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लोहरदगा: झारखंड में CAA समर्थक रैली पर पथराव की ये पहली घटना नहीं थी

झारखंड का लोहरदगा. ये शहर रांची से लगभग 70 किलोमीटर दूर पड़ता है. इस शहर में 23 जनवरी से कर्फ्यू लगा है. स्कूल-कॉलेज बंद हैं. क्योंकि गुरुवार को इस शहर में दंगा हुआ. आग लगाई गई, भीड़ के बीच हिंसक टकराव हुआ. लोहरदगा की सब डिविज़नल अफसर ज्योति झा ने प्रेस को बताया कि शहर में कानून व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए कर्फ्यू लगाया गया है. शहर के कई हिस्से अशांत हैं और हुड़दंगियों को काबू करने के लिए अतिरिक्त फोर्स लगाई जा रही है. इस सब के पीछे एक बार फिर से नाम आया नागरिकता संशोधन कानून का.

23 जनवरी को लोहरदगा में विश्व हिंदू परिषद ने नागरिकता संशोधन कानून और नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर NPR के समर्थन में एक मार्च निकाला. इस मार्च को भाजपा का समर्थन भी मिला हुआ था. स्थानीय भाजपा नेताओं का कहना है कि उन्होंने मार्च के लिए प्रशासन से अनुमति ली गई थी. मार्च पुलिस की निगरानी में चल रहा था और पूरी तरह शांतिपूर्ण था. ये मार्च जब अमला टोली से निकल रहा था, तब इसपर पथराव हुआ. पथराव दो किलोमीटर लंबी एक सड़क पर हुआ जो शहर के बीच से निकलती है. घायलों का कहना है कि उनपर इमारतों के ऊपर से पत्थर चलाए गए. इसके बाद हर कोई अपनी जान बचाने भागा. इसके बाद सड़कों पर तोड़फोड़ और आगज़नी हुई. प्रेस रिपोर्ट्स में प्रेट्रोल बम चलने की बात भी है. लेकिन फिलहाल इस बात की पुष्टि नहीं हुई है. लेकिन इतनी बात तय है कि जब ये सब थमा, तब अमला टोली से राजेंद्र भवन तक की सड़क पत्थरों से पट गई थी. कुछ घरों को लूटने की बात भी सामने आई है. अभी तक प्राप्त जानकारी के अनुसार 40 बाइक, तीन ट्रक, एक दर्जन दुकानें और तीन घरों को जला दिया गया है. 30 लोगों को सदर अस्पताल में भर्ती कराया गया है. 4 पुलिसवालों को भी चोट पहुंची है.

झारखंड भाजपा के महासचिव दीपक प्रकाश ने कहा है कि दंगा कर रहे बदमाशों को सत्तारुढ़ दल का समर्थन प्राप्त है. झारखंड में सरकार चला रहे हैं झारखंड मुक्ति मोर्च और कांग्रेस. साथ में राजद और कुछ दूसरे दल भी हैं. दीपक प्रकाश की बात में संयम था. लेकिन विश्व हिंदू परिषद, जिसकी रैली पर पथराव हुआ है, इतना संयम दिखाने के मूड में नहीं है. 23 जनवरी को ही VHP ने अपनी आधिकारिक ट्विटर हैंडल पर रैली को निशाना पर हमला करने वालों को इस्लामिक जिहादी लिख दिया. VHP ने वो वीडियो भी ट्वीट किया है जिसमें एक पुलिस जवान बता रहा है कि मस्जिद की तरफ से पथराव आ रहा था. 23 जनवरी को ही वीएचपी ने ट्विटर पर ये भी लिखा कि लोहरदगा में हिंदुओं पर मुस्लिमों ने आक्रमण किया. वीएचपी के दावों का कारण वीएचपी ही बता सकती है. कि मुस्लिम आक्रमण और जिहादी क्या है. लेकिन ये बात कहां से आ रही है, उसे समझा जा सकता है. हिंदुस्तान टाइम्स की खबर के मुताबिक लोहरदगा की आबादी करीब 80 हज़ार है. लोहरदगा विधानसभा सीट अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित ज़रूर है, लेकिन शहर में कई इलाके हैं जहां मुस्लिम आबादी रहती है. जैसे अमला टोली, दुर्गा बाड़ी चौक, थाना टोइल, आज़ाद बस्ती, टीपू सुल्तान चौक, तैज़ी नगर, स्टार कॉलोनी और सोमवार बाज़ार. यहां तकरीबन 25 हज़ार मुसलमान बसते हैं. मार्च पर पथराव अमला टोली से शुरू हुआ. लेकिन क्या इसे इस्लामिक जिहादियों या फिर मुस्लिम आक्रमण कहा जाना चाहिए, इसपर विचार किया जा सकता है.

अब बात करते हैं इस पूरे मामले में हेमंत सोरेन सरकार की भूमिका की. झारखंड में नागरिकता संशोधन कानून के समर्थन में निकल रही रैलियों पर पथराव का ये पहला मामला नहीं है. 12 जनवरी 2020 को गिरिडीह में पदम चौक पर भाजपा ने CAA के समर्थन में एक रैली निकाली थी. इसमें ज़िले की छह विधानसभा सीटों से आए भाजपा कार्यकर्ता शामिल हुए थे. इस रैली पर भी पथराव हुआ था. स्थिति काबू करने के लिए पुलिस को आंसू गैस के गोले चलाने पड़े थे. समाचार एजेंसी पीटीआई ने गिरिडीह नगर पुलिस स्टेशन के प्रभारी आदिकांत महतो का बयान छापा था. इसके मुताबिक पुलिस ने 12 जनवरी की रात को ही वीडियो फुटेज की जांच के आधार पर दो ऐसे लोगों को गिरफ्तार किया था जो रैली पर पथराव कर रहे थे. इसका मतलब साफ है. झारखंड प्रशासन और झारखंड पुलिस देख पा रहे थे कि राज्य में नागरिकता संशोधन कानून के समर्थन में निकल रही रैलियां निशाना बन रही हैं. फिर लोहरदगा की रैली के वक्त अतिरिक्त सावधानी क्यों नहीं बरती गई. अगर भाजपा नेताओं का ये दावा सही है कि रैली के लिए पूर्व अनुमति थी, तब पुलिस की गलती और गंभीर हो जाती है. पुलिस की खुफिया तंत्र को ये बात मालूम होनी चाहिए थी कि रैली का शहर के एक इलाके से निकलना शांति व्यवस्था के लिए खतरा बन सकता है. क्या झारखंड पुलिस एक मार्च को बिना पत्थर चले शहर से गुज़ारने लायक सक्षम नहीं है? वो भी तब जब गिरिडीह का उदाहरण सबके सामने था.

भारत में नागरिकता संशोधन कानून को लेकर दो बड़े धड़ों में राय बंटी हुई है. एक पक्ष कहता है कि कानून सही है. एक पक्ष इसे संविधान विरोधी बताता है. दोनों पक्ष अपने रुख के प्रचार के लिए रैलियां निकाल रहे हैं. प्रदर्शन कर रहे हैं. इन सभी प्रदर्शनों को सुरक्षा देने की ज़िम्मेदारी राज्य की है. राज्य को चलाने वाली पार्टी चाहे रैली के लक्ष्य में मानती हो या न मानती हो, वो हिंसा के पक्ष में खड़ी नहीं दिख सकती. हेमंत सोरेन को जवाब देना चाहिए. चाहे वो पत्थलगढ़ी के विरोधियों की हत्या के मामले हों या गिरिडीह और लोहरदगा जैसे मामले. शुरुआत वो लोहरदगा पर वैसे ही बोलकर कर सकते हैं, जैसे वो पत्थलगढ़ी वाले मामले पर बोले हैं. या शुरुआत एक ट्वीट से भी की जा सकती है. लेकिन उन्हें बोलना होगा. क्योंकि इस मामले में सारे सवाल उन्हीं से हैं.


 

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