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लॉकडाउन को लेकर अब मकान मालिक रेंट एग्रीमेंट में कौन-सा नया क्लॉज़ डलवा रहे हैं?

कोरोना वायरस की वजह से 25 मार्च से देश में लॉकडाउन लगा. दो-ढाई महीने तक सब कुछ बंद रहा. दुकानें, मॉल, ऑफिस. जब सब बंद हुआ, तो कई लोगों की आमदनी रुक गई. दुकानें बंद होने से दुकानदारों की. ऑफिस बंद होने से नौकरी-पेशा लोगों को सैलरी नहीं मिली. शहरों में नौकरी करने वाले अधिकांश लोग किराये के मकानों में रहते हैं. दुकानें किराये पर चलती हैं. छोटे से लेकर बड़े ऑफिस भी किराए के मकानों में ही चलते हैं. ऐसे में लॉकडाउन के बीच समस्या आई किराये के भुगतान की. कुछ सरकारों ने मकान मालिकों से अपील की. कहा कि किरायेदारों से तीन महीने का किराया फिलहाल न लें. बाद में भले ही ले सकते हैं.

अब कुछ ऐसी खबरें आई हैं कि मकान मालिक रेंट एग्रीमेंट में नया क्लॉज़ डलवा रहे हैं. अगर भविष्य में कभी किसी वजह से लॉकडाउन हुआ तो क्या करेंगे? इस तरह के रेंट एग्रीमेंट में किरायेदार को कम से कम कितना रेंट देना होगा? क्या किराये में छूट दी जा सकती है? क्या किराये को कुछ समय के लिए टाला जा सकता है, इसका जिक्र है. इस तरह के नए रेंट एग्रीमेंट के क्या मायने हैं. इस एग्रीमेंट की जुडिशियल वैलिडिटी क्या होगी, इस स्टोरी में हम इसी पर बात करेंगे.

रेंट एग्रीमेंट होता क्या है

दो लोग कानूनी तौर पर वैलिड किसी चीज के लिए समझौता करते हैं, तो इसे एग्रीमेंट कहते हैं. रेंट एग्रीमेंट प्रॉपर्टी ऑनर और किरायेदार के बीच लिखित समझौता होता है. इसमें प्रॉपर्टी से जुड़े सभी टर्म्स एंड कंडिशंस लिखे होते हैं. जैसे प्रॉपर्टी का एड्रेस, टाइप, साइज. मंथली रेंट. सिक्योरिटी डिपॉजिट. प्रॉपर्टी किस पर्पस के लिए रेंट पर दी जा रही है. एग्रीमेंट का ड्यूरेशन क्या है. इन सभी टर्म्स एंड कंडिशंस पर लिखित में सबकुछ होता है, जिस पर दोनों पक्ष सहमत होते हैं.

Rent Paper
रेंट एग्रीमेंट की प्रतीकात्मक तस्वीर.

क्या रेंट एग्रीमेंट 11 महीने का ही होता है

ज्यादातर लोग 11 महीने का ही रेंट एग्रीमेंट बनवाते हैं. इससे ज्यादा समय का रेंट एग्रीमेंट बनवाने के लिए उसकी रजिस्ट्री करानी होती है. रजिस्ट्रेशन फीस देना होता है. जितना रेंट है, उसका दो प्रतिशत स्टैंप ड्यूटी देनी होती है. ये सारे खर्चे बचाने के लिए लोग 11 महीने का एग्रीमेंट बनवाते हैं. 11 महीने वाले रेंट एग्रीमेंट एड्रेस प्रूफ के तौर पर वैलिड नहीं होते. लेकिन रजिस्ट्री वाले रेंट एग्रीमेंट एक वैलिड डॉक्यूमेंट के तौर काम करते हैं, क्योंकि ये डॉक्यूमेंटेड होता है. ऑफिस, दुकान, जैसी कमर्शियल प्रॉपर्टी के मामले में रजिस्ट्री वाला एग्रीमेंट ही बनता है.

Coronavirus Lockdown: Patna
तस्वीर लॉकडाउन के समय की है. टाइम पास करने के लिए लोग अपने घर में लूडो खेल रहे हैं.

सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस कर रहीं वकील विजया लक्ष्मी का कहना है कि अगर दो लोग आपसी सहमति से कोई एग्रीमेंट बना रहे हैं, उदाहरण के लिए अगर भविष्य में लॉकडाउन लगता है, तो कम से कम किराया क्या होगा, ये दो लोगों के बीच का समझौता है. इस बात पर दोनों पक्ष सहमत हैं, तभी साइन कर रहे हैं. अगर कुछ ऐसा होता है, तो दोनों पक्ष उस चीज के लिए रिलाइबल हैं.

एग्रीमेंट की शर्तों को कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती?

विजया लक्ष्मी बताती हैं कि बिल्कुल चुनौती दी जा सकती है. अगर कोई कॉन्ट्रैक्ट एक पार्टी को ही ज्यादा फेवर कर रहा है, दूसरे पक्ष के पास कोई विकल्प नहीं है, क्योंकि हर कोई यही कर रहा है, तो ऐसे में एग्रीमेंट साइन करना मजबूरी है. लेकिन भविष्य में इसे चुनौती दी जा सकती है. मान लीजिए कि प्रॉपर्टी ऑनर अपने फेवर में क्लॉज जोड़ता जाए, तो यह बायस्ड कॉन्ट्रैक्ट होगा. अगर ये लगे कि एक पक्ष पर अत्याचार हो रहा है, तो इसे चैलेंज किया जा सकता है.

हाल ही में दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा था कि राजधानी के किरायेदारों को लॉकडाउन की अवधि का किराया देना होगा. हालांकि दोनों पक्षों की सहमति से कुछ छूट दी जा सकती है.

(सुप्रीम कोर्ट की सांकेतिक तस्वीर: AP)
(सुप्रीम कोर्ट की सांकेतिक तस्वीर: AP)

पवन पाठक प्रकाश बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने किराये पर छूट के लिए याचिका (किरायेदारों की) को खारिज कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किराये के भुगतान से इनकार नहीं किया जा सकता है और ऐसी संपत्ति का किराया देना अनिवार्य है, जिसमें वे रह रहे हैं.

इंडियन कॉन्ट्रैक्ट एक्ट 1872 क्या कहता है?

दिल्ली के तीस हज़ारी कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले एडवोकेट अभिषेक असवाल का कहना है कि इंडियन कॉन्ट्रैक्ट एक्ट 1872. एक्ट की धारा 2(c) के तहत कानून द्वारा लागू नहीं किए जाने वाले समझौते को ‘शून्य’ कहा जाता है. यानी इसकी क़ानूनी मान्यता नहीं होती है. कानून के अनुसार अगर दोनों पक्ष आपसी सहमति से कानून के दायरे में रह कर करार करते हैं, तो उसे क़ानूनी रूप से संरक्षण प्राप्त है.

उनका कहना है कि अगर एग्रीमेंट में लिखी हुई बातें निश्चित और साफ-साफ लिखी हुई हैं, तो उस एग्रीमेंट को वैलिड एग्रीमेंट माना जाएगा. दूसरी ओर अगर एग्रीमेंट में कुछ बातें ऐसी लिखी गई हैं, जो क़ानूनी रूप से स्वीकार्य नहीं हैं या बातों को साफ-साफ नहीं लिखा गया या लिखी गई बातों में अनिश्चितता है, तो उसे कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है.

कुल मिलाकर, बात ये है कि रेंट एग्रीमेंट प्रॉपर्टी ऑनर और किरायेदार के बीच एक समझौता है, जिसे दोनों पक्षों को मानना होता है. अगर किसी पक्ष को कोई समस्या है, तो वह कोर्ट जा सकता है. नए रेंट एग्रीमेंट में भविष्य में लॉकडाउन या ऐसी ही किसी चीज के लागू होने पर जो चीजें तय हो रही हैं, उसे किरायेदार को मानना होगा. किसी तरह का विवाद होने पर कोर्ट जाया जा सकता है. हालांकि हाल ही में चाहे दिल्ली हाईकोर्ट हो या सुप्रीम कोर्ट, दोनों ने ही कहा है कि लॉकडाउन के दौरान का किराया तो देना ही होगा.


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