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पुलवामा: जन्मदिन के अगले ही दिन जिस जवान की बरसी मनी, उसका परिवार किस हाल में है?

नाम- नसीर अहमद
उम्र- 46 साल
CRPF में ओहदा- हेड कॉन्स्टेबल

14 फरवरी, 2019. जम्मू से श्रीनगर जा रहे CRPF के एक काफिले पर आतंकी हमला हुआ. 40 जवान शहीद हुए. इन 40 में एक नाम नसीर अहमद का भी था.

तस्वीर में हैं नसीर के बड़े भाई सिराजुद्दीन. उनकी गोद में नसीर का छह बरस का बेटा है. सिराजुद्दीन ख़ुद भी जम्मू-कश्मीर पुलिस में नौकरी करते हैं (फोटो: आज तक)
तस्वीर में हैं नसीर के बड़े भाई सिराजुद्दीन. उनकी गोद में नसीर का छह बरस का बेटा है. सिराजुद्दीन ख़ुद भी जम्मू-कश्मीर पुलिस में नौकरी करते हैं (फोटो: आज तक)

शहादत से एक दिन पहले ही जन्मदिन मनाया था
13 फरवरी, 2019. नसीर ने CRPF के अपने साथियों के बीच अपना 46वां जन्मदिन मनाया. अगले रोज़, यानी 14 फरवरी 2019 को CRPF का एक काफिला जम्मू से श्रीनगर के लिए रवाना हुआ. इस काफिले में चल रही एक बस के प्रभारी थे नसीर. काफिले के श्रीनगर पहुंच जाने के बाद उन्हें जल्द ही जम्मू लौट आना था. मगर नसीर का लौटना कभी हुआ ही नहीं. दोपहर बाद करीब तीन बजे काफिला पुलवामा से आगे बढ़ा ही था कि एक आत्मघाती हमलावर ने उनकी बस से अपनी कार भिड़ा दी. अपने 39 साथियों के साथ नसीर भी मारे गए. अब उनका परिवार हर साल उनके जन्मदिन के अगले ही रोज़ उनकी बरसी मनाएगा.

पैसों की किल्लत के कारण 9वीं के बाद पढ़ाई छूट गई
जम्मू के राजौरी जिले में एक गांव है- डोडासन बाला. यहीं के थे नसीर अहमद. चार बरस के थे, जब उनके पिता फक़र दीन चल बसे. छह भाई-बहनों में सबसे छोटे नसीर. पिता के चले जाने के बाद बड़े भाई सिराजउद्दीन ने छोटे-मोटे काम करके परिवार की जिम्मेदारी उठाई. साथ-साथ पढ़ाई भी करते रहे. परिवार की जेब इतनी खाली हुआ करती थी कि कई बार इन बच्चों को अपने दोस्तों से स्कूल की वर्दी उधार लेनी पड़ती थी. नसीर ने सरकारी स्कूल से पढ़ाई की. खेलने में बहुत मन लगता था. हालांकि पैसों की किल्लत के मारे 9वीं के बाद पढ़ाई छूट गई. बड़े भाई सिराजुद्दीन को पुलिस में नौकरी तो मिल गई थी, मगर एक आदमी की कमाई से कितना हो पाता!

फोर्स में नौकरी लगी, तो पूरे गांव को मिठाई खिलाई
साल 1997. 24 साल के नसीर ने CRPF में नौकरी का फॉर्म भरा. नौकरी लग भी गई. मारे खुशी के नसीर ने पूरे गांव में मिठाई बांटी. ‘न्यूज़ क्लिक’ की एक ख़बर में पढ़ा कि जब नसीर ट्रेनिंग के लिए जाने लगे, तो पूरा गांव जमा हुआ. लोगों ने उन्हें तोहफे दिए. गले लगाया. उनकी हिफाजत की दुआएं मांगी.

साल 2008 में नसीर की शादी हुई. बीवी का नाम, शाज़िया कौसर. दो बच्चे हुए इनके. बेटी फलक. बेटा कासिफ. पिता की शहादत के वक़्त फलक आठ और कासिफ छह साल का था. फलक छठी क्लास में पढ़ रही थी और कासिफ तीसरी में.

अभी क्या स्थिति है परिवार की?
‘आज तक’ ने नसीर के बड़े भाई सिराजुद्दीन से बात की. उन्होंने बताया-

केंद्र और राज्य सरकार ने बड़ी मदद की. CRPF ने भी बड़ी सहायता की. मुआवजा भी मिल गया है. कई संगठनों ने भी मदद दी है. अमिताभ बच्चन ने भी हमें 10 लाख रुपये दिए. कुल मिलाकर हमें तीन करोड़ से ज़्यादा की सहायता राशि मिली. बच्चे भी आर्मी स्कूल में पढ़ रहे हैं. 

‘आज तक’ से बात करते हुए नसीर की पत्नी शाज़िया ने भी सरकार की दी मदद से संतुष्टि जताई. फिर बालाकोट एयरस्ट्राइक का ज़िक्र हुआ, तो बोलीं कि सरकार ने सही कार्रवाई की.

नसीर की भांजी, जिसे मिलिटेंट्स ने अगवा करके मार डाला
नसीर की कहानी में और भी ग़मगीन किरदार हैं. जैसे, उनकी बहन शमशीर बेगम. जिनकी शादी BSF के जवान मुहम्मद रफीक से हुई. 2007 में शमशीर और रफीक की 14 बरस की बेटी को मिलिटेंट्स घर से उठाकर ले गए. बाद में पड़ोस के जंगल के अंदर उस बच्ची की लाश मिली. दो और बच्चियों के शव के साथ.


पुलवामा में CRPF पर हुए आतंकवादी हमले में इतने जवान कैसे शहीद हुए?

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