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कोविड वैक्सीनेशन की तुलना पोलियो अभियान से करने वाले इनका अंतर भी जान लें

देश में कोविड-19 वैक्सीनेशन को लेकर सरकार की कई तरह से आलोचना होती रही है. इसके तहत सोशल मीडिया पर कुछ लोग कोविड वैक्सीनेशन की तुलना पोलियो वैक्सीनेशन से करते हुए सरकार की खिंचाई कर रहे हैं. इसमें आम आदमी से लेकर राजनेता शामिल हैं. हाल में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और आरजेडी के प्रमुख लालू यादव ने एक बयान दिया था. इसमें उन्होंने कहा,

1996-97 में जब हम समाजवादियों की देश में जनता दल की सरकार थी, जिसका मैं राष्ट्रीय अध्यक्ष था, उस वक्त आज जैसी सुविधा और जागरूकता भी नहीं थी, फिर भी 7 दिसंबर 1996 को 11.74 करोड़ शिशुओं और 18 जनवरी 1997 को 12.73 करोड़ शिशुओं को पोलियो का टीका (Polio Vaccine) दिया गया था. वो भारत का विश्व रिकॉर्ड था. उस दौर में वैक्सीन के प्रति लोगों में हिचकिचाहट व भ्रांतियां थीं, दुःख होता है कि (आज की) तथाकथित विश्वगुरु सरकार अपने नागरिकों को पैसे लेकर भी टीका उपलब्ध नहीं करा पा रही है.

इस तरह की बातें सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर कई लोग कर रहे हैं. लेकिन क्या ऐसा करना सही है? क्या पल्स पोलियो टीकाकरण अभियान और कोविड-19 टीकाकरण अभियान में कोई अंतर नहीं है? इस रिपोर्ट में हम ये जानने की कोशिश करेंगे कि दोनों टीकाकरण में क्या अंतर था और इनकी तुलना क्यों ठीक नहीं है. पहले बात पोलियो वैक्सीनेशन की.

क्या था पोलियो वैक्सीनेशन?

पोलियो एक संक्रामक रोग है. इसे पोलियोमेलाइटिस के नाम से भी जाना जाता है. मुख्य रूप से इसका वायरस मुंह के जरिए शरीर में प्रवेश करता है. इसके बाद ये वायरस रक्त कोशिकाओं के माध्यम से सेंट्रल नर्वस सिस्टम को हिट करता है. इसके चलते हड्डियों का विकास रुक जाता है और बच्चा अपंग हो जाता है. इसका सबसे अधिक प्रभाव पांच साल तक के बच्चों पर होता है, इसलिए इसे शिशु अंगघात भी कहा जाता है.

पोलियो के टीके या ड्रॉप के जरिए करोड़ों बच्चों को इसका शिकार होने से बचाया गया. लगभग 63 साल पहले 1955 में पोलियो से रक्षा के लिए वैक्सीन की खोज हुई थी. लेकिन भारत में पोलियो को खत्म करने के लिए सबसे पहले पल्स पोलियो प्रतिरक्षण (PPP ) अभियान की शुरुआत 1995 में की गई थी. हालांकि तमिलनाडु ने 1985 में ही रोटरी के सहयोग से ‘पोलियो प्लस’ अभियान की शुरुआत कर दी थी. यहां बता दें कि रोटरी एक अंतरराष्ट्रीय सेवा संगठन है, जो काफी लंबे समय से पोलियो के खिलाफ काम कर रहा है.

इस बीमारी से निपटने के लिए भारत में करीब 23 लाख पोलियो सहायकों की टीम तैयार की गई. 33 हजार निगरानी केंद्र बनाए गए. घर-घर जाकर पांच साल से छोटे बच्चों को पोलियो की ड्रॉप पिलाने का अभियान शुरू किया गया. फिर साल 1997 में नेशनल पोलियो सर्विलांस प्रोजेक्ट (NPSP) की शुरुआत हुई. ये भारत सरकार और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का साझा कार्यक्रम था.

Polio1
Polio1

पोलियो टीकाकरण अभियान अफवाहों से प्रभावित रहा. पुरानी रिपोर्ट्स देखने पर पता चलता है कि उस समय लोग अपने बच्चों को पोलियो ड्रॉप पिलाने से हिचकिचाते थे. उनका मानना था कि ये दवाई उनके बच्चों में नपुंसकता और बांझपन को बढ़ावा देगी. हालांकि तमाम अफवाहों और मुश्किलों के बीच सरकार और अंंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की कोशिशें जारी रहीं.

साल 2004 में WHO की मदद से एक बार फिर ज्यादा बड़े स्तर पर और ज्यादा कुशलता के साथ पल्स पोलियो अभियान शुरू किया गया. इस बार लक्ष्य रखा गया कि 8 करोड़ बच्चों को पोलियो ड्रॉप पिलाई जाएगी. इस अभियान के चलते भारत में पोलियो संक्रमण के मामलों में भारी गिरावट आई. और 2011 आते-आते देश में पोलियो को लगभग खत्म कर दिया गया. उसके बाद भारत में पोलियो का कोई मामला दर्ज नहीं किया गया, इसलिए 2012 में WHO ने भारत को पोलियोग्रस्त देशों की सूची से बाहर कर दिया. इसके दो साल बाद यानी 2014 में भारत को औपचारिक तौर पर पोलियोमुक्त राष्ट्र घोषित कर दिया गया.

Polio (2)
Polio (2)

दुनियाभर में भारत की पोलियो के खिलाफ शुरू हुई मुहिम की तारीफ़ हुई. जब यहां पोलियो का संक्रमण चरम पर था तो इस मुहिम के तहत देशभर में 6.4 लाख पोलियो बूथ बनाए गए थे. साथ ही इस अभियान में करीब 23 लाख लोग काम कर रहे थे. 16 मार्च 1995 को देश में पोलियो की पहली ओरल वैक्सीन दी गई थी. तब से इस दिन को राष्ट्रीय टीकाकरण दिवस के रूप में मनाया जाता रहा है. नेशनल हेल्थ पोर्टल के मुताबिक, हर नेशनल वैक्सीनेशन डे पर 5 साल की उम्र तक के करीब 17.2 करोड़ बच्चों को इम्यूनाइज किया जाता था. इसके लिए नेशनल और सब-नेशनल इम्यूनाइजेशन राउंड्स के तहत कर्मचारियों ने करोड़ों घरों को कवर किया और बच्चों को पोलियो ड्रॉप दी.

कोविड और पोलियो वैक्सीनेशन में कितना अंतर है?

कोविड-19 भी एक संक्रामक बीमारी है, जो सार्स-सीओवी-2 नाम के कोरोना वायरस के कारण होती है. इस विषाणु का वजूद कितना पुराना है, इस बारे में कोई पुख्ता दावा नहीं है. दुनिया ने इसके बारे में डेढ़ साल पहले ही जाना है. इतने कम समय में ही इसने करोड़ों लोगों को अपनी चपेट में लिया है और लाखों की जान ले ली है.

पोलियो की तरह कोविड-19 के खिलाफ भी दुनियाभर में वैक्सीनेशन प्रोग्राम चलाए जा रहे हैं. इनमें सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान भारत में ही चल रहा है. लेकिन इस ड्राइव में कई तरह की समस्याएं देखने को मिल रही हैं. सबसे बड़ी दिक्कत वैक्सीन की कमी है. केंद्र और राज्य सरकारों के पास वैक्सीन उतनी मात्रा में नहीं है कि लोगों को आसानी से लगाई जा सके.

दरअसल, पोलियो के समय विकसित देशों ने अपने लोगों को पहले ही वैक्सीनेट कर लिया था. इसलिए वैक्सीन राष्ट्रवाद कोई मुद्दा नहीं था. लेकिन कोविड-19 संकट के खिलाफ लड़ाई में वैक्सीन राष्ट्रवाद एक बड़ी समस्या बनकर सामने आया है. जब कोई देश अपने नागरिकों/निवासियों के लिए बड़ी मात्रा में वैक्सीन डोज सुरक्षित करने का प्रबंधन करता है और दूसरे देशों में इसके उपलब्ध होने से पहले ही अपने घरेलू बाज़ारों में रिज़र्व करने को प्राथमिकता देता है, तो इसे ‘वैक्सीन राष्ट्रवाद’ कहा जाता है. ऐसा किसी सरकार और एक वैक्सीन निर्माता के बीच पहले ही हो चुके खरीद समझौतों के ज़रिए किया जाता है.

कोविड संकट में विकसित और अमीर देशों ने कोरोना टीकों के बड़े-बड़े स्टॉक पहले ही अपने नागरिकों के लिए बुक कर लिए. इस कारण करोड़ों डोज उन देशों तक नहीं पहुंच रही हैं, जिन्हें इनकी उतनी ही जरूरत है, जितनी की विकसित देशों को. आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण कई देश अपने नागरिकों के लिए पर्याप्त मात्रा में वैक्सीन की उपलब्धता सुनिश्चित नहीं कर सके हैं. वहीं, WHO भी अपने अंतरराष्ट्रीय अभियान कोवैक्स के जरिए गरीब देशों को कोरोना के टीके नहीं उपलब्ध करा पा रहा है.

Vaccine New
पहले वैक्सीन लग चुकी है और उससे एलर्जी हो चुकी है तो वहां स्टाफ़ को ज़रूर बताएं

एक अंतर ये भी है कि पोलियो की तरह कोविड वैक्सीन को घर-घर जाकर नहीं लगाया जा सकता. इसके अपने अलग कारण हैं. एक तो ये कि पोलियो की डोज आशा वर्कर भी पिला देती थीं, लेकिन वैक्सीन का इंजेक्शन लगाने के लिए प्रशिक्षित नर्स और डॉक्टर की जरूरत पड़ रही है. क्या लोगों को ये स्वीकार्य होगा कि आशा जैसे सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता उन्हें वैक्सीन लगाएं?

दूसरा, जानकार घर पर इंजेक्शन लगाने को जोखिम भरा बताते हैं. उनके मुताबिक, वैक्सीन देने के बाद व्यक्ति को कम से कम 30 मिनट तक निगरानी के लिए रखा जाता है. कोविड-19 का टीका लगाने वाली टीम हरेक घर के लिए इतना समय नहीं दे पाएगी.

एक्सपर्ट का क्या कहना है?

पोलियो और कोविड-19 को लेकर चलाए गए टीकाकरण अभियानों के अंतर को समझने के लिए हमने विशेषज्ञों से भी बात की. वैक्सीन एक्सपर्ट डॉक्टर विपिन वशिष्ट ने हमें बताया,

पोलियो वैक्सीनेशन और कोविड वैक्शीनेशन में बहुत फर्क है. पोलियो का ओरल वैक्सीन था. मुंह से दिया जाता था, 0 से लेकर पांच साल तक के बच्चों को. दोनों वैक्सीनेशन ड्राइव को देखें तो जनसंख्या के मामले में बहुत ज्यादा अंतर है. कोविड में जिन्हें वैक्सीन देनी है उनकी संख्या बहुत ज्यादा है. पोलियो में कम थी. पोलियो की वैक्सीन शुरू होकर लंबे समय तक चली. कुछ जगहों पर अभी भी चल रही है. पोलियो को पूरी तरह खत्म करने में 26 साल लगे. जबकि उस समय जनसंख्या कम थी. हालांकि ऐसा नहीं है कि उस समय कोई समस्या नहीं आई. 20 साल से ज्यादा समय तक वैक्सीनेशन करना पड़ा, जबकि कोविड की बात करें तो ये पहला साल ही है. तो दोनों वैक्सीन की तुलना कैसे कर सकते हैं?

डॉक्टर विपिन का कहना है कि पोलियो की वैक्सीन में भी कोल्ड चेन होती है. ये वैक्सीन लिक्विड वैक्सीन थी और ज्यादा समय तक रखी जा सकती थी. एक बार शीशी खोलने के बाद उसे खत्म करना होता था, लेकिन अगर खत्म नहीं हुई तो उसी तापमान पर उसे रखा जा सकता था. यानी वैक्सीन खराब नहीं होती थी. लेकिन कोविड की वैक्सीन के मामले में ऐसा नहीं है. इसे डिजॉल्व करके बनाना पड़ता है और खुलने के बाद ये केवल चार घंटे तक ही सही रहती है.

हमने डॉक्टर विपिन से पूछा कि पोलियो वैक्सीनेशन में अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने कितनी मदद की थी. इस पर उन्होंने बताया,

पोलियो वैक्सीनेशन में WHO जैसी संस्थाओं की जबरदस्त भूमिका थी. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इससे निपटने के लिए ग्लोबल पोलियो इरैडिक्शन इनीशिएटिव (GPEI) की शुरुआत की थी. स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए ये सबसे बड़ी निजी-सरकारी पार्टनरशिप थी. CDC, रोटरी, बिल गेट्स फाउंडेशन इन सबका सहयोग था. लेकिन कोविड नई बीमारी है. इसमें सबको अपना-अपना ही लगा हुआ है. अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा जैसे धनी देशों ने अपनी आवश्यकता से ज्यादा वैक्सीन जमा करके रख ली है.

डॉ. वशिष्ट ने बताया कि इस समस्या पर WHO ने कुछ करना चाहा, लेकिन ये संस्था बहुत अलग-थलग पड़ गई. हालांकि कुछ हद तक WHO की नीतियां भी जिम्मेदार हैं. डॉ. वशिष्ट के मुताबिक, कोरोना संकट के दौरान WHO ‘प्रो चाइना’ रहा है. इसकी वजह से WHO की रेपोटेशन बहुत डाउन हुई. वैक्सीन एक्सपर्ट ने कहा,

इस कारण पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आर्थिक सहायता देनी बंद कर दी. WHO की कुछ हरकतें ऐसी रहीं कि उसने अपने आप सिचुएशन को अंडरमाइन कर लिया. हालांकि उसने हेल्प करने की कोशिश की. कोवैक्स बनाया. गरीब देशों की वैक्सीन की जरूरतों को पूरा करने के लिए एक पूल बनाने का काम किया. इसके तहत लाखों वैक्सीन अपने हिसाब से गरीब देशों को बांटनी थीं, लेकिन धनी देशों ने सपोर्ट नहीं किया.

वहीं, पब्लिक पॉलिसी एक्सपर्ट विक्रमादित्य चौधरी का कहना है,

पोलियो वैक्सीन की जहां तक बात है तो वो एक विशेष ग्रुप को लगनी थी. इसे बच्चों को दिया जाना था, जिनकी संख्या कम थी. कोल्ड चेन की दिक्कत नहीं थी. वैक्सीन को मुंह के जरिए देना था. उसमें किसी को ऑब्जर्वेशन में नहीं रखना था. आंगनबाड़ी और आशा कार्यकर्ता भी पोलियो की वैक्सीन को आसानी से दे सकते थे. लेकिन कोविड की वैक्सीन के साथ ऐसा नहीं है.

विक्रमादित्य ने ये भी कहा कि जो मौजूदा हेल्थ नेटवर्क है, उसी को कोविड वैक्सीन देने में यूज किया जा सकता है. उन्होंने कहा,

लेकिन पहले वैक्सीन हो तो बात बने. कुछ समय बाद जब हमारे पास वैक्सीन होगी और गांवों तक नहीं पहुंच पाएगी तब हम बात कर सकते हैं कि पोलियो वैक्सीन का मॉडल यूज करिए और लोगों तक पहुंचिए. अभी तो जो ऑनलाइन कर रहे हैं उन्हीं को नहीं मिल रही है. अभी तो सबसे बड़ी समस्या वैक्सीन की उपलब्धता की है. तुलना बिल्कुल ठीक नहीं है. जो लोग तुलना कर रहे हैं वो समझ नहीं पा रहे हैं कि क्यों ये सही नहीं है. जो लोग इस अंतर को समझते हैं वो तुलना नहीं करेंगे.


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