिचुएशन है. अध्यक्ष बनाने का मतलब ये है कि कांग्रेस उनकी अगुवाई में अगले साल विधानसभा का चुनाव लड़ेगी. टिकट बंटवारे में उनका बड़ा रोल होगा. और अगर कांग्रेस जीतती है तो फिर सिद्धू मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए बार्गेन करने की मजबूत स्थिति में होंगे. इसकी तैयारी के संकेत भी मिलने लगे हैं. सिद्धू को अध्यक्ष बनाए जाने वाली खबरों के बीच कल सीएम अमरिंदर सिंह ने अपने करीबी 7 नेताओं के साथ बैठक की. इनमें उनके 3 कैबिनेट मंत्री, 2 एमएलए और 2 सांसद शामिल थे. झगड़ों में ऐसी एक्सरसाइज़ अपनी ताकत दिखाने के लिए नेता करते हैं.

पिछले चार साल से सिद्धू को पार्टी में बड़ा पद दिए जाने की चर्चा चल रही है. (फाइल फोटो)
पिछले चार साल से सिद्धू को पार्टी में बड़ा पद दिए जाने की चर्चा चल रही है. (फाइल फोटो)

नवजोत सिंह सिद्धू को प्रदेश अध्यक्ष बनाने का दिलासा तब से ही दिया जा रहा है जब 2019 में उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दिया था. लेकिन सीएम अमरिंदर इस तरह की चर्चाओं में वीटो करते आए हैं. अमरिंदर की दलील ये रही है कि सिद्धू अभी पार्टी में नए हैं, 2017 में ही शामिल हुए, इसलिए किसी सीनियर नेता को पार्टी की कमान देनी चाहिए, दूसरी दलील ये कि मुख्यमंत्री सिख हैं तो पार्टी अध्यक्ष गैर-सिख होना चाहिए.

अब सिद्धू को पार्टी अध्यक्ष बनाने की खबरें आई तो हिंदू वर्सेज़ सिख वाला झगड़ा पंजाब कांग्रेस में बढ़ने लगा है. पंजाब से आने वाले कई हिंदू कांग्रेस नेताओं ने भी परोक्ष या प्रत्यक्ष तौर पर जताना शुरू कर दिया कि सिद्धू उनको स्वीकार नहीं है. एक नाम है मनीष तिवारी का. मनमोहन सिंह की सरकार में मंत्री रहे हैं और अभी पंजाब के आनंदपुर साहिब से कांग्रेस के एमपी हैं. जब सिद्धू को पंजाब कांग्रेस चीफ बनाने की खबर चली तो मनीष तिवारी ने एक ट्वीट किया. इसमें लिखा कि पंजाब में सिखों के वोट 57 फीसदी हैं और हिंदू 38 फीसदी. 32 फीसदी दलित हैं. वोटों के इस गणित का मतलब ये निकाला गया कि मनीष तिवारी भी उस थ्योरी के समर्थक हैं, जिसमें मुख्यमंत्री सिख है तो पार्टी अध्यक्ष गैर-सिख बनाने की बात कही जाती है.

पंजाब के एक और बड़े कांग्रेस नेता पवन दीवान ने भी सवाल उठाए कि कांग्रेस ने पंजाब में हिंदुओं के लिए क्या कर रही है. उन्होंने ट्वीट किया कि पंजाब के मुख्यमंत्री, प्रदेश अध्यक्ष, यूथ कांग्रेस अध्यक्ष, सब तो जट्ट ही हैं. हिंदू कहां हैं.

खबरें हैं कि हिंदू नेताओं की ऐसी आपत्तियों की वजह से ही हाई कमान ने सिद्धू को पार्टी बनाने के फैसले का ऐलान रोक दिया है. फॉर्मूले में सिद्धू को अध्यक्ष और दो हिंदू कांग्रेस नेताओं को कार्यकारी अध्यक्ष बनाने की बात थी. लेकिन मनीष तिवारी और बाकी नेताओं के बयानों के बाद लगता है कि कांग्रेस दोबारा विचार करने के मूड में हैं. जब पंजाब कांग्रेस में डिबेट चल ही रही है तो अकाली दल ने मौका भांपते हुए कह दिया है कि वो सत्ता में आए तो डिप्टी हिंदू होगा. यानी पंजाब में हिंदुओं को रिझाने वाला एजेंडा चुनाव के लिए सेट हो चुका है. और इसमें कांग्रेस नुकसान नहीं उठाना चाहती. शायद इसीलिए नवजोत सिंह सिद्धू पर फैसले के ऐलान में देरी हो रही है.

तो अगर सिद्धू को पार्टी अध्यक्ष नहीं बनाया तो वो क्या करेंगे इसके भी संकेत मिलने लगे हैं. सूत्रों के हवाले वाली खबरें आने लगी हैं कि ऐसा नहीं हुआ तो पंजाब में मास रेजिगनेशन हो सकता है. सिद्धू के कई समर्थक मंत्री पंद या विधायकी से इस्तीफा दे सकते हैं. कल नवजोत सिंह सिद्धू ने भी अपने करीबियों के साथ बैठक की. उनके साथ बैठक में 6 विधायक थे. जिनमें 3 अमरिंदर सिंह के कैबिनेट मंत्री भी शामिल थे.

सिद्धू ने एक मंझे हुए राजनेता की तरह इशारों इशारों में ये संकेत भी दे दिए हैं कि अगर कांग्रेस में उनकी बात नहीं मानी गई तो उनकी राह क्या होगी. सिद्धू ने आम आदमी पार्टी के साथ फ्लर्टिंग शुरू कर दी है. हाल ही में नवजोत सिंह सिद्धू ने ट्विटर पर आम आदमी पार्टी नेता भगवंत मान को जवाब देते हुए उनकी पार्टी के सुर में सुर मिला दिए. नवजोत सिंह सिद्धू ने लिखा कि हमारी विरोधी आम आदमी पार्टी ने हमेशा पंजाब के लिए मेरे काम और मेरी दूरदर्शिता को सराहा है. वो जानते हैं कौन पंजाब के लिए लड़ रहा है.”

यानी सिद्धू भी जता रहे हैं कि उनकी नहीं चली तो कितना नुकसान कांग्रेस को वो कर सकते हैं. उधर आम आदमी पार्टी भी इस झगड़े को टकटकी लगा कर देख रही है. पंजाब में अभी आम आदमी पार्टी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है. कांग्रेस की फूट का सीधा फायदा आम आदमी पार्टी को मिल सकता है. आम आदमी पार्टी सिद्धू को भी पार्टी में शामिल करने के लिए आतुर है. अगर ऐसा होता है तो आम आदमी पार्टी को पंजाब में एक बड़ा चेहरा मिल जाएगा. उधर कैप्टन के खेमे से भी खबर आई कि वो इस्तीफा देने वाले हैं. खबरों के मुताबिक उनके ओएसडी एक लिफाफा लेकर 10 जनपथ यानी सोनिया गांधी के निवास पहुंचे थे. अटकलें लगाई गई कि वो कैप्टन का इस्तीफा लेकर आए हैं. हालांकि कैप्टन की मीडिया प्रभारी की तरफ से इस तरह की बातों को खारिज किया गया.

कुल मिलाकर पंजाब में कांग्रेस का झगड़ा अभी खत्म नहीं हुआ है, बल्कि और तेज़ हो गया है. अगले साल जिन राज्यों में चुनाव हैं वहां पंजाब ही ऐसा राज्य दिखता है जहां कांग्रेस की राह बहुत आसान लगती है. कोई मजबूत विपक्ष नहीं है. लेकिन विपक्ष कांग्रेस के भीतर ही तैयार हो गया है. कांग्रेस के लिए पंजाब में सुलह का रास्ता तलवार की धार जैसा बना हुआ है. अब देखना है कि हाई कमान फॉर्मूले का ऐलान कब करती है.


सिद्धू और कैप्टन अमरिंदर सिंह के झगड़े से अब पंजाब कांग्रेस में बड़ी टूट होने वाली है?

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