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प्रोजेक्ट 75-I: अडाणी नहीं, ये कंपनियां बनाएंगी भारत के लिए पनडुब्बियां

इस खबर में बात राष्ट्रीय सुरक्षा की होगी. भारत सरकार ने नौसेना के लिए 6 पनडुब्बियां बनाने के काम को एक कदम और आगे बढ़ा दिया है. इस प्रोजेक्ट का नाम है प्रोजेक्ट 75 I या प्रोजेक्ट 75 इंडिया. इसका नाम आपने तब सुना होगा जब सितंबर, 2019 में खबरें आई थीं कि इस प्रोजेक्ट के लिए पुराने खिलाड़ियों के साथ-साथ अडाणी ग्रुप ने भी अप्लाई किया था. 15 जनवरी, 2020 को कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की. इसमें कहा कि इस प्रोजेक्ट में मोदी सरकार ने अडाणी ग्रुप को फायदा पहुंचाने की कोशिश की. लेकिन अब बात साफ हो गई है. इस प्रोजेक्ट के लिए शॉर्टलिस्ट किया गया है लार्सन एंड टूब्रो (L&T) और मज़गांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL) को. MDL एक सरकारी कंपनी है. तो इस रक्षा सौदे के मामले में कांग्रेस के तर्क प्रथम दृष्टया गलत साबित हुए हैं. इस पर आएंगे. लेकिन पहले आपको बताएंगे कि ये प्रोजेक्ट है क्या और इसकी अहमियत क्या है?

#वाजपेयी पीएम थे तब बना था पनडुब्बी बनाने का प्लान

समंदर में भारत के सामरिक हितों को देखते हुए नौसेना के लिए और पनडुब्बियों की ज़रूरत थी. इसी के लिए एक 30 साल लंबा प्लान बनाया गया जिसे 2030 में पूरा होना था. इसमें कुल 24 पनडुब्बियां बननी थीं, जिनमें से 18 कन्वेन्शनल होतीं और 6 न्यूक्लियर. कन्वेन्शनल माने डीज़ल से चलने वाली पनडुब्बियां और न्यूक्लियर तो आप नाम से समझ ही गए होंगे- परमाणु ईंधन से चलने वाली पनडुब्बियां. डीज़ल से चलने वाली पनडुब्बियों की रेंज कुछ कम होती है. परमाणु पनडुब्बियों की कोई तकनीकी रेंज नहीं होती. नाविकों के लिए पर्याप्त रसद और गोला बारूद हो तो ये दुनिया में कभी भी, कहीं भी जा सकती हैं. देश पर परमाणु हमला हो जाए तो दुश्मन को जवाब देने की ज़िम्मेदारी परमाणु पनडुब्बियों पर ही होती है. फिलहाल भारतीय नौसेना के पास दो परमाणु पनडुब्बियां हैं. अरिहंत- जिसे स्वदेशी तकनीक से बनाया गया है. और चक्र- जिसे रूस से 10 साल के लिए लीज़ पर लिया गया है. नई पनडुब्बियां बनाने के प्लान पर बात अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री रहते ही शुरू हो गई थी. और इसी प्लान का एक हिस्सा था प्रोजेक्ट 75 आई – जिसके तहत 6 कन्वेन्शनल पनडुब्बियां बननी थीं.

INS अरिहंत स्वदेशी तकनीक से बनाई गई न्यूक्लियर पनडुब्बी है.
INS अरिहंत स्वदेशी तकनीक से बनाई गई न्यूक्लियर पनडुब्बी है.

#प्रोजेक्ट को क्लियरेंस मिली 2019 में

2007 में जाकर प्रोजेक्ट 75 I को क्लियर किया गया. लेकिन क्लियर होकर ये फिर ठंडे बस्ते में चला गया. इसके बाद इसमें ढेर साले बदलाव हुए. जनवरी, 2019 में जाकर निर्मला सीतारमण की अध्यक्षता वाले डिफेंस एक्विज़िशन काउंसिल ने इस प्रोजेक्ट को अंतिम मंज़ूरी दी. मंज़ूरी स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप मॉडल के तहत दी गई थी. इसमें सरकार को एक भारतीय शिपयार्ड और एक विदेशी ओरिजनल इक्विपमेंट मैनुफैक्चरर (OEM) को चुनना था. यहां OEM का मतलब सैनिक साज़ो सामान बनाने वाली कंपनी से है. OEM और भारतीय शिपयार्ड मिलकर पनडुब्बी बनाते और बहती गंगा में ‘मेक इन इंडिया’ के भी हाथ धुल जाते. 1 फरवरी, 2019 को समाचार वेबसाइट द प्रिंट में छपी खबर बताती है कि तब भारत में सिर्फ 14 कन्वेन्शनल पनडुब्बियां थीं, जिनमें से एक बार में आधी ही सेवा में रहती हैं. इस जानकारी के आलोक में प्रोजेक्ट 75 I का महत्व बहुत बढ़ जाता है. इसलिए भी कि हमारी एक तरफ पाकिस्तान है और दूसरी तरफ चीन. चीन खास तौर पर भारत को समंदर में भी व्यस्त रखे हुए है.

प्रोजेक्ट 75 I के लिए 2019 में ही इंडिन स्ट्रैटेजिक पार्टर्नस माने भारतीय कंपनियों के लिए रिक्वेस्ट फऑर एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट जारी हुआ. माने भारतीय कंपनियों को एक तरह का आमंत्रण दिया गया. कि अगर आपके पास नौसेना की ज़रूरतें पूरी करने लायक क्षमता है, तो अपने-अपने प्रस्ताव जमा कीजिए. सितंबर, 2019 में मीडिया में खबर आई कि प्रोजेक्ट 75 I के लिए अडाणी ग्रुप ने भी प्रस्ताव भेजा है. इसने सभी को चौंकाया. क्योंकि सामान्य समझ यही थी कि इस प्रोजेक्ट के लिए पुराने खिलाड़ियों के बीच ही प्रतियोगिता होगी. पुराने खिलाड़ी कौन?

# लार्सन एंड टूब्रो लिमिटेड
# मजगाव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड
# रिलायंस नेवल एंड इंजीनियरिंग लिमिटेड और
# हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड (HSL)

शिपयार्ड वो जगह होती है जहां पनडुब्बियों, जहाजों का निर्माण होता है. इस फोटो में दिख रहा है भारत का पहला स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत. जिसे कोच्चि स्थित शिपयार्ड में बनाया गया है.
शिपयार्ड वो जगह होती है जहां पनडुब्बियों, जहाजों का निर्माण होता है. इस फोटो में दिख रहा है भारत का पहला स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत. जिसे कोच्चि स्थित शिपयार्ड में बनाया गया है.

इन सभी कंपनियों के पास शिपयार्ड हैं, जहां जहाज़, पनडुब्बी और दूसरे समुद्री उपकरण बनाए जाते हैं. लेकिन अपनी निविदा जमा करते वक्त अडाणी समूह के पास कोई एक्टिव शिपयार्ड नहीं था. माने समूह के पास पनडुब्बी या जहाज़ बनाने का कोई पूर्व अनुभव नहीं था. खबरें आईं कि अडाणी समूह इस प्रोजेक्ट के लिए हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड के साथ साझेदारी कर लेगा. और यहीं वो गुंजाइश पैदा हुई जिसके चलते कांग्रेस ने इल्ज़ाम लगाए.

15 जनवरी, 2020 को रणदीप सिंह सुरजेवाला ने आरोपों की एक लंबी लिस्ट प्रेस के सामने रखी. इस पूरी प्रेस कॉन्फ्रेंस का निचोड़ ये था कि सरकार ने नौसेना की अनुशंसाओं को परे रखकर अडाणी समूह को फायदा पहुंचाया है. समूह ने पहले ऐसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट पर काम नहीं किया, फिर भी इतना बड़ा ठेका उसे दिया जा रहा है. इल्ज़ामों पर सरकार ने सीधे कुछ नहीं कहा. लेकिन टिप्पणीकारों ने कहा कि कांग्रेस ने इल्ज़ाम लगाने में थोड़ी जल्दी कर दी. ठेका हो जाता और अनिमितता दिखती, तब आरोपों में दम होता. लेकिन अभी तो कुछ ऐसा हुआ ही नहीं है.

21 जनवरी के दिन प्रेस को मिली जानकारी से इतना तो साफ हो ही गया कि ये ठेका अडाणी समूह को नहीं दिया गया है. साथ ही साथ रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता वाले डिफेंस एक्विज़िशन काउंसिल ने पांच विदेशी OEM’s को भी चुना. ये हैं

# नेवल ग्रुप- फ्रांस
# रूबिन डिज़ाइन ब्यूरो – रूस
# नवान्शिया – स्पेन
# दाएवू शिपबिल्डिंग एंड मरीन इंजीनियरिंग – साउथ कोरिया
# थिसनक्रुप मरीन सिस्टम्स – जर्मनी

एक बात और साफ कर दें. कई मीडिया रिपोर्ट्स में सूत्रों के हवाले से ये लिखा गया कि निविदाओं और प्रस्तावों के अध्ययन के बाद नौसेना ने मज़गाव डॉक और L&T को शॉर्टलिस्ट किया था. क्या सरकार में से किसी ने नौसेना पर अडाणी- HSL वाली निविदा पर विचार करने के लिए दबाव डाला था? ये दावे से बता पाना फिलहाल संभव नहीं है. अभी ऐसा ही लगता है कि सरकार का फैसला नौसेना की सिफारिश के अनुरूप ही हुआ है.


प्रोजेक्ट 75-I: पनडुब्बियां अडाणी नहीं बल्कि ये कंपनियां बनाएंगी

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