Submit your post

Follow Us

रवनीत सिंह बिट्टू, कांग्रेस का वो सांसद जिसने एक केंद्रीय मंत्री के इस्तीफे का प्लॉट तैयार कर दिया!

17वीं लोकसभा. 17 सितंबर, 2020. कृषि से जुड़े तीन अध्यादेशों पर लोकसभा में बहस चल रही थी. बहस के दौरान किसानों से हमदर्दी जताने की होड़. किसानों का मुद्दा पंजाब की सियासत का सबसे बड़ा मुद्दा होता है. विशेषकर हरित क्रांति के बाद के दौर में, जब पंजाब के खेत-खलिहानों तक नहरों के माध्यम से सिंचाई तंत्र (Irrigation System) का जाल बिछाया गया. इसके बाद पंजाब की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार रहे कृषि क्षेत्र में लगे किसानों की आमदनी में बढ़ोतरी हो गई. तब से लेकर आज तक वहां किसानों को मिलने और घटने-बढ़ने वाली सुविधाओं से राजनीति की दशा और दिशा तय होने लगी.

किसान सबसे बड़ा वोटबैंक बन गया. यही कारण है कि इन कृषि अध्यादेशों पर पंजाब से आने वाले सांसदों ने लोकसभा में खूब बहस की. इस बहस के केन्द्र में रहे कांग्रेस के मुख्य सचेतक रवनीत सिंह बिट्टू और अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल.

बादल दंपति (सुखबीर सिंह बादल और हरसिमरत कौर बादल) अभी लोकसभा के सदस्य हैं. ये दोनों पांच बार पंजाब के मुख्यमंत्री रहे अकाली दल के नेता प्रकाश सिंह बादल के बेटे और बहू हैं.

Ravneet Singh Bittu (2)
कृषि से जुड़े बिल पर लोकसभा में अपनी बात रखते सांसद (फोटो-पीटीआई)

दोनों (रवनीत और बादल दंपति) के बीच खुद को एक-दूसरे से बड़ा किसान हितैषी दिखाने की होड़ लग गई थी, जिसका नतीजा यह हुआ कि केन्द्रीय खाद्य और प्रसंस्करण मंत्री हरसिमरत कौर बादल को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा. लोकसभा में कृषि से संबंधित अध्यादेशों में फसल की खरीद के लिए राज्यों की मंडियों में कार्यरत ‘कृषि उत्पादन बाजार समितियों’ यानी APMCs को समाप्त कर किसानों से व्यापारियों द्वारा सीधे फसल खरीद किए जाने का प्रावधान किया गया है. इसका विरोध करते हुए कांग्रेस के लोकसभा सांसद रवनीत सिंह बिट्टू ने संसद में कुछ इस प्रकार अपनी बात रखी, जिससे हरसिमरत कौर बादल के सामने मंत्री पद से इस्तीफा देने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचा था. एक तरफ किसानों के वोटबैंक का सवाल था, तो दूसरी तरफ मंत्री पद. ऐसे में कोई राजनेता अपने वोटबैंक को तिलांजलि तो नहीं ही देगा. लिहाजा हरसिमरत कौर ने इस्तीफा देना ही उचित समझा.

अकाली दल से सांसद हरसिमरत बादल.
अकाली दल से सांसद हरसिमरत बादल.

रवनीत सिंह बिट्टू ने ऐसा क्या बोल दिया

अब सवाल उठता है कि आखिर रवनीत सिंह बिट्टू हैं कौन और उन्होंने कृषि अध्यादेशों पर ऐसा क्या बोल दिया, जिससे भाजपा के सबसे पुराने गठबंधन सहयोगियों में से एक अकाली दल के प्रतिनिधि ने सरकार से इस्तीफा दे दिया? सबसे पहले जानते हैं कि रवनीत सिंह बिट्टू की सियासत का आधार क्या है?

80 के दशक से लेकर 90 के दशक की शुरुआत तक पंजाब आतंकवाद और अलगाववाद की चपेट में था. माहौल इस हद तक खराब हो गया था कि 1987 से लेकर 1992 तक लगातार पांच वर्षों तक वहां राष्ट्रपति शासन के तहत आपातकाल लागू रहा. कुल मिलाकर पांच संविधान संशोधन (59वां, 63वां, 64वां, 67वां और 68वां) किए गए और 1992 तक राष्ट्रपति शासन और आपातकाल को जारी रखा गया.

इसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने पंजाब के लोगों को खुदमुख्तारी देने यानी अपनी सरकार खुद चुनने का मौका देने का ऐलान कर दिया. फरवरी, 1992 में चुनाव हुए और उस चुनाव में कांग्रेस (ई) यानी इंका को स्पष्ट बहुमत मिला. बेअंत सिंह को कांग्रेस विधायक दल का नेता चुना गया और वे मुख्यमंत्री बने. उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद राज्य के लोगों का भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास बढ़ने लगा और आतंकवाद की घटनाओं में कमी आने लगी. लगा कि अब सबकुछ पटरी पर आ गया है, लेकिन तभी आता है 31 अगस्त, 1995 का दिन. उस दिन दोपहर में बेअंत सिंह चंडीगढ़ स्थित पंजाब सचिवालय से बाहर निकल रहे थे. इस बीच वहां खड़े एक स्कूटर में विस्फोट हुआ और बेअंत सिंह समेत कई लोग मारे गए.

Beant Singh
सितंबर 2019 में गृह मंत्रालय ने पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के दोषी बलवंत सिंह रजोआना की फांसी की सजा को उम्रकैद में तब्दील कर दी थी.

दरअसल, उस स्कूटर में विस्फोटक पदार्थ RDX रखकर उसमें टाइम बम के द्वारा विस्फोट करवाया गया था. इस घटना से पूरा देश स्तब्ध रह गया. सबको इस बात पर आश्चर्य हुआ कि ‘शांत’ हो चुके पंजाब में इस प्रकार की घटना कैसे हो गई. इसके पहले यह देश आतंकवादी घटनाओं में एक प्रधानमंत्री (इन्दिरा गांधी) और एक पूर्व प्रधानमंत्री (राजीव गांधी) को खो चुका था और अब यह तीसरा बड़ा मामला था.

खैर, गनीमत यह रही कि बेअंत सिंह की दुखद और त्रासदीपूर्ण मौत के बाद पंजाब में आतंकवाद ने दोबारा सिर नहीं उठाया और शांति बरकरार रही.

लेकिन भारत के संसदीय लोकतंत्र में (जिसे कुछ टिप्पणीकार ‘वंशवादी लोकतंत्र’ भी कहते हैं) राजनीतिक नेताओं के वारिसों के राजनीति में आने की परंपरा विद्यमान रही है. आज हर दल में ऐसे सांसद और विधायक मौजूद हैं, जो किसी न किसी नेता के बेटे-बेटी, पोते-पोती या बहू हैं. इन्हीं में से एक हैं दिवंगत बेअंत सिंह के पोते और लुधियाना से कांग्रेस के सांसद रवनीत सिंह बिट्टू.

10 सितंबर, 1975 को लुधियाना जिले के कोटला अफ़गान गांव में जन्मे रवनीत सिंह बिट्टू पढ़ाई-लिखाई के मामले में लालू प्रसाद और रामविलास पासवान के बेटों को कंपिटीशन देते दिखते हैं. इनकी पढ़ाई की 12वीं तक ही हुई है.

2007 के पंजाब विधानसभा चुनाव में अकाली दल ने पंजाब की सत्ता पर कब्जा किया. कांग्रेस चुनाव हार गई थी और इस हार के बाद संगठन में जान फूंकने के इरादे से कांग्रेस ने पंजाब की युवा कांग्रेस इकाई की कमान एकदम से नए लोगों के हाथ में सौंप दी. पंजाब यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष बनाए गए बेअंत सिंह के पोते रवनीत सिंह बिट्टू. इसके बाद 2009 का लोकसभा चुनाव आया. किसानों की कर्जमाफी, छठा वेतन आयोग और मनरेगा जैसे कार्यक्रमों ने कांग्रेस में जान फूंक दी थी. खासकर पंजाब और आन्ध्र प्रदेश जैसे राज्यों में किसानों की कर्जमाफी का असर होना स्वाभाविक ही थी, क्योंकि इन राज्यों में किसान पॉलिटिक्स ही राज्य के सियासी समीकरणों को तय करती रही है.

Ravneet Singh Bittu4
2007 में पंजाब यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष बनाए गए बेअंत सिंह के पोते रवनीत सिंह बिट्टू.

इसी चुनाव में कांग्रेस ने रवनीत सिंह बिट्टू को आनंदपुर साहिब लोकसभा सीट से टिकट दे दिया. रवनीत सिंह बिट्टू ने भी पार्टी आलाकमान को निराश नहीं किया और चुनाव जीतने में सफल रहे. इसके बाद 2014 में वे पंजाब के सबसे बड़े औद्योगिक नगर लुधियाना की लोकसभा सीट से चुनाव लड़े और यहां से भी जीते. 2019 में भी बिट्टू ने लुधियाना सीट बरकरार रखी.

सियासत में बड़ा ब्रेक

2020 का साल राजनीतिक दलों के संसदीय मामलों में नए-नए लोगों को अवसर देने वाला रहा है. वर्ष की शुरुआत में जहां सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने लोकसभा में लगातार तीसरी बार के सांसद बिहार के संजय जायसवाल (पूर्व भाजपा सांसद मदन जायसवाल के बेटे) को अपना मुख्य सचेतक (Chief Whip) बनाया, वहीं बीते 27 अगस्त को कांग्रेस ने पंजाब से लगातार तीसरी बार के सांसद रवनीत सिंह बिट्टू को अपना मुख्य सचेतक बनाया. संयोगवश दोनों राजनीतिक परिवारों से भी आते हैं.

Winter Session Of Parliament
अपने भाषण में सुखबीर सिंह बादल और हरसिमरत कौर बादल को चुनौती दी कि कृषि अध्यादेशों के लागू होने के बाद वे दोनों पंजाब के किसानों के बीच जाकर दिखाएं.

लोकसभा में पार्टी का मुख्य सचेतक बनने के बाद स्वाभाविक है कि किसी सांसद को संसद में बोलने के अवसर पहले की तुलना में ज्यादा मिलेंगे. उसमें भी सांसद पंजाब का हो और मुद्दा किसान का हो, तो कोई इस अवसर को भुनाने से चूकना नहीं चाहेगा. 17 सितंबर को कृषि अध्यादेशों के मुद्दे पर (जिसके तहत व्यापारी मंडियों की बजाए सीधे किसानों से फसल खरीद सकते हैं) जब लोकसभा में बहस हो रही थी, तब बिट्टू ने इस पूरे मुद्दे को छोटे और सीमांत किसानों, पंजाब के राजस्व (जहां पहले से ही GST के मुद्दे पर केन्द्र और पंजाब के बीच विवाद चल रहा है) और किसानों की स्वायत्तता से जोड़ दिया. साथ ही अपने भाषण में सुखबीर सिंह बादल और हरसिमरत कौर बादल को चुनौती दी कि कृषि अध्यादेशों के लागू होने के बाद वे दोनों पंजाब के किसानों के बीच जाकर दिखाएं.

बिट्टू ने स्पष्ट तौर पर कहा-

‘पंजाब के 75 प्रतिशत किसान छोटे किसान (2-3 एकड़ की जमीन के मालिक) हैं और इन अध्यादेशों के लागू होने से कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग (यानी ठेके पर खेती) को बढ़ावा मिलेगा, जबकि मंडियों के माध्यम से पंजाब को मिलने वाला तकरीबन 3600 करोड़ रुपए के टैक्स का नुकसान होगा. अधिक फसल उत्पादन की स्थिति में किसानों को उचित मूल्य नहीं मिलेगा.’

बिट्टू के लोकसभा में दिए गए भाषण और कृषि अध्यादेशों को मुद्दा बनाकर सरकार पर हो रहे चौतरफा हमले के कारण अकाली दल के पास सरकार से अलग होने के सिवा कोई चारा नहीं बचा. हरसिमरत कौर बादल को इस्तीफा देना पड़ा. पिछले विधानसभा चुनाव (2017) में अकाली दल इतनी बुरी तरह हारी कि विधानसभा में उसे मुख्य विपक्षी दल का दर्जा भी नहीं मिला. पंजाब में दूसरे नंबर की पार्टी की हैसियत आम आदमी पार्टी ने हासिल कर ली. ऐसे हालात में अपनी राजनीतिक जमीन बचाए रखने और उसका विस्तार करने के लिए हरसिमरत कौर बादल के सामने सरकार छोड़ने के सिवा कोई और रास्ता नहीं था. दूसरी तरफ कांग्रेस के लिए फायदे का सौदा यह रहा कि अकाली दल और भाजपा के संबंधों में पहले से आ रही दरार की खबरों को और अधिक चौड़ा होने का पुख्ता आधार मिल गया.

दरार डालता रहा है लुधियाना!

लुधियाना हमेशा ही एनडीए में दरार का कारण बनता रहा है. कभी लुधियाना का सांसद, तो कभी लुधियाना की रैली. इस बार तो लुधियाना के सांसद रवनीत सिंह बिट्टू ने एनडीए की दरार को चौड़ा करने की पटकथा लिखी है, लेकिन आज से 11 साल पहले, 2009 के लोकसभा चुनाव में भी लुधियाना की रैली ने एनडीए के दो नेताओं में ऐसी खाई बनाई, जिसे आज तक पूरी तरह से पाटा नहीं जा सका है. क्या हुआ था एनडीए की उस लुधियाना रैली में?

उस रैली का आयोजन पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने किया था. एनडीए के सभी बड़े नेता उसमें शामिल हुए थे. रैली की शुरुआत में जब सभी नेता एक-दूसरे का हाथ उठाकर फोटो सेशन करवा रहे थे, तभी गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का हाथ पकड़कर ऊपर उठाया. नीतीश-मोदी की इस जुगलबंदी की बहुत चर्चा हुई. तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने यहां तक कहा-

“नीतीश कुमार को सेक्युलरिज्म (धर्मनिरपेक्षता) के मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट करना चाहिए.”

बात नीतीश कुमार तक पहुंची, तो उन्होंने भी मनमोहन सिंह को जवाब दिया था-

“हां-हां, आजकल वे ही यूनिवर्सिटी ऑफ सेक्युलरिज्म के वाइस चांसलर अप्वाइंट हुए हैं ना!”

बात इतने तक ही खत्म नहीं हुई. अगले साल यानी जून, 2010 में पटना में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हुई. उस दौरान पटना की सड़कों पर जब लुधियाना रैली का पोस्टर (जिसमें नरेन्द्र मोदी नीतीश कुमार का हाथ पकड़कर उठाए हुए हैं) चिपकाया गया, तब नीतीश कुमार इतने खफा हुए कि नरेन्द्र मोदी और भाजपा नेताओं को मुख्यमंत्री आवास पर दिया जाने वाला डिनर कैंसिल कर दिया था. कहा जाता है कि तब से लेकर आज तक दोनों नेताओं (नरेन्द्र मोदी और नीतीश कुमार) में संबंध सहज नहीं हो सके हैं.

Comgress Mps At Parliament
रवनीत सिंह बिट्टू पंजाब की सियासत में कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं. (फाइल फोटो-पीटीआई)

बहरहाल, रवनीत सिंह बिट्टू पर लौटते हैं. उनके द्वारा 17 सितंबर को लोकसभा में दिया गया भाषण किसानों के बीच उनकी पैठ बढ़ाएगा या नहीं, ये तो समय बताएगा, लेकिन एक केन्द्रीय मंत्री का विकेट गिराकर पंजाब की सियासत में उन्होंने वह मुकाम तो हासिल कर ही लिया है, जहां से वे 79 वसंत देख चुके मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह के उत्तराधिकार की होड़ में शामिल हो सकते हैं.

अब यह कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व पर निर्भर है कि वह रवनीत सिंह बिट्टू को पंजाब की सियासत में आगे बढ़ाती है या उनका हाल भी ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट वाला होता है.


मोदी सरकार के नए किसान बिल के विरोध में हरसिमरत कौर बादल ने इस्तीफा दे दिया

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

न्यू मॉन्क

भगवान जगन्नाथ की पूरी कहानी, कैसे वो लकड़ी के बन गए

राजा इंद्रद्युम्न की कहानी, जिसने जगन्नाथ रथ यात्रा की स्थापना की थी.

दुनिया के पहले स्टेनोग्राफर के पांच किस्से

अनंत चतुर्दशी और गणेश विसर्जन के अवसर पर पढ़िए गणपति से जुड़ी कुछ रोचक बातें.

यज्ञ में नहीं बुलाया गया तो शिव ने भस्म करवा दिया मंडप

शिव से बोलीं पार्वती- 'आप श्रेष्ठ हो, फिर भी होती है अनदेखी'.

नाम रखने की खातिर प्रकट होते ही रोने लगे थे शिव!

शिव के सात नाम हैं. उनका रहस्य जानो, सीधे पुराणों के हवाले से.

ब्रह्मा की हरकतों से इतने परेशान हुए शिव कि उनका सिर धड़ से अलग कर दिया

बड़े काम की जानकारी, सीधे ब्रह्मदारण्यक उपनिषद से.

एक बार सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र ने भी झूठ बोला था

राजा हरिश्चंद्र सत्य का पर्याय हैं. तभी तो कहा जाता है- सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र. पर एक बार हरिश्चंद्र ने भी झूठ कहा था. क्यों कहा था?

जटायु के पापा का सूर्य से क्या रिश्ता था?

अगर पूरी रामायण पढ़े हो तो पता होगा. नहीं पता तो यहां पढ़ो.

ब्रह्मा की पूजा से जुड़ा सबसे बड़ा झूठ, बेटी से नहीं की थी शादी

कहते हैं कि बेटी सरस्वती से विवाह कर लिया था ब्रह्मा ने. इसीलिए उनकी पूजा नहीं होती. न मंदिर बनते हैं. सच ये है.

उपनिषद् का वो ज्ञान, जिसे हासिल करने में राहुल गांधी को भी टाइम लगेगा

जानिए उपनिषद् की पांच मजेदार बातें.

औरतों को कमजोर मानता था महिषासुर, मारा गया

उसने वरदान मांगा कि देव, दानव और मानव में से कोई हमें मार न पाए, पर गलती कर गया.